लेख विचार
प्रेषित: सुष्मिता झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- पावनि-तिहारमे महिलाक योगदान
परंपराक संवाहकसँ समान सहभागिताक दिस
मिथिलाक माटि मात्र एकटा भू-भाग नहि, मुदा लोकसंस्कृति, आस्था, संस्कार आ परंपरासँ भरल एकटा जीवंत संसार अछि। एतयक पावनि-तिहार मात्र पूजा-पाठमे सीमित नहि, मुदा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलि आबि रहल लोकधरोहर अछि। एहि धरोहरकेँ सहेजब, बचा कऽ रखब आ नव पीढ़ी धरि पहुँचयबामे मिथिलाक महिलाक बहुत पैघ भूमिका रहल अछि।
दादी-नानीसँ पावनि-व्रतक विधि, गाओल लोकगीत आ अरिपन सीखि बेटीसँ पोती धरि महिलासभ एहि परंपराकेँ आगाँ बढ़बैत रहल छैथ। हुनकर गाओल लोकगीत आ हाथसँ बनल अरिपन मिथिलाक लोकस्मृतिकेँ जीवित रखने अछि। घरक आँगनसँ शुरू भेल ई सीख पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलैत मिथिलाक सांस्कृतिक पहिचानक हिस्सा बनि गेल अछि।
मधुश्रावणी नवविवाहिताक पावनि अछि, सामा-चकेवा भाय-बहिनक नेहक पावनि अछि, चौरचन लोकआस्थाक पावनि अछि आ जितिया संतानक मंगल लेल मायक व्रतसँ जुड़ल अछि। छठिमे सूर्यदेवक आराधना, व्रत-निष्ठा आ परिवारक मंगलक कामना एक संग देखबा लेल भेटैत अछि। एहि सभ पावनिक विधि-विधान, गीत, अरिपन आ पकवानक परंपरा बचा कऽ रखबामे महिलाक बहुत पैघ भूमिका रहल अछि।
छठिक तैयारीमे महिलाक श्रम आ लगन विशेष रूपसँ देखऽ लेल भेटैत अछि। घर-आँगन लीपि-पोति कऽ सजायब, प्रसाद बनायब, ठेकुआ-पकवान पकायब, सूप-डाला सजायब आ पूजाक सामान जुटायब—सभ काजमे हुनकर हाथ लागैत अछि। पावनिक गीतमे हुनकर आस्था, ममता आ मनक भाव स्वर बनि फूटैत अछि। एहि गीतसभमे सूर्यदेवक आराधनाक संग परिवार, संतान आ लोकजीवनक सुख-दुःखक स्वर सेहो गूँजैत अछि।
अरिपन मिथिलाक नारीक सृजनशीलताक सुन्दर चिन्ह अछि। पिठारसँ अरिपन बना महिलासभ घर-आँगनकेँ सजबैत छैथ आ मिथिलाक लोककलाक पहिचानकेँ बचौने छैथ। एहि कलाकेँ ओ सभ नव पीढ़ीकेँ सिखबैत सेहो छैथ, जाहिसँ ई परंपरा आगाँ धरि चलैत रहय।
समयक संग महिलाक जीवनमे सेहो बहुत रास बदलाव आएल अछि। आइ मैथिल महिला पढ़ाइ-लिखाइ, नोकरी, व्यापार, लेखन आ समाजक काजमे आगाँ बढ़ि रहल छथि। नगरसँ लऽ कऽ देश-परदेश धरि रहनिहार महिला अपन पावनि-तिहार नहि बिसरैत छथि। सामाजिक संजालक माध्यमसँ लोकगीत, अरिपन आ पावनिक विधि नव पीढ़ी धरि पहुँचि रहल अछि। एहि तरहेँ परंपरा समयक संग आगाँ बढ़ि रहल अछि।
मुदा पावनि-तिहारक हँसी-खुसीक पाछाँ महिलाक अथक श्रम आ लगनकेँ अनदेखा नहि कएल जा सकैत अछि। पावनि आबय सँ कतेको दिन पहिने सँ घरक सफाइ, पूजाक सामानक तैयारी, प्रसाद बनायब, पकवान पकायब, सूप-डाला सजायब आ नेम-धरमक सभ काज हुनकर जिम्मामे रहैत अछि। ई श्रम मात्र काजक बोझ नहि, मुदा परिवार आ परंपराप्रति हुनकर लगाव आ समर्पणक परिचायक अछि। तेँ पावनि-तिहारक तैयारीक भार मात्र महिलाक कन्हा पर नहि रहबाक चाही। घर-परिवारक सभ सदस्य मिलि-जुलि कऽ हुनकर हाथ बँटाबथि। एहि सँ हुनकर श्रमक मान होयत, काजक बोझ घटत आ पावनिक खुशी सेहो सभक साझा खुशी बनत।
महिलासभ परंपराक संवाहक मात्र नहि, ओकरा सहेजनिहार आ नव पीढ़ी धरि पहुँचेनिहार सेहो छैथ। हुनकर श्रमकेँ मान देब आ हुनकर संग काजमे हाथ बँटायब सभक दायित्व अछि। जखन महिलाक श्रमकेँ मान भेटत आ सभ गोटेक हाथ हुनकर संग जुड़त, तखने पावनिक उजास मात्र घर-आँगन नहि,अपितु पूरा समाजकेँ आलोकित करत। तखने परंपरा बोझ नहि, सभक साझा धरोहर बनि पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहत।
जखन महिलाक श्रमक मान होयत आ सभ गोटेक हाथ हुनकर संग जुड़त, तखने पावनिक असल रौनक बढ़त,
आ परंपराक डोर पीढ़ी-दर-पीढ़ी जुड़ल रहत।
जय मिथिला!जय मैथिली!
