ॐ श्री परमात्मने नमः!!
श्री कृष्णचन्द्र भगवान की जय !!
गीताक दोसर अध्याय पर प्रवीण व्याख्या
प्रथम अध्याय मे अर्जुन द्वारा दुनू सेनाक मध्य सँ युद्ध लेल तैयार दुनू पक्ष पर दृष्टि देला उपरान्त दुनू पक्ष मे अपन कहेनिहार स्वजन-परिजन, सगा-सम्बन्धी, गुरुजन-श्रेष्ठजन आदि केँ देखिकय अपन भूमिका एक वीर धर्नुर्धर महारथी रूप मे विपक्ष दिश ठाढ़ अपनहि लोक पर हथियार चलबय पड़त, मारय पड़त, ई सब सोचि ओ एकदम हताश भ’ गेलाह । ओ सारथि श्री कृष्ण सँ युद्ध विरूद्ध तर्क सब दियए लगलाह । गीताक प्रथम अध्याय मे राजा धृतराष्ट्रक जे सञ्जय सँ संवाद आरम्भ मे आशय रहनि जे धर्मक्षेत्र रूप मे जानल जायवला कुरुक्षेत्र मे युद्ध लेल एकत्रित हमर आ पांडव पक्षक लोक पर क्षेत्रक प्रभाव नहि पड़ल जाहि सँ ई युद्ध रुकि जाइत, सैह भाव आ आवेश अर्जुन पर पड़ल बुझाइत अछि ।
दोसर अध्याय आरम्भ होइछ सञ्जय केर एहि कथन सँ –
‘तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ॥
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥’
अर्थात् हुनका (अर्जुन केँ) जे कि ‘कृपया’ (दया सँ), ‘आविष्टम्’ (अभिभूत भ’ कय, व्यग्र भ’ कय, दुःखी भ’ कय, आदि), ‘अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्’ (नोरायल आँखि सँ), विषीदन्तम् (शोक सँ भरि गेल) छलाह – तिनका सँ ‘मधुसूदन’ (मधुनाम्ना असुरक वद्ध कयनिहार श्रीकृष्ण) – वाक्यमुवाच (ई वाक्य कहलनि) ।
ध्यान दियौक – अर्जुन वीर धनुर्धर हेबाक संग-संग शास्त्रनिपुण सेहो रहथि । गुरुजन व श्रेष्ठजनक प्रिय सेहो रहथि । महाभारत युद्ध सँ पहिने सेहो कतेको बेर बचाव वास्ते कौरवी सेना सँ युद्ध सेहो कएने रहथि । लेकिन महाभारत युद्ध जेहेन अन्तिम आ निर्णायक युद्ध बेर मे हुनका अपना लेल युद्धक बल सँ राज्य प्राप्तिक बेर मे दया, आर्द्रता, क्रन्दन, शोक (चिन्ता) भेलन्हि आ ओ गांडीव संग तीर-तरकस सब रथ मे नीचाँ पटैक देने रहथि ।
हम सामान्यजन कतेको बेर एहि तरहक मनोस्थिति मे रहैत छी । करबाक रहैछ कर्म, करय लगैत छी तर्क-चिन्तन ।
भगवान कृष्ण ताहि पर कहनाय आरम्भ कयलनि –
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ॥
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥
गीता मे ज्ञान-विज्ञान, न्याय-दर्शन, मीमांसा, कर्म सिद्धान्त, गुण-प्रकृति, सृष्टि निर्माण, देवता आ परमात्माक वर्णन सहित बहुते रास पक्ष सब पर प्रकाश देल गेल अछि । बहुते रास रहस्य सब सँ पर्दा उठायल गेल अछि । परञ्च, गौर करयवला बात ई अछि जे ई ज्ञान-दर्शन केहेन स्थिति मे उपदेशित भेल । अर्जुनक मनोदशा आ भगवानक प्रथम जबाब – यानिः
“कुतस्त्वा (कतय सँ), कश्मलमिदं (ई निराशा, उदासी) विषमे (युद्ध जेहेन दुरुह परिस्थिति मे) समुपस्थितम् (अहाँ लग उपस्थित भेल) ? अनार्यजुष्टम् (अनार्य सब जेकाँ), अस्वर्ग्यम् (स्वर्ग प्राप्तिक मानवीय लक्ष्यक विपरीत), अकीर्तिकरम् (कीर्तिकर केर विपरीत – भावार्थ दुर्भाग्यशाली, लज्जास्पद) अर्जुन ?”
स्पष्ट छैक जे भगवान कृष्ण अर्जुनक दयनीय अबस्था सँ छुब्ध भेलाह आ हुनका जबर्दस्त डाँट लगबैत बुझेनाय शुरू कयलनि । “ई सब कमजोरी विषय स्थिति मे केना आयल? तथा ई आर्यक लक्षण नहि भेल, ई मनुष्यक लक्ष्य प्राप्ति – यानि स्वर्ग प्राप्तिक विरूद्ध बात आ अकीर्तिकर – अत्यन्त निन्दनीय, दुर्भाग्यपूर्ण, लज्जास्पद बात भेल ।
एतबा नहि ! कृष्ण अर्जुनक उपरोक्त अबस्था पर आर तीक्ष्ण टिप्पणी करैत कहलनि –
क्लैब्यं मास्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ॥
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥
कृपया एक-एक शब्द पर ध्यान देल जाय –
क्लैब्यं – नामर्दगी, मास्म गमः – जुनि आनू, पार्थ – हे पृथाक पुत्र, नैतत्त्वय्युपपद्यते – एतत – एहेन, त्वयि – अहाँ मे, न उपपद्यते – खराबी करत, क्षु्द्रं – ओछ, हृदयदौर्बल्यं – दुर्बल हृदय केर बनब, त्यक्त्वोत्तिष्ठ – त्यक्ता – (एकरा सब केँ) त्यागिकय, उत्तिष्ठ – उठू, परन्तप – हे शत्रु सब केँ जराकय खाख करयवला (अर्जुन) !
ताहि पर अर्जुन तर्क प्रस्तुत करय लगलाह –
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ॥
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥
मुदा हम केना, एहि युद्ध मे, हे मधुसूदन, भीष्म आ द्रोण पर तीर चलाबी, जे सब बरु पूजा करय योग्य छथि, हे मधुसूदन ?
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ॥
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान ॥
एहि महान आत्माक स्वामी लोकनि केँ मारय सँ नीक भीख मांगिकय खेनाय होयत । आ जँ मारि दैत छी, तँ अहु संसार मे, हमर सम्पूर्ण सम्पदाक आनन्द-भोग एवं इच्छा पर खूनक दाग लागि जायत ।
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ॥
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥
आर, निस्सन्देह बड़ा मोस्किल सँ हम कहि सकैत छी जे कोन नीक होयत, जे हम (पांडव) सब ओकरा उपर विजय हासिल करी, या ओ (कौरव) सब हमरा सब पर विजय हासिल करय । एहि धृतराष्ट्रक पुत्र लोकनि केँ मारिकय हमरा सब केँ जिवितो रहय लेल नहि सोचबाक चाही, अपना आपो केँ चेहरा नहि देखबाक चाही ।
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः ॥
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥
हमर स्वभाव पर कमजोर सहानुभूति हावी भ’ गेल अछि, आर हमर मन मे कर्तव्यक मादे किछु सन्देह (ओझराहट) आबि गेल अछि, हम अहाँ सँ विनती करैत छी । अहाँ निर्णीत रूप सँ कहू जे हमरा लेल कि नीक अछि । हम अहाँक शिष्य छी । हम अहाँक शरण मे आयल छी, हमरा (उचित) निर्देशन (शिक्षा) देल जाउ ।
एतय स्वामी स्वरूपानन्द जीक टिप्पणी अत्यन्त ध्येय आ मननीय अछि हमरा सब लेल –
“धर्म कोनो चीजक ‘नेस’ (ness) थिक, कोनो वस्तुक अन्तर्विधान (आन्तरिक सिद्धान्त) केर नियम (कानून/कायदा) थिक । धर्मक पहिल अर्थ नेकी (अच्छाइ) या रिलीजन (religion) नहि अछि, बल्कि ई त बस एकर दोसर अर्थ अछि । सही काजक वास्ते लड़नाय क्षत्रिय केर धार्मिक कर्तव्य या धर्म थिक, जखन कि यैह काज एकटा ब्राह्मणक लेल पाप अछि, कियैक तँ ई ओकर अस्तित्वक सिद्धान्त (नियम) केर विपरीत अछि । तेँ अपन अस्तित्व केर नियमक हिसाब सँ कर्म करनाइये कोनो व्यक्तिक धर्म या मोक्ष केर रास्ता थिक । कर्मक मेघ (बादल) स्वयं (आत्मा) रूपी सूर्य केँ नजरि सँ नुका लैत अछि । जे साधन एहि बादक बात केँ बिना बढ़ेने खत्य कय दैत अछि आर एहि तरहें स्वयं केँ सही करय मे मदति करैत अछि, वैह धर्म थिक ।
अहाँक शिष्य: जाबत धरि ई घोषणा कय नहि देल जाइछ, गुरु लोकनि उच्च ज्ञान नहि दय सकैत छथि ।”
आब एहिठाम सँ गीताक उपदेश बुझू शुरू होइत अछि । आब श्रीकृष्ण कहनाय आरम्भ करैत छथि । कारण अर्जुनक मनक बात जे गुरुतुल्य श्रेष्ठजन सब केँ मारिकय राज्यक भोग करू, एहेन खूनक दाग लागल (कलंकित) राज्यक भोग सँ नीक जे भीख मांगिकय खायब, अपन जीवन पार लगा लेब, लेकिन गुरु सब पर तीर चलेनाय उचित नहि लगैछ । हम एहि कारण सँ युद्ध करय सँ मना कयल अछि ।
परञ्च, आखिर मे ओ अपन मनक कमजोरी सेहो स्पष्ट करैत छथि । कहैत छथि जे, “हमर स्वभाव पर कमजोर सहानुभूति हावी भ’ गेल अछि, आर हमर मन मे कर्तव्यक मादे किछु सन्देह (ओझराहट) आबि गेल अछि, हम अहाँ सँ विनती करैत छी । अहाँ निर्णीत रूप सँ कहू जे हमरा लेल कि नीक अछि । हम अहाँक शिष्य छी । हम अहाँक शरण मे आयल छी, हमरा (उचित) निर्देशन (शिक्षा) देल जाउ ।”
कमजोर सहानुभूतिक हावी होयब, कर्तव्यक मादे ओझराहट आयब, मुदा फेर स्वयं केँ शिष्यवत् जगद्गुरु श्री कृष्णक मार्गदर्शन व निर्णीत रूप सँ उचित निर्देशन देबाक आग्रह करैत छथि । एतय सँ अर्जुन शरणागतिक पथ पर अग्रसर होइत छथि । तेँ, हमरा विचार सँ गीताक उपदेश एहि पड़ाव उपरान्तक चर्चा मे होइछ ।
श्री कृष्ण अर्जुनक मिश्रित अबस्था देखि विहुंसिकय कहनाय आरम्भ करैत छथि –
“अहाँ ओकरा सब लेल शोच कय रहल छी जेकरा सब लेल शोच नहि करबाक चाही । तैयो अहाँ ज्ञानक बात बाजि रहल छी । ज्ञानीजन नहि तँ जिवित लेल, नहिये मृत् लेल शोक करैत छथि । हम, अहाँ या ओ सब – एहेन नहि छैक जे पहिने नहि रही, आ कि बाद मे फेर नहि होयब । आत्मिक अस्तित्व सदा सनातन रहैछ । जेना एहि शरीर मे बचपन, युवा आ बुढ़ापा रहैछ, तहिना दोसर शरीर भेटनाय सेहो होइछ । शान्त आत्मा एहि सब सँ धोखा मे नहि पड़ैछ ।…”
हम १३मा श्लोक धरिक बात लिखलहुँ । १४मा श्लोक सँ भगवान् ‘सत्’ आ ‘असत्’, यानि स्थायी आ अस्थायी अस्तित्वक सोदाहरण व्याख्या करब आरम्भ कयलनि । ज्ञानेन्द्रिय सभक क्षणिक अनुभूति सँ आत्मिक अनुभूतिक सदा-सनातन सत्यक अबस्था बीच मिहिन आ विस्तृत अन्तर पर प्रकाश दैत अर्जुनक मन-मस्तिष्क केँ अनुकूलित करैत रहलाह । बेर-बेर अर्जुनक जिज्ञासा बीच-बीच मे अबैत रहैछ । तदनुसार क्रमिक रूप सँ हरेक चीज पर श्री कृष्ण हुनका संबोधन-प्रबोधन करैत रहल छथि ।
शेष…. दोसर दिन (दोसर अध्यायक व्याख्या बाकी अछि) ।
हरिः हरः!!
