लेख विचार
प्रेषित: सुष्मिता झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- नारी : त्यागसँ स्वाभिमान धरि ( स्वैक्षिक)
नारीक जीवन केवल ममता आ त्यागक कथा नहि, बल्कि संघर्ष, सपना, जिम्मेदारी आ आत्मसम्मानक यात्रा अछि। बेटी बनि ओ माय-पिताक आँगनमे सपना देखैत छथि। पिताक अँगुरी पकड़ि जीवनक पहिल बाट सीखैत छथि। मुदा पैघ होइत-होइत समाज हुनका कतेको सीमा बुझबैत अछि।
विवाहक बाद नव परिवारमे अपन जगह बनबैत-बनबैत धीरे-धीरे परिवारक पसंद हुनकर पसंद आ परिवारक खुशी हुनकर खुशी बनि जाइत अछि। माँ बनलाक बाद संतानक हँसी, सफलता आ सुख हुनकर जीवनक केन्द्र बनि जाइत अछि। मुदा एहि सबक बीच एकटा प्रश्न रहि जाइत अछि—
“सभक सपना पूरा करैत-करैत, नारी अपन सपना कखन पूरा करत?”
कतेको नारी अपन अधूरल पढ़ाइ, प्रतिभा अथवा करियर परिवारक जिम्मेदारीक कारण पाछाँ छोड़ि दैत छथि। मुदा आजुक नारी अपन अस्तित्वकेँ पहचानि रहल छथि। ओ परिवारसँ दूर नहि, बल्कि परिवारक संग आगाँ बढ़य चाहैत छथि। ओ घर सम्हारय चाहैत छथि, मुदा घरक सभ जिम्मेदारी असगरे नहि। ओ अपन निर्णय लेबाक स्वतंत्रता आ अपन सपनाक लेल अवसर चाहैत छथि।
नारी सशक्तिकरणक अर्थ केवल नौकरी करब नहि अछि। शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता, निर्णयक अधिकार, सुरक्षित वातावरण आ सम्मान—ई सभ हुनकर अधिकार अछि।
नारीकेँ देवी बनाकऽ पूजि देनाइ सरल अछि, मुदा हुनका मनुष्य बुझि कऽ समान अधिकार देनाइ वास्तविक सम्मान अछि। हुनका सदिखन मजबूत रहबाक आवश्यकता नहि अछि। हुनका थाकि गेलापर विश्राम करबाक आ फेर नव उत्साहसँ आगाँ बढ़बाक अधिकार सेहो अछि।
बेटीकेँ बेटासँ कम अवसर नहि भेटय।
घरक काज बेटा-बेटी दुनू मिलि कऽ करय।
माएकेँ अपन लेल समय निकालबाक अपराधबोध नहि हो।
पत्नीकेँ अपन करियरक निर्णय लेल स्पष्टीकरण नहि देबाक पड़य।
आ नारीक आवाजकेँ “जिद” नहि, हुनकर स्वतंत्र विचार मानल जाए।
आइ नारी शिक्षा, विज्ञान, साहित्य, व्यवसाय, प्रशासन आ समाजसेवाक क्षेत्रमे अपन पहचान बना रहल छथि। जखन बेटी अपन मनपसन्द विषय पढ़ैत छथि, पत्नी अपन करियर जारी रखैत छथि अथवा माँ अपन अधूरल सपना पूरा करबाक लेल फेर कलम उठबैत छथि, तखन केवल एकटा नारी नहि, एकटा पूरा पीढ़ीक सोच बदलैत अछि।
तेँ नारीकेँ केवल हुनकर त्याग लेल नहि, हुनकर प्रतिभा आ सामर्थ्य लेल पहचान भेटय। हुनका एहन समाज दी, जतय हुनका बारम्बार सहन नहि करय पड़य।
नारीक वास्तविक स्वाभिमान तखन अछि,
जखन ओ परिवारकेँ प्रेम करैत-करैत
अपन अस्तित्वकेँ सेहो प्रेम करय सीखि जाइत छथि।
नारीक यात्रा त्यागपर समाप्त नहि हो,
ओ अपन सपनाक संग स्वाभिमानक बाटपर आगाँ बढ़ैत रहय।
हुनकर प्रतिभाकेँ उचित सम्मान आ हुनकर निर्णयकेँ स्वतंत्रता भेटय।
हुनका अपन पहचान लेल ककरो सहाराक प्रतीक्षा नहि करय पड़य।
एहन समाजक निर्माण हो, जतय प्रत्येक नारी अपन सपना पूरा करैत स्वाभिमानक संग अपन पहचान बना सकय।
जय मिथिला, जय जानकी।
