Search

यज्ञोपवीत संस्कार मे देखाऊँस सँ बेसी वैदिक रीति अनुरूप संस्कार आवश्यक

18 भ्यूज

लेख विचार
प्रेषित: कीर्ति नारायण झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- यज्ञोपवीत संस्कार

यज्ञोपवीत (उपनयन) संस्कार हमर मिथिलाक संस्कृति, परंपरा आ जीवन पद्धति के एकटा अत्यन्त महत्वपूर्ण स्तंभ थिक। एहि संस्कार के मुख्य उद्देश्य बालक के ज्ञानक मार्ग पर अग्रसर करब, अनुशासन सिखाएब आ ओकरा समाजक प्रति उत्तरदायी बनेनाइ अछि। मुदा, आइ-काल्हि आधुनिकताक अन्हर में हमर एहि पवित्र धार्मिक अनुष्ठान मे बढैत आडम्बर आ तड़क-भड़क एकटा गंभीर चिंताक विषय बनि गेल अछि।
​शास्त्रक अनुसार, यज्ञोपवीत एकटा सात्विक आ आध्यात्मिक अनुष्ठान थिक। एहि में सादगी, नियम-संयम आ ब्रह्मचर्यक पालन मुख्य होइत अछि। मुदा आजुक समय में एहि संस्कारक स्वरूप कतहु न कतहु बदलि रहल अछि:
​डेकोरेशन आ पैघ होटलक चकाचौंध: जे संस्कार घरक आंगन वा मड़वा में सादगी सँ संपन्न होइत छल, ओकर जगह आब पैघ-पैघ मैरिज हॉल, फाइव-स्टार होटल आ कीमती डेकोरेशन कें दऽ देल गेल अछि।
​दिखावा आ स्टेटस सिंबल: यज्ञोपवीत आब आध्यात्मिक यात्राक शुरुआत कम, आ समाज में अपन आर्थिक हैसियत (स्टेटस) देखबै कऽ माध्यम बेसी बनि गेल अछि।
​फिजूलखर्ची आ खान-पानक तड़क-भड़क: आमंत्रण पत्र सँ लऽ कऽ विदाई धरि में बेहिसाब पैसा पानि जकाँ बहाउल जाइत अछि। सात्विक भोजनक स्थान पर आब तरह-तरहक आधुनिक आ विदेशी पकवानक काउंटर सजल रहैत अछि, जइ सँ एहि धार्मिक अनुष्ठानक सात्विकता प्रभावित होइत अछि।
​फोटोग्राफी आ रील संस्कृति: बरुआ के ध्यान गुरु-मंत्र आ गायत्री दीक्षा पर कम, आ कैमराक सामने पोज़ देबा पर बेसी रहैत अछि। डीजे आ नाच-गानक शोर में मंत्रोच्चारक पवित्र ध्वनि कतहु हरा जाइत अछि।

​एहि बढैत आडम्बरक कारण हमर समाज पर कतेको तरहक कुप्रभाव पड़ि रहल अछि:
​आर्थिक दबाव: समाजक मध्यवर्गीय आ गरीब परिवार सेहो लोक-लाज आ “देखादेखी” के चक्कर में कर्ज लऽ कऽ यज्ञोपवीत करबाक लेल मजबूर भऽ जाइत छथि।
​मूल उद्देश्य सँ भटकाव: जखन पूरा ध्यान ताम-झाम पर रहत, तखन बच्चा के संस्कारक असली अर्थ आ ओकर नियम जेना जकाँ त्रिकाल संध्या करब, जनेऊ के पवित्रता राखब इत्यादि कें बुझबाक समय आ माहौल कतऽ सँ भेटतै?
​मिथिलाक लोक-गीत आ पारंपरिक विधि-विधानक जगह आब लाउडस्पीकर आ फूहड़ गान लेबऽ लागल अछि, जे हमर सांस्कृतिक धरोहर के नुकसान पहुँचा रहल अछि।
​”संस्कार मन कें शुद्ध करबाक लेल होइत अछि, धन कें प्रदर्शन करबाक लेल नहीं।”
​यदि हम अपन मिथिलाक एहि महान परंपरा के जीवित आ पवित्र राखऽ चाहैत छी, तऽ हमरा सभ के किछु गोट गप्प पर विचार करय पड़त:
​सादगी कें अपनाउ: यज्ञोपवीत के आयोजन कें जतेक संभव हो सात्विक आ सादा राखल जाय।
​ज्ञान पर जोर दियौ: बटुक के ई बुझाउ जे जनेऊ धारण कएलाक बाद ओकर जिम्मेदारी की अछि। ओकरा गायत्री मंत्र आ संध्या उपासनक नियम विस्तार सँ सिखाउ।
​दिखावा बंद करी: जे धन फिजूलखर्ची में नष्ट भऽ रहल अछि, ओकरा बालकक उच्च शिक्षा वा समाजक कोनो कल्याणकारी काज मे लगाउ।
​मिथिलाक संस्कृति अपन सादगी आ विद्वताक लेल जानल जाइत अछि, ताम-झामक लेल नहीं। समय रहैत हमरा सभ कें एहि बढैत आडम्बरक विरुद्ध सचेत होबऽ पड़त, ताकि हमर आबय बला पीढ़ी एहि संस्कारक आध्यात्मिक महत्व कें बुझि सकय, न कि एकरा मात्र एकटा देखौंसक ओदौद वला कार्यक्रम।

Related Articles