लेख विचार
प्रेषित: कीर्ति नारायण झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- यज्ञोपवीत संस्कार
यज्ञोपवीत (उपनयन) संस्कार हमर मिथिलाक संस्कृति, परंपरा आ जीवन पद्धति के एकटा अत्यन्त महत्वपूर्ण स्तंभ थिक। एहि संस्कार के मुख्य उद्देश्य बालक के ज्ञानक मार्ग पर अग्रसर करब, अनुशासन सिखाएब आ ओकरा समाजक प्रति उत्तरदायी बनेनाइ अछि। मुदा, आइ-काल्हि आधुनिकताक अन्हर में हमर एहि पवित्र धार्मिक अनुष्ठान मे बढैत आडम्बर आ तड़क-भड़क एकटा गंभीर चिंताक विषय बनि गेल अछि।
शास्त्रक अनुसार, यज्ञोपवीत एकटा सात्विक आ आध्यात्मिक अनुष्ठान थिक। एहि में सादगी, नियम-संयम आ ब्रह्मचर्यक पालन मुख्य होइत अछि। मुदा आजुक समय में एहि संस्कारक स्वरूप कतहु न कतहु बदलि रहल अछि:
डेकोरेशन आ पैघ होटलक चकाचौंध: जे संस्कार घरक आंगन वा मड़वा में सादगी सँ संपन्न होइत छल, ओकर जगह आब पैघ-पैघ मैरिज हॉल, फाइव-स्टार होटल आ कीमती डेकोरेशन कें दऽ देल गेल अछि।
दिखावा आ स्टेटस सिंबल: यज्ञोपवीत आब आध्यात्मिक यात्राक शुरुआत कम, आ समाज में अपन आर्थिक हैसियत (स्टेटस) देखबै कऽ माध्यम बेसी बनि गेल अछि।
फिजूलखर्ची आ खान-पानक तड़क-भड़क: आमंत्रण पत्र सँ लऽ कऽ विदाई धरि में बेहिसाब पैसा पानि जकाँ बहाउल जाइत अछि। सात्विक भोजनक स्थान पर आब तरह-तरहक आधुनिक आ विदेशी पकवानक काउंटर सजल रहैत अछि, जइ सँ एहि धार्मिक अनुष्ठानक सात्विकता प्रभावित होइत अछि।
फोटोग्राफी आ रील संस्कृति: बरुआ के ध्यान गुरु-मंत्र आ गायत्री दीक्षा पर कम, आ कैमराक सामने पोज़ देबा पर बेसी रहैत अछि। डीजे आ नाच-गानक शोर में मंत्रोच्चारक पवित्र ध्वनि कतहु हरा जाइत अछि।
एहि बढैत आडम्बरक कारण हमर समाज पर कतेको तरहक कुप्रभाव पड़ि रहल अछि:
आर्थिक दबाव: समाजक मध्यवर्गीय आ गरीब परिवार सेहो लोक-लाज आ “देखादेखी” के चक्कर में कर्ज लऽ कऽ यज्ञोपवीत करबाक लेल मजबूर भऽ जाइत छथि।
मूल उद्देश्य सँ भटकाव: जखन पूरा ध्यान ताम-झाम पर रहत, तखन बच्चा के संस्कारक असली अर्थ आ ओकर नियम जेना जकाँ त्रिकाल संध्या करब, जनेऊ के पवित्रता राखब इत्यादि कें बुझबाक समय आ माहौल कतऽ सँ भेटतै?
मिथिलाक लोक-गीत आ पारंपरिक विधि-विधानक जगह आब लाउडस्पीकर आ फूहड़ गान लेबऽ लागल अछि, जे हमर सांस्कृतिक धरोहर के नुकसान पहुँचा रहल अछि।
”संस्कार मन कें शुद्ध करबाक लेल होइत अछि, धन कें प्रदर्शन करबाक लेल नहीं।”
यदि हम अपन मिथिलाक एहि महान परंपरा के जीवित आ पवित्र राखऽ चाहैत छी, तऽ हमरा सभ के किछु गोट गप्प पर विचार करय पड़त:
सादगी कें अपनाउ: यज्ञोपवीत के आयोजन कें जतेक संभव हो सात्विक आ सादा राखल जाय।
ज्ञान पर जोर दियौ: बटुक के ई बुझाउ जे जनेऊ धारण कएलाक बाद ओकर जिम्मेदारी की अछि। ओकरा गायत्री मंत्र आ संध्या उपासनक नियम विस्तार सँ सिखाउ।
दिखावा बंद करी: जे धन फिजूलखर्ची में नष्ट भऽ रहल अछि, ओकरा बालकक उच्च शिक्षा वा समाजक कोनो कल्याणकारी काज मे लगाउ।
मिथिलाक संस्कृति अपन सादगी आ विद्वताक लेल जानल जाइत अछि, ताम-झामक लेल नहीं। समय रहैत हमरा सभ कें एहि बढैत आडम्बरक विरुद्ध सचेत होबऽ पड़त, ताकि हमर आबय बला पीढ़ी एहि संस्कारक आध्यात्मिक महत्व कें बुझि सकय, न कि एकरा मात्र एकटा देखौंसक ओदौद वला कार्यक्रम।
