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श्रीमद्भागवद्गीता षष्ठम् अध्याय

6 भ्यूज

ॐ श्री परमात्मने नमः!!

॥षष्ठोऽध्यायः॥

श्रीभगवानुवाच ।

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ॥
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥६-१॥

भगवान कहलनि:

जे कर्म केर फल केर परवाह कएने बिना अपन तय कर्तव्य पूरा करैत अछि – से कर्म केर त्यागी होयबाक संग-संग दृढ़ मन वाला सेहो होइछ; नहि कि ओ जे अग्निक बिना अछि, नहिये ओ जे कर्मक बिना (अक्रिय) अछि । 

तय कर्तव्य: नित्यकर्म – अपना लेल निर्धारित कर्म-कर्तव्य ।

कर्म केर त्यागी होयबाक संग-संग दृढ़ मन वाला: संन्यासी आर योगी ।

अग्निक बिना: जे वेद सब मे बतायल गेल कर्म (हवन, यज्ञादि कर्म) सब छोड़ि देने अछि, जाहि मे अग्नि केर जरूरत पड़ैत छैक, जेना अग्निहोत्र ।

कर्म केर बिना (अक्रिय): जे एहेन कर्म सब केँ छोड़ि देने अछि जाहि मे अग्नि केर सहायक रूप मे जरूरत पड़ैत छैक, जेना तपस्या आ इनार खुनेबा जेकाँ आरो पुण्यक काज सब ।

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ॥
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥६-२॥

हे पांडव, एकरा कर्म प्रति समर्पण (कर्मयोग) बुझू, जेकरा त्याग (संन्यास) कहैत छैक, कियैक तँ संकल्प (सांसारिक कामना सब केँ) छोड़ने बिना कियो कर्मयोगी नहि बनैत अछि ।

संकल्प – कल्पना करबाक शक्ति केर काज अछि, कल्पना बनेनाय, योजना बनेनाय आ फेर ओकरा किनार लगाकय भविष्यक नतीजा (परिणाम) सभक बारे मे सोचनाय, एकटा नव मार्ग पर नव ढंग सँ शुरुआत कएनाय, जाहि सँ अलग-अलग मुद्दा सब सामने आबैत रहैत अछि, आदि-आदि । कियो कर्मयोगी अथवा कर्म प्रति समर्पित (भक्त) नहि भ’ सकैत अछि, जे योजना सब बनबैत अछि आ कर्मक फल केर कामना करैत अछि ।

आरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ॥
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥६-३॥

ध्यान करयवला लोक (साधक) जे हृदयक शुद्धता प्राप्तिक इच्छा सँ एकाग्रता (ध्यान लगेबा दिश) बढ़ैत अछि, ओकरा लेल (निष्काम) कर्म कयनाइये सही बाट (रास्ता) कहल गेल अछिः फेर ओकरा लेल, जखन ओ एकाग्रता (ध्यान लगबय मे सफलता) प्राप्त कय लैछ, तँ कर्म नहि करब (अक्रिय होयब) केँ सही बाट (रास्ता) कहल गेल अछि । 

हृदय केर शुद्धि जाहिसँ एकाग्रता हो (ध्यान करय मे सहयोग भेटय) – योग । “एकटा ब्राह्मणक लेल एकत्व, समत्व, सत्य, सुधार, स्थिरता, नोकसान नहि पहुंचाबयवाला आदति ‘पन’ (पन माने बैन), सीधापन, आर समस्त कर्म सब सँ धीरे-धीरे दूर होयबाक जेकाँ आर कोनो सम्पत्ति नहि होइछ ।” – महाभारत, शांति-पर्व, १७५-३८ ।

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ॥
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥६-४॥

सच मे, जखन इंद्रिय सब या कर्म सब सँ कोनो लगाव (आसक्ति) नहि रहैछ, आर सबटा संकल्प छोड़ि देल जाइत अछि, तखन कहल जाइछ जे लोक एकाग्रता (ध्यान) पाबि गेल अछि ।

एकाग्रता पाबि गेल: योगारूढ़

सब संकल्प सभक त्यागी: “हे इच्छा, हम जनैत छी जे तोहर जैड़ कतय अछि; तूँ संकल्प सँ जन्म लेने छँ । हम तोहर बारे मे नहि सोचब, आर तूँ अपन जैड़ केर संगहि खत्म भ’ जेमें ।” – महाभारत, शांति-पर्व, १७७.२५.

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ॥
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥६-५॥

मनुष्य केँ स्वयं सँ स्वयं केँ उपर उठेबाक चाही, तेँ ओकरा एहि स्वयं केँ कमजोर नहि करबाक चाही । कियैक तँ ओ स्वयं टा स्वयं केर मित्र थिक, आर स्वयं टा स्वयं केर दुश्मन थिक । 

मनुष्य केर आत्म-ज्ञानी स्वभाव केँ एतय दुइ रूप सँ देखल गेल अछि, एक त ई आध्यात्मिक प्रगति (तरक्की) केर उद्देश्य आ आध्यात्मिक प्रगतिक विषय दुनू थिक, दोसर अहंता (ईगो) जेकरा उपर काज कयल जाइत अछि आर अहंता (ईगो) जे पहिल वला पर काज करैत अछि । यैह दोसरवला सक्रिय तत्त्व या अहंता (ईगो) केँ अपना (अपन सेल्फ – आत्मा यानि स्वयं) केँ उपर उठबयवला काज मे मजगूत रखबाक चाही, कियैक तँ जँ ई मित्र नहि बनत त दुश्मन बनि सकैत अछि; आर ऐगला श्लोक मे एकर कारण बतायल गेल अछि ।

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ॥
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥६-६॥

आत्मा (हमरा लोकनिक प्रकृतिक सक्रिय भाग) स्वयं (आत्मा) केर मित्र थिक, से ओकरा लेल जे एहि स्वयं अपना (आत्मा) केँ अपना आप (स्वयं आत्मा) द्वारा जितने अछि । लेकिन जे अपन स्वयं पर जीत हासिल नहि कय सकल अछि, ओकरा लेल ई (स्वयं) आत्मा शत्रुवत् छैक, जे (बाहरी) शत्रु (जेकाँ व्यवहार करैत) छैक ।

आत्मा ओकर मित्र छैक, जे समग्र शरीर आ इंद्रिय सभक समूह केँ नियंत्रण कय लेने अछि, आ जँ एना नहि भेल छैक त वैह ओकर दुश्मन होइत छैक ।

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ॥
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥६-७॥

स्वयं पर नियंत्रण रखनिहार आ शान्त व्यक्ति लेल, भगवान टा निरन्तर अनुभव करयवला विषय छथि, चाहे जाड़ हो कि गर्मी, सुख हो कि दुःख, संगहि मान हो कि अपमान । 

तेँ ओ नीक आ बेजा दुनू माहौल मे शान्त रहैत अछि ।

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ॥
युक्त इत्युच्यते योगी समालोष्टाश्मकाञ्चनः ॥६-८॥

जेकर हृदय ज्ञान आ अनुभूति सब सँ सन्तुष्टि सँ भरि गेल अछि, आर जे कखनहुँ नहि बदलैत अछि, जेकर इंद्रिय जीति लेल गेल अछि, आर जेकरा वास्ते माटि, पाथर आ सोना एक्के समान अछि; ताहि योगी केँ दृढ़ (स्थिर) कहल जाइत छैक । 

ज्ञान: शास्त्र सभक ज्ञान ।

अनुभूति – विज्ञान: शास्त्रक शिक्षा सभक अपन अनुभव ।

बिना बदलाव – निहाई जेकाँ । निहाई पर चीज सब केँ ठोकल आ आकार देल जाइत छैक, लेकिन निहाई ओहिनाक ओहने रहैत अछि’ ताहि तरहें ओकरा कूटस्थ कहल जाइत छैक – जेकर हृदय तखनहुँ नहि बदलैत छैक जखन तेहेन चीज सब उपस्थित होइ ।

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ॥
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥६-९॥

ओ श्रेष्ठता प्राप्त करैत अछि जे शुभचिंतक, मित्र, शत्रु, तटस्थ लोक, मध्यस्थ, घृणा करयवला, नातादार, आ नीक एवं बेजा लोक केँ समान रूप सँ देखैत अछि । 

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ॥
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥६-१०॥

योगी केँ लगातार हृदय केँ एकाग्र (ध्यान मे केन्द्रित) करबाक अभ्यास करबाक चाही, असगर एकान्त मे जेबाक चाही, मन आ शरीर केँ शान्त रखबाक चाही, आर आशा (उम्मीद) तथा परिग्रह (सम्पत्ति) सब सँ मुक्त हेबाक चाही । 

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ॥
नात्युच्छ्रतं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥६-११॥

एकटा साफ स्थान पर अपन आसन स्थापित करय, मजगूत, नहि बेसी ऊँच न बेसी नीचाँ, कपड़ा, खाल आ कुश-घास सँ बनल, एक केर बाद एक केँ राखिकय बनायल (आसन) । 

एक केर बाद एक व्यवस्थित: ओ (साधक) – जमीन पर कुश-घास व्यवस्थित राखिकय; ओकरा उपर, एकटा बाघ या हरिणक खाल, कपड़ा सँ झाँपल रहय ।

तत्रैकाग्रं मनः कृत्व यतचित्तेन्द्रियक्रियः ॥
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥६-१२॥

ओतय, ओहि आसन पर बैसिकय, मन केँ एकाग्र कयकेँ आर कल्पना करबाक शक्ति एवं इंद्रिय सभक क्रिया केँ वश मे कयकेँ, ओकरा हृदय केर शुद्धिक लेल योग केर अभ्यास करबाक चाही । 

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ॥
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥६-१३॥

ओ अपन शरीर, माथ आ गर्दैन केँ मजगूती सँ सीधा आ स्थिर राखय, (नेत्रगोलक केँ स्थिर राखैत, जेना कि) अपन नाकक नोक केँ देखि रहल हो, आर एम्हर-ओम्हर नहि देखय ।

ओकर नाक केर नोक पर टकटकी लगेनाय – एतय शाब्दिक अर्थ नहि भ’ सकैत छैक, कियैक तँ तखन मन मात्र ओतहि केन्द्रित हेतैक, स्वयं पर नहि; जखन ध्यान मे आँखि आधा बन्द होइत छैक आ नेत्रगोलक स्थिर होइत छैक, त दृष्टि, मानू, नाक केर नोक पर निर्देशित होइत छैक ।

प्रशान्तात्मा विगतभीर्बह्मचारिव्रते स्थितः ॥
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥६-१४॥

हृदय सँ शान्त ओ निडर भ’ कय, ब्रह्मचर्यक व्रत मे दृढ़ बनिकय, मन केँ नियंत्रण मे राखिकय, आ हमेशा हमरहि (परमात्मा केर) ध्यान करैत, हमरे अपन सब सँ पैघ लक्ष्य मानिकय (योग मे) बैसय । 

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ॥
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥६-१५॥

एहि तरहें मन केँ हमेशा दृढ़ (स्थिर) राखिकय, शान्त मनवाला योगी हमरा मे रहयवला शान्ति केँ प्राप्त करैत अछि – ओ शान्ति जेकरा निर्वाण (मोक्ष) मे भेटैत छैक । 

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः॥
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥६-१६॥

योग मे सफलता ओकरा लेल नहि छैक जे बहुत बेसी खाइत अछि या बहुत कम खाइत अछि – आ नहिये, हे अर्जुन, ओकरा लेल छैक जे बहुते बेसी या बहुते कम सुतैत अछि । 

योग-शास्त्र कहैत अछि: “आधा (पेट) आहार (भोजन) आ मर-मसाला (अनाजक अतिरिक्तक चीज-वस्तु) लेल, तेसर चौथाइ भाग पानिक लेल, आर चारिम चौथाइ भाग हवा अयबा-जयबा लेल बचाकय रखबाक चाही ।”

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ॥
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥६-१७॥

जे भोजन आ मनोरंजन मे, काज करय केर प्रयत्न मे, आर सुतय तथा जागय मे संयम रखैत अछि, ओकरा लेल योग दुःख केँ नाश करयवला बनि जाइत छैक । 

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ॥
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥६-१८॥

जखन पूरे तरीका सँ संयमित कयल गेल म‍न (चित्त) शान्ति सँ मात्र आत्मा मे रहैत अछि, सम्पूर्ण इच्छा सब सँ मुक्त, तखन ओकरा (आत्मा मे) स्थिर कहल जाइत छैक ।

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ॥
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥६-१९॥

“जेना हवा सँ सुरक्षित स्थान पर राखल गेल दीपक नहि टिमटिमाइछ (भुकभुकाइछ)” – एहने उपमा शान्त मनवला योगीक लेल प्रयोग कयल गेल अछि, जे स्वयं पर ध्यान लगेबाक अभ्यास करैत अछि ।

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ॥
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥६-२०॥
सुमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥६-२१॥
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ॥
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥६-२२॥
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ॥
स निश्चयेन योक्तव्यो योहोऽनिर्विण्णचेतसा ॥६-२३॥

जखन मन, ध्यान लगेबाक अभ्यास सँ पूरापूरी नियंत्रण मे रहिकय, शान्ति पाबि लैत अछि, आर जखन स्वयं (आत्मा) केँ स्वयं सँ देखैत अछि, तखन मनुष्य अपना आप मे सन्तुष्ट (प्रसन्न) रहैत अछि; जखन ओकरा अनन्त प्रसन्नता (परमानन्द, परम सन्तुष्टि) प्राप्त होइत छैक – जेकरा (शुद्ध) बुद्धि अनुभव करैत छैक आर जे इन्द्रिय सब सँ परे होइत अछि, आर जेतय पहुँचिकय (मनःस्थिति केँ स्थापित कय केँ) ओ अपन एहि असल (यथार्थ, वास्तविक) अवस्था सँ कखनहुँ नहि भटकैत अछि; आर जेकरा पाबिकय, ओ कोनो दोसर चीज केँ ओकरा सँ बेसी नीक नहि मानैछ, आर जाहिठाम ओ स्थापित भ’ जाइछ, ओहिठाम भारी दुःख सेहो ओकरा परेशान नहि करैत छैक; ओकर एहि अवस्था केँ जानू (बुझू), जेकरा ‘योग’ केर नाम सँ जानल जाइत छैक – दर्द (कष्ट) केर सम्पर्क सँ अलग रहबाक एकटा अवस्था (मानल जाइत छैक) । एहि योग केँ हृदय केर कार्यक्षमता मे कोनो कमियो (अयला) सँ बिना परेशान भेने, अत्यन्त दृढ़ता (लगन) केर संग अभ्यास करबाक चाही ।

जेकरा (शुद्ध) बुद्धि अनुभव करैत छैक …: जेकरा शुद्ध बुद्धि इन्द्रिय सब सँ अलग भ’ कय बुझि सकैत अछि । जखन ध्यान मे मन गहिंराइ सँ एकाग्र होइत अछि, इंद्रिय सब काज नहि करैछ आर अपन कारण – यानी मन मे मिल जाइछ; आर जखन मन स्थिर रहैछ, जाहि सँ खाली बुद्धि काज कय रहल होइत छैक, या दोसर शब्द मे, मात्र ज्ञान टा उपस्थित रहैत छैक, तखन अवर्णनीय आत्माक अनुभूति होइत छैक । 

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योग केर तरीका – ध्यान पर विचार करय जाउ । मन आ बुद्धि केर हालत केहेन हेबाक चाही, इंद्रिय सब केना काज करैत छैक, आदि । हृदय केर कार्यक्षमता मे कमी (डिप्रेशन अफ हार्ट) केँ नियंत्रण मे रखनाय बहुत जरूरी छैक, स्वयं सँ परमात्माक अतिरिक्त किछुओ आर नहि अनुभव करू । 

सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ॥
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥६-२४॥

संकल्प सँ उत्पन्न समस्त कामना सब केँ बिना कोनो संकोच केँ त्याग कयनाय तथा इंद्रिय सभक सम्पूर्ण समूह केँ मात्र मनहि टा द्वारा सब दिशा मे ओकर विषय सब सँ पूर्णतया निग्रह कय देनाय;

शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया ॥
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥६-२५॥

बुद्धि केँ धीरज मे राखिकय,मन केँ आत्मा पर स्थिर कयकेँ, ओकरा धीरे-धीरे शान्ति (स्थिरता) प्राप्त करबाक चाही; ओकरा कोनो चीजक बारे नहि सोचबाक चाही । 

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ॥
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥६-२६॥

जेहो कारण सँ बेचैन, अस्थिर मन भटकैत अछि, ओकरा ताहि चीज सब सँ मोड़िकय, मात्र आत्माक वश मे कय लिय’ । 

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ॥
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥६-२७॥

सच मे, परम आनन्द ओहि योगी केँ भेटैत छैक जेकर मन पूरापूरी शान्त हो, जेकर भावना सब शान्त हो, जे ब्रह्म बनि गेल हो, आर जे कलंक (दाग सब) सँ मुक्त हो ।

ब्रह्म बनि गेल हो: यानी, जे ई जानि लेलक जे सब किछु ब्रह्म थिक । 

कलंक (दाग सब) – नीक आर बेजा केर (द्वंद्व) मे पड़नाय एतय कलंक (दाग सब) लगनाय बुझल जेबाक चाही ।

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ॥
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥६-२८॥

योगी, (नीक आर बेजा केर) दाग सब (कलंक) सँ मुक्त भ’ कय, लगातार मन केँ एहि तरहें लगाकय, आसानी सँ ब्रह्म केर सम्पर्क केर अनन्त आनन्द पाबि लैत अछि ।

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ॥
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥६-२९॥

योग सँ एकाग्र हृदय सँ, सब चीज वास्ते एक्के जेकाँ नजरि (दृष्टि) सँ, ओ सब प्राणी सब मे आत्मा केँ आ सब प्राणी सब केँ आत्मा मे देखैत अछि ।

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ॥
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥६-३०॥

जे सब वस्तु सब मे हमरा देखैत अछि आर सब वस्तु सब केँ हमरा मे देखैत अछि, ओ कहियो हमरा सँ अलग नहि होइत अछि आर नहिये हम ओकरा सँ अलग होइत छी । 

अलग: यानि, समय, जगह, या बीच मे आबयवाली कोनो चीज (बाधा, फर्क, आदि) सँ ।

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ॥
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥६-३१॥

जे एकात्म भाव मे स्थित रहिकय, हमर पूजा करैत अछि, हम जे समस्त प्राणी मे निवास करैत छी, चाहे ओकर जीवन केहनो हो, ओ योगी हमरा मे रहैत अछि । 

हमर पूजा करैत अछि: हमरा सभक आत्माक रूप मे अनुभूति करैत अछि ।

एकात्म भाव मे स्थित: यानी, सब द्वैत केर मूल एकता मे सोझराकय (एकता मे परिणत कय केँ अपन मन केँ मना लैछ) ।

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ॥
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥६-३२॥

हे अर्जुन, जे हरेक ठाम सुख या दुःख केँ वैह मापदंड सँ देखैछ, जाहि मापदंड सँ ओ सुख या दुःख केँ अपना लेल देखैछ, ओ योगी सब सँ श्रेष्ठ (उच्च) मानल जाइत अछि । 

ई देखिकय कि जे चीज ओकरा सुख या दुःख दैत छैक, वैह सब प्राणी सब केँ सेहो सुख या दुःख दैत छैक, ओ सब सँ श्रेष्ठ (उच्च) योगी, सभक लेल नीक आ केकरो लेल खराब नहि चाहैत अछि – ओ हमेशा सब प्राणी सभक लेल नुकसान नहि पहुँचाबयवला आ दयालु होइत अछि । 

अर्जुन उवाच ।

योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ॥
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम् ॥६-३३॥

अर्जुन कहलनि:

हे मधु केर संहारक (मधुसूदन), अपने जे ई योग सिखेलहुँ अछि, जे समता (सब मे एकसमान दृष्टि या भावना) सँ बनल अछि, मन केर बेचैनीक कारण हमरा एकर टिकबाक संभावना नहि देखाइत अछि । 

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलबद्दृढम् ॥
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥६-३४॥

वास्तव मे, हे कृष्ण, मन बेचैन, अशान्त, मजगूत आर अडिग अछि; हम एकरा उपर नियंत्रण पेनाय हवा पर नियंत्रण पेनाय जेकाँ कठिन मानैत छी ।

“कृष्ण”, “कृष्” सँ लेल गेल अछि, परिमार्जन करबाक लेलः कृष्ण केँ एहि द्वारे कृष्ण कहल जाइत छन्हि कियैक तँ ओ अपन भक्त सभक पाप आ अन्य खराबी सब केँ परिमार्जित कय दैत छथि (दूर कय दैत छथि) । 

श्रीभगवानुवाच ।

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ॥
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥६-३५॥

भगवान कहलनि:

बेशक, हे महाबाहु, मन बेचैन अछि, आर ओकरा संयमित (नियंत्रित) करब मुश्किल अछि; लेकिन हे कुंती पुत्र, अभ्यास आर परित्याग (संन्यास, त्याग) सँ एकरा उपर नियंत्रण (संयम) कयल जा सकैत अछि । (अपन मनोनुकूल भाव सँ एकरा शासित करैत संयमित राखल जा सकैत अछि ।)

देखू पतंजलि केर योग सूत्र, १. १२.

अभ्यास: मन केँ ओकर बिना बदलल शुद्ध बुद्धि केर स्थिति मे स्थिर करबाक सत्य आ निरन्तर (बेर-बेर केर) प्रयत्न, चुनल गेल आदर्श पर लगातार ध्यान लगाकय कयनाय । 

परित्याग: कोनो सुखक इच्छा सँ मुक्ति, चाहे ओ देखल (भोगल) हो या अनदेखा (अनभोगल) हो, जे ओहि मे खराबी छैक एहि बातक निरन्तर समझ सँ भेटैत अछि । 

असंयतात्मना योगो दुष्प्रभाव इति मे मतिः ॥
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥६-३६॥

अनियंत्रित लोकक लेल योग केर स्थिति मे पहुँचनाय मुश्किल छैक; एना हमर मननाय अछि; लेकिन जे आत्मनियंत्रित अछि, सही तरीका सँ कोशिश करैत अछि, से ई पाबि सकैत अछि । 

हमर नोट: पैछला दुनू श्लोक मे अर्जुन जे पुछने रहथि आर श्री कृष्ण हुनका जे सब जवाब देलनि, ताहि पर ध्यान देल जाउ । अभ्यासहि सँ लोक पूर्ण बनैत अछि । 

अर्जुन उवाच ।

अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ॥
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥६-३७॥

अर्जुन कहलनि:

श्रद्धा सँ युक्त रहितहु, स्वयं केँ नियंत्रित करय मे असमर्थ, मन योग सँ भटकि रहल अछि, योग मे पूर्णता प्राप्त करय मे असफल भेला पर, हे कृष्ण, ओकरा केहेन अन्त (परिणाम) भेटैत छैक ?

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ॥
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥६-३८॥

हे महाबाहु, ब्रह्म केर मार्ग मे भ्रमित, की ओ दुनू सँ खसिकय, बिना सहारा केँ, फाटल मेघ जेकाँ नष्ट नहि भ’ जाइत अछि ?

दुनू सँ खसल: यानी ज्ञान आर कर्म दुनू मार्ग सँ खसल (च्यूत) ।

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ॥
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥६-३९॥

हे कृष्ण, हमर ई सन्देह (शक) अपने केँ पूरापूरी दूर कय देबाक चाही; कियैक तँ अपनेक अलावे केकरो आर लेल एहि सन्देह केँ दूर कयनाय सम्भव नहि अछि । 

कियैक तँ सब किछु जानयवला भगवान सँ नीक कियो गुरु नहि भ’ सकैत छथि । 

श्री भगवानुवाच ।

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ॥
नहि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥६-४०॥

भगवान कहलनि:

सच मे, हे पृथापुत्र, ओकर नाश नहि तँ एतय होइत छैक आ नहिये परलोक मे, कियैक तँ नीक करयवला, हे तात (हमर पुत्र), कखनहुँ दुःखी नहि होइछ ।

तात – पुत्र । एकटा शिष्य केँ बेटा जेकाँ देखल जाइत छैक; अर्जुन केँ एहि तरहें सम्बोधित कयल गेलनि अछि कियैक तँ ओ स्वयं केँ कृष्णक शिष्य केर स्थान पर रखने छलथि ।

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ॥
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥६-४१॥

धर्मी लोक सभक संसार मे पहुँचिकय, आर ओतय हमेशा रहलाक बाद, योग सँ भटकि गेल लोक पवित्र आ खुशहाल (श्रीमान्) लोकक घर मे दोबारा जन्म लैत अछि ।

हमेशा रहयवला साल (समय): मतलब पूरे तरह सँ नहि, बल्कि बहुत लंबा समय धरि ।

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ॥
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥६-४२॥

या फेर ओ मात्र ज्ञानी योगी सभक परिवार मे जन्म लैछ; सच मे, एहेन जन्म एहि दुनिया मे भेटनाय बहुत मुश्किल छैक ।

बहुत मुश्किल: पैछला श्लोक मे बतायल गेल जन्महु सँ बेसी मुश्किल ।

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ॥
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥६-४३॥

ओतय ओ अपन पैछला शरीर मे भेटल बुद्धि सँ जुड़ि जाइत अछि, आर हे कुरु लोकनिक सन्तान, पूर्णताक वास्ते (ओ) पहिने सँ आर बेसी प्रयत्न करैत अछि । 

बुद्धि – संस्कार: प्रभाव (सांस्कारिक प्रस्तुति सब) आर आदति सभक रूप मे अनुभव केर भंडार ।

पूर्णताक लेल प्रयत्न करैत अछि: अपन पैछला जन्म सब मे भेटल चीज सब सँ बेसी उच्च स्थान पर पहुँचबाक लेल बेसी मेहनत करैत अछि । 

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ॥
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥६-४४॥

सिर्फ ओहि पहिलुका (पूर्व जन्म सभक) अभ्यास मात्र सँ, ओ अपना आप (स्वयं) केर बदौलत आगाँ बढ़ैत अछि । योग जनबाक जिज्ञासा रखनिहार सेहो वैदिक कर्म करनिहार सँ आगाँ बढ़ि जाइत अछि । 

अपना आप केर बदौलत आगाँ बढ़ैत अछि: अपन पैछला जन्म मे अपना लेल तय कयल गेल रास्ताक लक्ष्य धरि, अपन पैछला संस्कार सभक बल पर पहुँच जाइत अछि, भले ही ओ ओहि बारे मे अनजान रहय – या कोनो गलत कर्म केर दखल केर कारण सँ ओकरा आगू बढ़ाबय लेल तैयार सेहो नहि रहय । 

आगाँ बढ़ि जाइत अछि, आदि: यानी शब्द-ब्रह्म, यानि वेद सँ आगाँ निकलि जाइत अछि ।

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ॥
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥६-४५॥

योगी, मेहनत सँ कोशिश करैत, कलंक (दाग आदि) सँ मुक्त भ’ कय, धीरे-धीरे कतेको जन्म मे पूर्णता प्राप्त करैत, सबसँ ऊंच लक्ष्य धरि पहुँचैत अछि ।

हमर नोट: ई चैप्टर हमरा सब लेल ई बुझबाक वास्ते बहुत जरूरी अछि जे हम सब अपन जीवन केना जीबी । अर्जुनक सवाल आ कृष्ण केर जवाब पर ध्यान दी । 

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानीभ्योऽपि मतोऽधिकः ॥
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥६-४६॥

योगी केँ तप करयवला आर शास्त्र सब सँ ज्ञान प्राप्त करयवला सँ सेहो श्रेष्ठ मानल जाइछ । ओ (वेद मे कहल गेल) कर्म करयवला सब सँ सेहो श्रेष्ठ होइछ । तेँ, हे अर्जुन, अहाँ योगी बनू । 

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ॥
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥६-४७॥

आर सब योगी लोकनि मे, जे अपना भीतर केर आत्मा केँ हमरा मे समाहित कय केँ, श्रद्धा सँ हमरहि मे समर्पित भ’ जाइत छथि, हुनका हम सब सँ बेसी दृढ़ (अटल) मानैत छी ।

सब योगी लोकनि मे, आदि: सब योगी लोकनि मे सँ जे स्वयं केँ सब ठाम मौजूद (सर्वव्यापी) अनन्त (परमात्मा) मे समर्पित कय दैत छथि, ओ ताहि सब सँ बेसी नीक छथि जे सब स्वयं केँ छोट आदर्श सब, या देवता सब, जेना वसु, रुद्र, आदित्य आदि मे समर्पित कय दैत छथि । 

इति ध्यानयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥

The end of the sixth chapter, designated The Way of Meditation.

हरिः हरः!!

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