ॐश्री परमात्मने नमः !!
॥तृतीयोऽध्यायः॥
अर्जुन उवाच ।
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ॥
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥३-१॥
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धि मोहयसीव मे ॥
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥३-२॥
अर्जुन कहलनि:
हे जनार्दन, जँ अपनेक हिसाब सँ ज्ञान कर्म सँ बेसी नीक अछि, तखन हे केशव, अपने हमरा एहि भयानक कर्म (युद्ध) मे कियैक लगा रहल छी ? एहि उल्टा-सीधा बात सब सँ, अपने मानू जे हमर बुद्धि केँ मोहित कय रहल छी; – हमरा ओ एक टा निश्चित बात बुझाउ, जाहि सँ हम सब सँ ऊँच पद केँ पाबि सकी ।
हमर नोट: अपना सब पैछला अध्याय (एक आ दुइ मे) देखि सकैत छी, चूँकि अर्जुन रास्ता देखेबाक लेल परम गुरुक रूप मे श्री कृष्णक शरण लेलनि अछि, आर कृष्ण हुनका बहुते नीक जेकाँ बुझेलनि जे ओ सत्य केँ चिन्हथि आर अपन एखुनका जन्म, जाति आ धर्मक उद्देश्य मुताबिक अपन फर्ज अदा करथि । आर आब, अध्याय ३ शुरू होइत अछि, आउ हरेक श्लोक सँ जुड़ल रहू ।
श्री भगवानुवाच ।
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयाऽनघ ॥
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥३-३॥
भगवान कहलनि:
हे निष्पाप अर्जुन ! सृष्टिक आरम्भ मे हम एहि दुनिया केँ भक्ति करबाक दोहरा (दुइ विधा वला) रास्ता देने रही; – एकटा ध्यान करयवलाक लेल ‘ज्ञानक रास्ता’, आर दोसर काज करयवलाक लेल कर्मक रास्ता ।
ध्यान करयवला: ओ जे बाहरी काजक बदला ध्यान कयनाय पसिन करैत अछि । (जेकर स्वभाव ध्यान करैत अपन लक्ष्य – जीवन संचालन करैछ ।)
कर्म मे सक्रिय: ओ जे ध्यानक संग या बिना ध्यानहि केँ बाहरी काज सब (सांसारिक कर्म सब) मे विश्वास करैत अछि ।
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ॥
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥३-४॥
कर्म नहि कयला सँ कियो कर्महीनता (नैष्कर्म्य, निष्क्रियता) धरि नहि पहुँचैछ; मात्र कर्म करब छोड़ि देला (कर्म सँ संन्यास लेला) सँ कियो पूर्णता (सिद्धि) धरि नहि पहुँचैछ ।
कर्महीनता आर पूर्णता: ई एक जेकाँ शाब्दिक भाव थिक, मतलब, अनन्त (ब्रह्म) केर संग एक भ’ गेनाय आर जरूरत केर समस्त विचार सब सँ मुक्त भ’ गेनाय । जे आदमी एहि स्थिति मे पहुँचि गेल अछि, ओकरा कोनो इच्छा (चाहत) केँ पेबाक लेल काज करबाक कोनो जरूरत या इच्छा नहि रहि जाइछ । स्वयं मे पूर्ण संतुष्टि ओकर प्राकृतिक अबस्था होइत छैक । (देखी ३-१७) ।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ॥
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥३-५॥
यथार्थतः कियो कर्म कयने बिना एकहु क्षण लेल विश्राम नहि कय सकैछ; कियैक तँ प्रकृति सँ उत्पन्न गुण सब द्वारा सब केँ, वास्तव मे, निस्सहाय भ’ कार्य करबाक लेल बाध्य कयल जाइत छैक ।
सब कियो कार्ये करबाक लेल बनल अछि: सब मनुष्य बन्धन मे रहैत अछि ।
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ॥
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥३-६॥
जे कर्मेन्द्रिय सब केँ रोकिकय, मन मे इंद्रिय सभक विषय केर विचार सब घुमबैत रहैत अछि, ओ भ्रमित समझवाला पाखंडी (मिथ्याचारी) कहाइत अछि ।
हमर नोट: एहि श्लोक केर मूल अर्थ केँ बुझू, हमरा सब केँ कखनहुँ एहेन देखाबा नहि करबाक चाही जेना हम बड पवित्र छी आर हमर इंद्रिय सब सँ जुड़ल कोनो इच्छा नहि अछि । बल्कि हमरा सब केँ भितरे-भीतर इच्छा सब केँ छोड़बाक लेल इंद्रिय सब केँ रोकबाक अभ्यास करबाक चाही ।
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभ्यतेऽर्जुन ॥
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥३-७॥
मुदा हे अर्जुन, जे मन सँ इंद्रिय सब केँ नियंत्रित कयकेँ, बिना आसक्ति केर, अपन कर्मेंद्रिय सब केँ कर्मक रास्ता पर लगबैत अछि, वैह श्रेष्ठ अछि ।
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ॥
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिध्येदकर्मणः ॥३-८॥
अहाँ जरूरी काज (नियत कर्म) सब करू; कियैक तँ काज नहि करय सँ काज कयनाय बेसी नीक होइछ; आर जँ अहाँ काज नहि करब त शरीरहु केर गुजारा सम्भव नहि होयत ।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ॥
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥३-९॥
यज्ञ वास्ते कयल गेल काजक अलावा दोसर काज सब सँ दुनिया बन्हा चुकल अछि; तेँ, हे कुन्तीपुत्र, अहाँ बिना कोनो लगाव (आसक्ति) केँ मात्र यज्ञक लेल कर्म करू ।
यज्ञ: केर मतलब अछि कोनो धार्मिक रीति, यज्ञ, पूजा: या कोनो नीक अथवा आध्यात्मिक उद्देश्य सँ कयल गेल कर्म । एकर मतलब देवता सेहो अछि । तैत्तिरीय-संहिता (१, ६.४) कहैत अछि, “यज्ञ स्वयं विष्णु छथि” ।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ॥
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्तिवष्टकामधुक् ॥३-१०॥
प्रजापति शुरू मे यज्ञक संग मनुष्य केँ बनौलनि आ कहलनि, “एहि सँ अहाँ सब बढ़ब; यैह अहाँ सभक इच्छाक दूध दयवाली गाय होयत ।”
देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ॥
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥३-११॥
“एहि (यज्ञ) केर संग अहाँ सब देवता लोकनिक पोषण करू, आर ओ देवता लोकनि अहाँ लोकनिक पोषण करताहः एहि तरहें एक-दोसर केँ पोषित रखला सँ अहाँ सब केँ सर्वोच्च लाभ (परमहित – मोक्ष) भेटत ।
देवता: (ओ जे दिव्य छथि – जिनका मे चमक छन्हि) एहि जीवमंडल मे मनुष्य सब सँ काफी उपर रहनिहार, जे ब्रह्मांडीय कार्य सभक प्रभारी सब छथि ।
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ॥
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥३-१२॥
“यज्ञ सँ पोषित देवता अहाँ सब केँ मनक चाहल चीज (अभीष्ट भोग केर फल) देताह ।” तेँ, जे देवता सभक देल गेल चीज सब केँ बिना हुनका (बदला मे) देने (सौंपने) भोगैत अछि, ओ सच मे चोर अछि ।
हमर नोट: एहि श्लोक ९, १०, ११ आ १२ मे भगवान कृष्णक कहल हरेक शब्द केँ जरूर मानू । जीवन मे कखनहुँ चोर नहि बनू । देवता लोकनिक आ पितर लोकनिक सेहो देवतहि सब जेकाँ कृतज्ञ रहू । देवता हमरा सब केँ आशीर्वाद दैत छथि, ई एहि तरहें स्पष्ट अछि । भजन बिना चैन न आए राम !
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ॥
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥३-१३॥
यज्ञक बचल भोजन (शेषान्न – प्रसाद) खायवला नीक लोक सब पाप सँ मुक्त भ’ जाइत छथि; मुदा जे सिर्फ अपनहि टा लेल भोजन बनबैत अछि, ओ पापी लोक पापे टा खाइत अछि ।
देव-यज्ञ: देवता लोकनि लेल बलिदान देनाय (हविष्य सौंपनाय, चढ़ेनाय),
ब्रह्म-यज्ञ: शास्त्र सब केँ पढ़नाय आर पढ़ेनाय,
पितृ-यज्ञ: अपन पुरखा सब केँ जल देनाय,
नृ-यज्ञ: भूखल लोक केँ भोजन खुएनाय, आर
भूत-यज्ञ: छोट जानवर सब केँ भोजन खुएनाय –
ई पाँच टा नित्यदिनक काज थिक जे लोक केँ पाँच गुना पाप सब सँ मुक्त करैत अछि, जे पाप सब एकटा गृहस्थक जीवन मे जीवहत्याक कारण जरूरी होइछः (१) ढेकी आ उक्खैड़, (२) जाँतक पाथर, (३) चूल्हा, (४) जल केर घैल, आ (५) झाड़ू केर उपयोग सँ भेल करैत अछि ।
हमर नोटः गौर करू । हम-अहाँ अपन जीवन जिबैत समय जानल-अन्जानल कतेको रास पाप करैत छी । प्राचीन जीवनशैली मे ढेकी-उक्खैड़, जाँत, आदिक उदाहरण दैत बुझायल गेल अछि । पाँच टा कर्म जीवनपद्धतिक हिस्सा थिक । एहि सँ भेल पापक निवारण लेल पाँच तरहक हित-कर्म (यज्ञ) केर उपाय सेहो निर्दिष्ट अछि । एहि संसार मे प्रकृति केर शक्ति आ तंत्र केर संचालक देवता सब प्रति कृतज्ञ रहि हुनका यथासम्भव हविष्य – जल, फूल, अच्छत, नैवेद्य आदि चढ़ेबाक चाही । देवता केँ प्रसन्न करयवला कतेको रास तरीका सब शास्त्र द्वारा वर्णित अछि । कर्मकांडीय परम्परा सेहो यैह देव-आराधनाक एकटा ठोस उपाय अछि । हालांकि एहि मे पोंगापन्थी सब ततबे घुसा देल गेल अछि जाहि सँ यदाकदा मनक शुद्ध भावना सेहो प्रभावित होइत अछि, तेँ भावना शुद्ध राखिकय देवता जे हमरा सभक जीवनयापन मे अनेक ढंग सँ सहयोग कय रहल छथि, हुनका प्रति हम सब कृतज्ञ आ उपकृत् रहैत सेवा-अर्पण अवश्य करी । भजन-कीर्तन, स्तुति गायन, पाठ, नाम जप आदि अनेकों तरीका अछि । तन, मन आ वाणी-विचार सब किछु सँ हुनका प्रति समर्पणक भावना बनेने रहब । तहिना ब्रह्म-यज्ञ, पितृ-यज्ञ, नृ-यज्ञ आ भूत-यज्ञ केर महत्व बुझैत अपन जीवनक दैनिक चर्या शुद्ध बनेने रही ।
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ॥
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥३-१४॥
अन्न (खेला) सँ जीव केर जन्म होइत अछि; वर्षा सँ अन्न (खाना) बनैत अछि; यज्ञ सँ वर्षा होइत अछि; आर यज्ञ कर्म सँ जन्म लैत अछि ।
यज्ञ: एहिठाम एकर मतलब स्वयं बलिदान अर्पित करयवला कार्य (यज्ञ कर्म) नहि अछि, मुदा ओ सूक्ष्म सन सिद्धान्त अछि जाहि मे ई (यज्ञ) परिणत भ’ जाइछ, ई कयल गेलाक बाद जाहि फल रूप मे अभरैत अछि तेकर वर्णन कयल गेल अछि । एकरा तकनीकी तौर पर ‘अपूर्व’ कहल जाइत छैक ।
वेद मे कहल गेल कर्म या बलिदान (हविष्य) अर्पित करयवला कार्य ।
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ॥
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥३-१५॥
कर्म केँ वेद सँ आ वेद केँ अविनाशी (परमपिता परमात्मा) सँ उदय भेल (ज्ञात भेल) जानू । तेँ, सब जगह पसरल (सर्वव्याप्त) वेद हमेशा यज्ञ टा मे केन्द्रित रहैत अछि ।
सब जगह पसरल वेद (सर्वव्याप्त): कियैक तँ ई सब विषय केँ प्रकाशित करैछ आ सम्पूर्ण ज्ञान केर भंडार अछि, कियैक तँ ई सर्वज्ञ (परमात्मा – ब्रह्माण्ड रचयिता) द्वारा छोड़ल गेल स्वांस थिक । एकरा हमेशा यज्ञ टा मे केन्द्रित कहल जाइछ, कियैक तँ ई मुख्य रूप सँ यज्ञ सँ सम्बन्धित अछि, जे कि इच्छाक संग (सकाम) या बिना इच्छा (निष्काम) केर लक्ष्य, चाहे ओ समृद्धि (धन-सम्पत्ति-सखा सन्तान आदिक सम्पन्नता) हो या अन्तिम मुक्ति (मोक्ष), से प्राप्त करबाक साधन थिक ।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ॥
अधायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥३-१६॥
हे पृथापुत्र, जे एहि प्रकार सँ घुमैत चक्र केर अनुसरण नहि करैत अछि, पाप मे जिबैत अछि, आर इन्द्रिय मे सन्तुष्ट रहैछ, से व्यर्थहि जिबैत अछि ।
कर्म चक्र केर आरम्भ प्रजापति वेद आ यज्ञ केर आधार पर कएने रहथि ।
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ॥
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥३-१७॥
मुदा जे मनुष्य स्वयं (आत्मा) प्रति समर्पित अछि, स्वयं सँ सन्तुष्ट अछि, आ सदिखन स्वयं मात्र सँ सन्तुष्ट रहैछ, ओकरा लेल कोनो कार्य (कर्म) करब जरूरी नहि रहि जाइछ ।
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ॥
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥३-१८॥
एहि संसार मे ओकरा नहि तँ (कर्म) कयला सँ कोनो (लाभ) प्राप्त करबाक उद्देश्य रहि जाइत छैक, आ न कर्म नहि कयला सँ (ओकरा कोनो हानि होइत छैक), आर नहिये कोनो वस्तुक लेल ओकरा केकरो उपर निर्भर रहबाक (आवश्यकता) होइत छैक ।
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ॥
असक्तो ह्याचरन् कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥३-१९॥
तेँ, अहाँ हमेशा जरूरी काज बिना कोनो लगाव (आसक्ति) केँ करू; बिना कोनो लगाव केर काज कयला सँ लोक सब सँ ऊँच स्थान (पद) केँ प्राप्त करैत अछि ।
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ॥
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि ॥३-२०॥
सच मे, मात्र काज कयले टा सँ जनक आ दोसर कतेको लोक सिद्धि प्राप्त कयलनि; आर, मात्र लोक केँ रास्ता देखेबाक लेल, अहाँ केँ सेहो काज करबाक चाही ।
लोक केँ रास्ता देखेनाय: एहि संस्कृत शब्द केर मतलब अछि, लोक केँ एकठाम करब (लोकसंग्रह) – यानी सही रास्ता पर आनब (संपश्यन्) ।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ॥
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥३-२१॥
जेहो किछु (कर्म) उत्तम (नीक) लोक करैत छथि, दोसर लोक सेहो वैह कर्म सभक अनुसरण करैत अछि । जे किछु ओ (नीक लोक सब) अपन काज (उदाहरण) सँ देखबैत छथि, (बाकी) लोक ओकरे अनुसरण करैत अछि ।
(श्लोक मे प्रयुक्त शब्द अनुवर्तते – अनुवर्तन – अपन व्यवहार मे उतारनाय – यानि श्रेष्ठतर लोकक कयल आदर्श कर्म केँ बाकी लोक अपन व्यवहार मे उतारैत अछि ।)
हमर नोट: ई सबसँ जरूरी बात छैक जे हमरा सब केँ याद रखबाक चाही आर हृदय सँ सुनिश्चित करबाक चाही जे हम अपना सँ बेसी नीक लोकक जरूर अनुसरण (फॉलो) करब आर जेतय कतहु संयोगवश हमरा लग आर बेसी नीक सोच (विचार) भेटत, हम ओहो करबाक कोशिश करब ।
न मे पार्थास्तु कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन ॥
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥३-२२॥
हे पृथापुत्र, हमर कोनो कर्तव्य (कर्म) नहि अछि, एहेन किछुओ नहि अछि जे हम प्राप्त नहि कयलहुँ अछि; आर तीनू लोक मे एहेन किछुओ नहि अछि जे हमरा प्राप्त करबाक अछि; तैयो, हम कर्म करैत रहैत छी ।
यदि ह्येहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यन्द्रितः ॥
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥३-२३॥
हे पृथापुत्र, अगर हम बिना आराम कएने काज करैत नहि रहब, त लोक सब हरेक रूप सँ हमरहि अनुसरण करय लागत ।
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ॥
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥३-२४॥
अगर हम काज नहि करब, त ई दुनिया सब खत्म भ’ जायत । हम जातिक सम्मिश्रण (वर्णसंकर) बनेबाक कारण बनब, आर एहि जीव सब केँ बर्बाद (नाश) कय देब ।
(स्वयं भगवान् रहितो कृष्ण निरन्तर कर्म करैत रहबाक सर्वश्रेष्ठ उदाहरण – आदर्श जेकरा हम-अहाँ अनुसरण करैत रही, से बुझौलनि अछि ।)
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ॥
कुर्याद्विद्वांस्तथाऽसक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥३-२५॥
जेना मूर्ख लोक सब काज मे आसक्त भ’ कय काज करय मे लागल रहैत अछि, तहिना, हे भरतवंशी, दुनियाक मार्गदर्शन चाहनिहार बुद्धिमान लोक सब केँ सेहो काज करय मे लगबाक चाही (मुदा) आसक्ति रहित भ’ कय ।
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ॥
योजयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥३-२६॥
कर्म मे आसक्त (लागल) अज्ञानी लोकक समझ केँ कोनो आर लोक केँ किन्नहुँ डगमगेबाक (भ्रमित करबाक) नहि चाही; बुद्धिमान केँ, (स्वयं) लगातार कर्म करिते, (अज्ञानी केँ) सब काज मे लगेबाक चाही ।
(ओहिना, जेना श्रेष्ठतर व्यक्तिक कयल अनुकरणीय कर्मक बात उपर कहल गेल छल । मूढ़ लोक मे ओहेन चेतना नहि छैक जे ज्ञानी-बुद्धिमान् सब जेकाँ यज्ञीय भावक कर्म मे लागत, लेकिन ओकरा अपन कर्म सँ स्नेह रहैत छैक, समर्पण रहैत छैक, ओ अपन कर्म सँ जीवन जियय केर भाव मात्र मे लागल रहैछ । ओकर बुद्धि केँ भ्रमित कयनाय, ओकरा मे कोनो तरहक भेद-विभेद, छुआछुत, आदिक बात सब सुनाकय भड़केनाय – ई सब उचित नहि अछि । बल्कि श्रेष्ठ आचरण अपनबैत बुद्धिमान सब नीक कर्म करैत रहथि, जाहि सँ ओहो सब हुनका लोकनि केँ अनुकरण करैत रहत । आजुक समाज मे अनेकानेक भ्रम पसारि लोक केँ लोक सँ भिड़न्त करेबाक राजनीति कयल जाइछ, जाहि सँ कतेको तरहक सामाजिक विखण्डन आ लोकक अहित भ’ रहलैक अछि ।)
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ॥
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥३-२७॥
प्रकृतिक गुण सब मात्र कार्य करैत छैक । अहंकार सँ भ्रमित (मोहित) भ’ कय लोक सोचैत अछि, “हम करैत छी” ।
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ॥
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥३-२८॥
मुदा, जे गुण आर कर्म केर विभाग (क्षेत्र) मे सत्य समझ (सही बुद्धिवला, तत्त्वविद्या) रखैत अछि, से जनैत छैक जे इंद्रिय रूप मे गुण मात्र चीज रूप गुण सब पर टिकल रहैत अछि, ओ आसक्त नहि होइत अछि ।
सत्य समझ आदिक संग: ई सच जननाय जे आत्मा सब गुण आर काज सँ अलग अछि ।
हमर नोट: चैप्टर ३ केर प्रस्तुत श्लोक सब केँ एक-दोसरक सँ जुड़ल, एक केर बाद एक केँ बुझबाक चाही । जेना, प्रस्तुत श्लोक पिछला श्लोक सब सँ जुड़ैत अछि जेतय कहल गेल अछि जे गुण आ प्रकृति सबटा काज करैत अछि, अहंकार सँ धोखा खाकय (भ्रम मे फँसिकय) कियो सोचि सकैत अछि जे करयवला हम छी । आर प्रस्तुत श्लोक मे, भगवान् कृष्ण एतय धरि कहैत छथि जे इंद्रिय सभक रूप मे गुण मात्र चीज सभक रूप मे गुण सब पर टिकल रहैत अछि ।
प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ॥
तानकृत्स्नविदो मन्दान् कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥३-२९॥
पूरा जानकारी रखनिहार (पूर्ण जानकार) सज्जन (लोक) केँ ओहि मन्द बुद्धिवला लोक, जे प्रकृति केर गुण सब सँ (स्वयं केँ) गुण सभक कार्य मे लागल रहब जेकाँ (स्वयं केँ कर्ता होयबाक भ्रम मे पड़ल रहब जेकाँ) भ्रमित रहैत अछि, ओकर समझ केँ विचलित (डगमगाबयवला काज) नहि करबाक चाही ।
पूरा जानकारी नहि राखयवला लोक – जे केवल काजक तुरन्त प्रभाव धरि मात्र देखि सकैत अछि ।
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ॥
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥३-३०॥
सबटा काज हमरा सौंपिकय (हमरा उपर छोड़िकय), मन केँ स्वयं (आत्मा) उपर केन्द्रित कयकेँ, आशा आ स्वार्थ सब सँ छुटकारा पाबिकय, (मानसिक) बुखार सँ मुक्त भ’ कय – लड़ू ।
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ॥
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥३-३१॥
जे लोक हमर एहि शिक्षा केँ पूर्ण श्रद्धा आ बिना कोनो निन्दा (कौचर्य) कएने लगातार मानैत अछि, ओहो काज (सब सँ) मुक्त भ’ जाइत अछि ।
श्रद्धा: एकटा मानसिक दृष्टि थिक जे मुख्य रूप सँ उद्देश्य केर इमानदारी, विनम्रता, आदर एवं विश्वास सँ बनल रहैत अछि । अहाँक श्रद्धा अपन गुरु लेल होइत अछि – ई हुनकर सत्य सम्मान-आदर (श्रद्धा) थिक । अहाँ गीताक लेल श्रद्धा रखैत छी – ई ओकर देल शिक्षा सभक प्रशंसा थिक जे अहाँ बुझैत छी आ ओहि पर विश्वास करैत छी जे अहाँ नहि बुझैत छी । अहाँ श्रद्धाक संग एकटा भिखारी केँ भीख दैत छी – ई विनम्रताक भावना छी जे एहि आशाक संग जुड़ल रहैछ जे अहाँ जे देबैक ओ स्वीकार करय योग्य आ काजक होयत ।
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ॥
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥३-३२॥
मुदा जे लोक हमर एहि शिक्षाक विरोध करैत ओहि पर अमल नहि करैछ, ओ सबटा ज्ञान सँ भ्रमित अछि आ विवेक सँ रहित अछि, ओ बर्बाद भ’ गेल, से जानि लियह ।
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ॥
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥३-३३॥
समझदार आदमी (ज्ञानी लोक) सेहो अपन स्वभाव केर हिसाब सँ काज करैत अछि; जीव स्वभाव केर हिसाब सँ चलैत अछि; रोक-टोक (परहेज) कि कय सकैत छैक ?
किछु लोक भगवानक शिक्षा कियैक नहि मानैत अछि, एकर कारण एहिठाम कहल गेल अछि । ओकर (नीच) स्वभाव ओकरा लेल बहुते मजगूत साबित होइत छैक ।
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ॥
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थनौ ॥३-३४॥
इंद्रिय सभक अपन-अपन काजक लेल लगाव (राग) आर दूराव (द्वेष) भेनाय स्वाभाविक छैक; केकरहु ओकर प्रभाव मे नहि आबय दिय’, वैह ओकर दुश्मन छी ।
केकरहु: यानि सत्य केर खोज करयवला केँ ।
हालांकि, जेना कि पैछला श्लोक सब मे कहल गेल अछि, किछु लोक अपन स्वाभाविक आदत सभक एतबा बेसी प्रभाव मे रहैत अछि जे ओकरा रोकबाक कोनो फायदा नहि होइत छैक, तैयो सत्य केर खोज करयवला केँ कखनहुँ ओकरा जेकाँ बनबाक बारे मे नहि सोचबाक चाही, बल्कि हमेशा इंद्रिय सब केँ अपन काज लेल सबटा लगाव आ दूराव केँ दूर करबाक कोशिश करबाक चाही ।
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ॥
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥३-३५॥
अपन धर्म, भले अधूरा हो, केकरहु दोसर केर नीक सँ निभायल गेल धर्म सँ बेसी नीक होइछ । अपन धर्म मे मरनाय बेसी नीक अछि; दोसरक धर्म भय सँ भरल होइत अछि ।
मतलब ई भेल जे अर्जुन केर लड़ाइ छोड़िकय ब्राह्मणक शान्त आर सुख भरल जीवन जिबय केर विचार, मनुष्य केँ एहेन स्वाभाविक इच्छा सँ आयल छैक जे ओ नापसिन चीज केँ छोड़िकय पसिन आबयवला चीज केँ अपनाबय । ओकरा कोनो हालत मे एहि कमजोरीक आगाँ नहि झुकबाक चाही ।
अर्जुन उवाच -
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ॥
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥३-३६॥
अर्जुन कहलनि:
मुदा हे वार्ष्णेय, मनुष्य कोनो चीज सँ मजबूर भ’ कय, अपना मर्जीक खिलाफ, मानू जेना जबरदस्ती पाप करैत अछि ?
हमर नोट: यैह असली जिज्ञासा अछि जे हमरा सभक अन्दर मे सेहो रहैत अछि । भले हमरा सब केँ पता अछि जे किछु गलती भ’ रहल अछि, तैयो हम सब करैत छी । सोचू केना आ भगवान् कृष्णक देल गेल सुन्दर जबाब पढ़ैत रहू । बस फॉलो करैत रहू ।
भगवानोवाच –
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ॥
महाशनो महापाप्मा विद्धधेनमिह वैरिणम् ॥३-३७॥
भगवान कहलनि:
ई इच्छा थिक – ई क्रोध थिक, जे रजोगुण सँ जन्म लेलक अछि; आर बहुत लालसा वला तथा भारी पाप जेकाँ अछि; एकरा एतय (एहि दुनिया मे) दुश्मन जानू ।
ई इच्छा, आदि थिक: क्रोध इच्छा टाक दोसर रूप थिक – इच्छा मे बाधा (यानि क्रोध केर उद्भव) ।
हमर नोट: पैछला श्लोक ३.३६ मे पुछल गेल अत्यन्त जरूरी सवालक जबाब देल गेल अछि आर एकर जबाब आगाँक श्लोक सब मे सेहो देल जा रहल अछि, तेँ बहुत सावधानीपूर्वक ध्यान दियौक । ई इच्छा हमरा सभक दुश्मन छी । केना ? अध्याय २ – ६२-६३ श्लोक सभक कमेंट्री सेहो देखू ।
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ॥
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥३-३८॥
जेना आगि धुआँ सँ झँपायल रहैत अछि, जेना आइना (दर्पण) धुलकण (गर्दा सब सँ) झँपायल रहैत अछि, जेना भ्रूण उल्ब थैली (सेकुन्डाइन – जन्मजात बच्चा जेर मे जकड़ल रहैत अछि) सँ झँपायल रहैत अछि, तेनाही ‘ई’ ‘ओकरा’ सँ झँपायल रहैत अछि ।
‘ई’ ज्ञान थिक, आर ‘ओकरा’ (यानि ओ) इच्छा थिक, जेना कि निम्नलिखित श्लोक मे बतायल गेल अछि ।
एतय ज्ञानपर पर्दा पड़नाय (ओवरक्लाउडिंग अफ नौलेज) या स्वयं (आत्मा) उपर इच्छा सभक आवरण चढ़नाय जेहेन तीन टा उदाहरण केर रूप मे तीन चरण मे वर्णन कयल गेल अछि । पहिल चरण सात्विक अछि – ‘धुआँ सँ झँपायल आगि’ – विवेक केर थोड़बेक जीत केर उदय सात्विक हृदय मे इच्छा केर धुआँ केँ दूर कय दैत अछि (जेना धुआँयल आगि मे कनिये फूक मारला सँ आगि पजैर उठैत अछि) । दोसर, राजसिका – ‘दर्पण पर लागल धूलकण’ केँ हंटेबाक लेल किछु समय आर तैयारी केर आवश्यकता पड़ैत अछि । जखन कि तेसर – तमसिका, प्रसव केर बाद “भ्रूण” केर रिहाइ (उल्वथैली, सेकुन्डाइन सँ मुक्त करब, आफ्टरबर्थ) जेकाँ बहुत अधिक समय लैत अछि ।
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ॥
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥३-३९॥
हे कुन्तीपुत्र, बुद्धिमान सभक नित्य शत्रु, इच्छा केर अप्राप्य अग्नि सँ ज्ञान झाँपल रहैत अछि ।
इच्छा निस्संदेह समस्त मानवजाति केर शत्रु थिक । एकरा बुद्धिमान सभक निरन्तर शत्रु कियैक कहल जाइत अछि, एकर कारण ई अछि जे ओ सब एकर प्रभाव मे रहलो उपरान्त एकरा अनुभव कय पबैत छथि । मूर्खक नीन्द बस किछुए समय लेल टा खुजैत छैक, जखन ओ सब एकर दर्दनाक प्रतिक्रिया (रिएक्शन) सँ पीड़ित रहैछ तखनहिं टा ।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ॥
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥३-४०॥
इंद्रिय, मन आ बुद्धि केँ एकर घर कहल गेल छैक; एकरे जरिए ई शरीरधारी सभक समझ पर पर्दा डालिकय ओकरा धोखा दैत अछि ।
एकटा समझदार सेनापति जेकाँ, कृष्ण दुश्मन केर किला देखबैत छथि, जेकरा जीतिकय दुश्मन आसानी सँ हरायल जाइत अछि ।
एकरा जरिए: इंद्रिय, मन आर बुद्धि केँ खराब कयकेँ ।
हमर नोट: कृपया श्लोक ३६ मे अर्जुन केर सवालक जवाब मे देल गेल एहि सबटा श्लोक केँ बहुत-बहुत खास ध्यान राखब, यानी एखन धरि अहाँक संग साझा कयल गेल श्लोक ३७, ३८, ३९ आ ४० देखू आर सब सँ जरूरी चैप्टर ३ केर आर ३ टा श्लोक सब यानी ४१, ४२ आ ४३ केँ सेहो प्रतीक्षा करू । ई सब हमरा लोकनिक कतेको परेशानी सब आ समस्या सब (फ्रस्ट्रेशन, वगैरह) केर हल करैत अछि । जखनहुँ हम सब स्वाध्याय करी, त ध्यान सँ देखब जे हम अपन जीवन मे एहि सिद्धान्त सभक पालन कय रहल छी या एखनहुँ धरि हम पाछुए छूटल छी ।
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ॥
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥३-४१॥
तेँ, हे भारतवंशी वीर, शुरुए मे इंद्रिय सबकेँ काबू मे कयकेँ, ओहि पापी (इच्छा केँ), ज्ञान आर बोध केँ नष्ट करयवला (इच्छा) केँ मारि दियौक ।
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ॥
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥३-४२॥
इंद्रिय सबकेँ (शरीर सँ) श्रेष्ठ कहल गेल अछि; मन इंद्रिय सब सँ श्रेष्ठ अछि; बुद्धि मन सँ श्रेष्ठ अछि; आर ओ जे बुद्धि सँ श्रेष्ठ अछि से ओ स्वयं (आत्मा) छी ।
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संसतभ्यात्मानमात्मना ॥
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥३-४३॥
एहि तरहें, बुद्धि सँ सेहो उपरवाला केँ जानिकय, आर स्वयं (अपना) केँ स्वयं (आत्मा) सँ रोकिकय, हे महाबाहु, ओहि दुश्मन, जेकरा पकड़ल नहि जा सकैछ, ‘इच्छा’ केँ खत्य कय देल जाउ ।
That’s the end of the Third Chapter of Srimad BhagavadGita, designated The Way of Action.
यह श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय का अंत है, जिसे कर्म का मार्ग कहा गया है ।
हरिः हरः!!
