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श्रीमद्भागवद्गीता दोसर अध्याय

159 भ्यूज

ॐ श्री परमात्मने नमः !!

॥द्वितीयोऽध्यायः॥

 

सञ्जय उवाच ।

तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्वाकुलेक्षणम् ॥
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥२-१॥

संजय कहलनि:

से (अर्जुन) जे एहि प्रकार सँ दया आ दुःख सँ भरि गेल छलथि, आर जिनकर आँखि नोर सँ भरि गेल रहनि, मधुसूदन हुनका सँ ई शब्द कहलनि । 

दया सँ भरि गेल छलथि: अर्जुन नहि, बल्कि अर्जुन केर भावना मात्र एहि स्थितिक स्वामी छल ।

श्रीभगवानुवाच ।

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ॥
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥२-२॥

एहेन संकट मे, हे अर्जुन, ई निराशा, आर्य लोकनिक विपरीत, लज्जास्पद एवं स्वर्ग प्राप्तिक विरूद्ध, अहाँ केँ कतय सँ प्राप्त भेल अछि ? 

ध्यान देब, कृष्ण अर्जुन केर धार्मिक भाव सँ छुपित कमजोर रुख केँ केहेन निन्दित रूप मे देखलनि अछि !

क्लैब्यं मास्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ॥
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥२-३॥

हे पृथाक पुत्र, एहि प्रकारक गैर-मर्दानगी जुनि देखाउ ! ई अहाँक वास्ते बहुत खराब होयत । ई तुच्छ कायरता केँ छोड़ू आ उठू, हे अपन दुश्मन केँ जरौनिहार !

अर्जुन उवाच ।

कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ॥
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥२-४॥

अर्जुन कहलनि:

मुदा हे मधुसूदन! हम युद्ध मे भीष्म आ द्रोणक विरुद्ध बाण सँ केना लड़ि सकैत छी, जे कि पूजनीय छथि, हे अरिसूदन (शत्रु केर संहारक) !

गुरुनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ॥
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥२-५॥

निश्चय टा, एहि महानुभावान लोकनि (महान आत्माक मालिक लोकनि) केँ मारय सँ तँ एहि जन्म मे भीख मांगिकय रोटी खेनाय नीक होयत । जँ अगर हम हुनका सब केँ मारि दैत छी, तँ एहि दुनिया मे सेहो हमर सबटा सम्पत्ति आ सख खून सँ रंगि जायत । 

यानी एहि दुनिया मे सेहो हम नर्कहि मे रहब ।

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ॥
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥२-६॥

आर इहो सच अछि जे कि हमरा लोकनि अत्यन्त मुश्किल सँ कहि सकैत छी जे कोन नीक होयत – हम सब (पाण्डव) ओकरा हरा दी, या ओ (कौरव) सब हमरा सब केँ हरा दिअए । ई जे धृतराष्ट्रक बेटा सब, जे हमरा लोकनिक सामने मे डटल ठाढ़ अछि, एकरा सब केँ मारलाक बाद हमरा लोकनि केँ जिबइयोक परवाह नहि करबाक चाही । 

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः ॥
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥२-७॥

हमर स्वभाव पर कमजोर सहानुभूति हावी भ’ गेल अछि, आर हमर मोन मे कर्तव्य केँ लय कय किछु सन्देह (ओझराहट) आबि गेल अछि, हम अहाँ सँ विनती करैत छी । अहाँ निर्णीत रूप सँ कहू जे हमरा लेल कि नीक अछि । हम अहाँक शिष्य छी । हम अहाँक शरण मे आयल छी, हमरा (उचित) निर्देशन (शिक्षा) देल जाउ । 

धर्म कोनो चीजक ‘नेस’ (ness) थिक, कोनो वस्तुक अन्तर्विधान (आन्तरिक सिद्धान्त) केर नियम (कानून/कायदा) थिक । धर्मक पहिल अर्थ नेकी (अच्छाइ) या रिलीजन (religion) नहि अछि, बल्कि ई त बस एकर दोसर अर्थ अछि । सही काजक वास्ते लड़नाय क्षत्रिय केर धार्मिक कर्तव्य या धर्म थिक, जखन कि यैह काज एकटा ब्राह्मणक लेल पाप अछि, कियैक तँ ई ओकर अस्तित्वक सिद्धान्त (नियम) केर विपरीत अछि । तेँ अपन अस्तित्व केर नियमक हिसाब सँ कर्म करनाइये कोनो व्यक्तिक धर्म या मोक्ष केर रास्ता थिक । कर्मक मेघ (बादल) स्वयं (आत्मा) रूपी सूर्य केँ नजरि सँ नुका लैत अछि । जे साधन एहि बादक बात केँ बिना बढ़ेने खत्य कय दैत अछि आर एहि तरहें स्वयं केँ सही करय मे मदति करैत अछि, वैह धर्म थिक ।

अहाँक चेला: जाबत धरि ई घोषणा कय नहि देल जाइछ, गुरु सब सँ ऊँच ज्ञान नहि दय सकैत छथि ।

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ॥
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥२-८॥

हमरा एहेन किछुओ नहि देखा रहल अछि जाहि सँ ई दुःख, जे हमर होश उड़ा दैत अछि, से दूर भ’ जाय; भले हमरा धरती पर बेजोड़ आ खुशहाल राज तथा देवतो लोकनि पर आधिपत्य (कब्जा) भेटि जाय । 

सञ्जय उवाच ।

एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः ॥
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥२-९॥

संजय कहलनिः

इन्द्रिय केर स्वामी (श्रीकृष्ण) सँ एना कहिकय, दुश्मन सब केँ जराबयवला गुडाकेश गोविन्द सँ कहलनि, “हम नहि लड़ब”, आर चुप भ’ गेलाह । 

संजयक एहि नाम सभक प्रयोग करबाक उद्देश्य धृतराष्ट्र केँ याद दिएनाय छैक – जे अर्जुन केर नहि लड़ब वाली बात सँ शायद कनेक खुशी भ’ सकैत छन्हि – जे कि मात्र एकटा क्षणिक (अस्थायी) कमजोरी थिकैक, कियैक तँ इन्द्रिय केर स्वामीक उपस्थिति सँ आखिरकार सबटा अज्ञान दूर भ’ जेतैक । अर्जुन केर अपनहुँ स्वभाव अंधकार सँ रहित छन्हि । कि ओ नीन्द आर दुश्मन सभक भय केँ जितयवला नहि छथि ?

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ॥
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥२-१०॥

दुनू सेनाक बीच मे जे शोक (चिन्ता) कय रहल छलथि, हुनका सँ हे भरत केर वंशज, हृषीकेश मानू विहुँसैत ई शब्द कहलनि । 

विहुँसब – अर्जुन केँ लज्जाक समुद्र मे डुबायब । अर्जुन केर दुःख पर कृष्णक विहुँसब मानू कारी मानसूनी मेघ मे चमकैत बिजली जेकाँ अछि । वर्षा फुटि पड़ैत अछि, आ प्यासल पृथ्वी तृप्त भ’ जाइत अछि । ई (बाद मे) आबयवाली रोशनी केर विहुँसब थिक ।

श्रीभगवानुवाच ।

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ॥
गताशूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥२-११॥

धन्य भगवान कहलनि:

अहाँ ओकरा सब लेल शोक कय रहल छी जेकरा लेल शोक नहि करबाक चाही । तैयो अहाँ ज्ञानक बात बजैत छी । (वास्तव मे) ज्ञानीजन नहि तँ जीवित लेल शोक करैत छथि आ न मृत लेल । 

ज्ञानक बात: देखू १-३५-४४ (प्रथम अध्याय केर ३५ सँ ४४मा श्लोक धरि) ।

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ॥
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥२-१२॥

एहेन नहि छैक जे हम पहिने कहियो रहबे नहि करी, कि अहाँ नहि रही, आ कि राजा सब नहि रहथि । आर, नहिये एना छैक जे भविष्य मे हमरा सभक अस्तित्व खत्म भ’ जायत । 

निस्सन्देह, एतय कृष्ण केर मतलब ई नहि अछि जे शरीर अमर अछि, बल्कि हुनकर मतलब समस्त शरीर केर पाछू मौजूद सत्य आत्मा सँ अछि ।

देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ॥
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥२-१३॥

जेना एहि शरीर मे आत्माक लेल बचपन, जवानी आर बुढ़ापा होइत छैक, तेनाही दोसर शरीर भेटनाय सेहो होइत छैक । शान्त आत्मा एहि सँ धोखा मे नहि पड़ैत अछि । 

एकर मुताबिक, मनुष्य मे अहंताक निरन्तरता बचपन सँ जबानी आ जबानी सँ बुढ़ापाक यात्राक कारण मृत्यु सँ बेसी बाधित नहि होइछ ।

(हमरा बुझनेः एतय अहंताक अर्थ – अपन अस्तित्वक सदा-सनातन कायम रहबाक भान/समझ)

शान्त आत्मा: ओ जे आत्म-साक्षात्कार सँ शान्त भ’ गेल अछि ।

मात्रस्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ॥
आगमपायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥२-१४॥

हे कुन्तीपुत्र, गर्मी आ ठंढी, दुःख आ सुख केर भावना मात्र इन्द्रिय सभक अपन इच्छित विषय केर सम्पर्क सँ उत्पन्न होइत अछि । ओकर एकटा आरम्भ आर एकटा अन्त होइत अछि । ओ अपन स्वभाव मे अस्थायी (क्षणिक) होइत अछि । हे भरत केर वंशज, ओकरा धैर्य सँ सहन करू ।

ओकर एकटा आरम्भ आर एकटा अन्त होइत अछि: जे स्थायी आत्मा सँ अलग मानल गेल अछि । कियो जतेक बेसी स्वयं केँ स्थायी आत्मा सँ जोड़ि पबैत अछि, ओतबे कम ओकरा उपर जीवनक नीक आ बेजा स्थिति सभक असैर पड़ैत छैक ।

अपन स्वभाव मे अस्थायी: यानी, एक्के चीज जे एक समय खुशी (सुख) दैत अछि, दोसर पल मे दर्द (दुःख) दैत अछि, आदि ।

यं हि व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ॥
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥२-१५॥

हे मनुष्य सब मे महान (अर्जुन) ! जे शांत मनुष्य सुख आर दुःख (दुनू) मे एक जेकाँ रहैत अछि, जेकरा ई दुनू परेशान नहि कय सकैत  छैक, केवल वैह टा अमरत्व केँ पाबि सकैत अछि ।

जीवन मे खराबी सभक बीच एहि पूर्ण एकरूपताक अर्थ अछि अमर आत्माक संग हमरा लोकनिक एकत्वक पूर्ण आ अटूट चेतना । एहि प्रकारे अमरत्व प्राप्त होइत अछि ।

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ॥
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्तत्त्वदर्शिभिः ॥२-१६॥

जे चीज झूठ (असत्य, अवास्तविक, असत्) अछि, ओ सदिखन नहि रहि पबैछ । जे चीज सच (सत्य, वास्तविक, सत्) अछि, ओ सदिखन नहि रहय तेना नहि होइछ । जाहि व्यक्ति केँ परमसत्य केर ज्ञान होइत छैक ओ एहि दुनू केँ नीक जेकाँ जनैत अछि । 

झूठ आ सच: सच चीजक स्वभाव केर पता लगेनाय सब फिलॉसफी (दर्शन) केर खोज अछि । श्री कृष्ण एतय कहैत छथि जे कोनो चीज हरेक समय धरिक वास्ते एकसमान नहि रहैछ, त ओ झूठ छी, आर दोसर दिश सत्य चीज सदिखन एक जेकाँ रहैत अछि । तेँ, ई अद्भुत संसार केर सम्पूर्ण चीज, झूठे टा अछि, कियैक तँ एहि मे कोनो एकहु टा हालत (स्थिति) समय केर एकटा छोट सन हिस्सो धरि नहि टिकि पबैत अछि । आर जे एहि निरन्तर परिवर्तन पर ध्यान दैत अछि, आर तेँ अपने (स्वयं) सेहो नहि बदलल अछि – आत्मा, चेतना – वैह सत्य चीज अछि ।

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ॥
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥२-१७॥

जिनका सँ ई सबटा (सत् आ असत्) भरल रहैत अछि ‍- तिनका निश्चयपूर्वक जानि लिय जे ओ अविनाशी छथि । एहि अटल (दृढ़सत्य) केँ नष्ट करबाक शक्ति (सामर्थ्य) केकरहु पास नहि छैक । 

जिनका सँ ई सबटा भरल रहैत अछि: यानी ओ जे साक्षी रूप मे एहि सबटा (सत् आर असत्) मे पसरल (व्याप्त रहैत) छथि ।

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ॥
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥२-१८॥

एहि अन्तर्निहित आत्मा – सदिखन अपरिवर्तनशील, अविनाशी, असीमित – केर एहि शरीर सभक अन्त (मृत्यु) होयब कहल जाइत अछि । तेँ, हे भरतवंशी, अहाँ युद्ध करू । 

अर्जुन केर शोक (दुःख) जे हुनका कौरव लोकनिक विरूद्ध लड़बाक अपन कर्तव्य सँ रोकैत अछि, से आत्माक वास्तविक प्रकृतिक बारे अज्ञानताक कारण उत्पन्न भेल अछि । तेँ श्री भगवान हुनका बुझेबाक लेल एहि विषय पर प्रकाश देबाक बेर-बेर आ जबर्दस्त प्रयास कयलनि ।

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ॥
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥२-१९॥

जे आत्मा केँ मारयवला जानैत अछि आर जे आत्मा केँ मारल गेल जानैत अछि, एहि दुनू मे सँ कियो नहि जानैत अछि ।  नहि तँ आत्मा (केकरहु) मारैत अछि आर नहिये (कथमपि) मारल जाइत अछि ।

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ॥
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥२-२०॥

ई नहि त जन्म लैत अछि, न मरैत अछि । एहेन नहि छैक जे, नहि भेला पर, ई फेर सँ बनि जाइत अछि । (या दोसर दृष्टि सँः एहेन नहि छैक जे भेला पर, ई फेर सँ नहि भ’ सकैत अछि) । ई अजन्मल, सदिखन रहयवला (सदा सनातन), कहियो नहि बदलयवला (अपरिवर्तनशील), हमेशा (स्वयं केर अस्तित्व मे) रहयवला होइत अछि । शरीर केर मारल गेलो पर ई नहि मरैत अछि । 

ई श्लोक कोनो पदार्थ मे उपलब्ध छह प्रकार केर परिवर्तन केँ नकारबाक अर्थ मे (सन्दर्भ) बतबैत अछि –  जन्मब, रहब, बढ़ब, बदलब, जीर्ण होयब आर मरब (ई छः अबस्था सब पदार्थ लेल कहल गेल अछि) ।

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ॥
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥२-२१॥

हे पृथापुत्र, जे जनैत अछि जे ई अविनाशी, अपरिवर्तित, जन्म सँ रहित आर अचल अछि, ओ केना केकरो मारि सकैत अछि या कियो दोसर सँ मरबायल जा सकैत अछि ? 

ओ केना मारि सकैत अछि ? – अर्जुन दिश संकेत करैत । कियो दोसर सँ मरबायल जा सकैत अछि – कृष्ण अपना दिश संकेत करैत ।

वसांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ॥
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥२-२२॥

जेना कोनो मनुष्य पुरान कपड़ा उतारिकय नव कपड़ा पहिरि लैत अछि, तहिना कोनो शरीरधारी (आत्मा) सेहो पुरान शरीर छोड़िकय (उतारिकय) नव शरीर मे प्रवेश कय जाइत अछि । 

जेना कियो पुरान (कपड़ा) तखनहि उतारैत (त्यागैत) अछि, जखन ओकरा लग नव कपड़ा पहिनहि सँ हो, तेनाही शरीरधारी (आत्मा) सेहो एहि (पुरान) शरीर केँ छोड़बाक क्रम मे पहिनहिं सँ एकटा नव शरीर मे चलि जाइत अछि । उपनिषद एकर तुलना एकटा जोंकक गति (चाइल) सँ करैत अछि, जे अपन पुरान आश्रय (पैर/देह रखबाक आधार) केँ छोड़य सँ पहिनहिं एकटा नव आश्रय बना लैत अछि ।

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ॥
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥२-२३॥

एहि (आत्मा) केँ हथियार नहि काटैछ; एकरा आगि नहि जरबैछ; एकरा पानि नहि भिजबैछ; आर एकरा हवा नहि सुखबैछ ।

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ॥
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥२-२४॥

एहि आत्मा केँ नहिये काटल जा सकैछ, न जरायल जा सकैछ, नहिये भिजायल जा सकैछ, न सुखायल जा सकैछ । कखनहुँ नहि बदलयवला (हमेशा अपरिवर्तित), हर स्थान पर उपस्थित (सर्वव्याप्त), आ न हिलयवला (अचल),  आत्मा सदा-सनातन रहयवला अछि ।

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ॥
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥२-२५॥

एहि (आत्मा) केँ अव्यक्त, अकल्पनीय आर अपरिवर्तनीय कहल गेल छैक । तेँ, एकरा एना बुझिकय, अहाँ केँ शोक नहि करबाक चाही । 

ई आत्मा अनन्त आ अविभाज्य अछि, तेँ ई नहि त कोनो क्रियाक विषय भ’ सकैछ आ नहिये वस्तु ।

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ॥
तथापि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि ॥२-२६॥

मुदा जँ अहाँ एकरा लगातार जन्मय आ मरयवला मानैत छी, तैयो, हे महाबाहु, अहाँ केँ एकरा लेल शोक नहि करबाक चाही । 

एतय कृष्ण, तर्क लेल, भौतिकवादी सोच केँ लैत छथि, आर देखबैत छथि जे जँ आत्मा सेह किछु समय लेल होइ, तैयो दुःख खत्म भ’ जेबाक चाही, कियैक तँ ओहि स्थिति मे कोनो परलोक नहि होयत, कोनो पाप नहि होयत, कोनो नरक नहि होयत ।

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ॥
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥२-२७॥

ओ जे जन्म लेने अछि, ओकर मृत्यु पक्का अछि; जे मरि गेल अछि, ओकर जन्म सेहो पक्का अछि । तेँ, जे हेबाके टा अछि, ताहि लेल अहाँ केँ दुःखी नहि हेबाक चाही । 

ई श्लोक सिर्फ ओकरा लेल अछि जे एखन तक स्वतंत्र नहि भेल अछि । जाबत धरि इच्छा (बचल रहैत) छैक, जन्म आ मृत्यु त’ हेब्बे टा करतैक ।

तेँ, अहाँ केँ दुःखी नहि हेबाक चाहीः कियैक तँ अहाँ जे हेबाके टा छैक तेकरा नियंत्रित नहि कय सकैत छी आर अपन सम्बन्धी लोकनिक शरीर केँ बचइयो नहि सकैत छी, अतः अहाँ अपन कर्म अपने करू आ जन्म एवं मृत्यु दुनू सँ आगू बढ़ू ।

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ॥
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥२-२८॥

हे भारत, सब जीव अपन आरम्भ मे बिना देखेने (यानि अव्यक्त रूप मे), अपन बीच केर हालत मे देखायल (व्यक्त), आर अपन अन्त मे फेर बिन देखेने होइत अछि । त फेर दुःख केर कोन बात छैक ?

अस्तित्व: पुत्र आ मित्र केर रूप मे अपन सम्बन्ध मे, जे मात्र भौतिक चीज सभक मेल थिक, जे कारण आर प्रभाव केर रूप सँ जुड़ि गेल अछि ।

एतय जे बात (विचार) अछि से ई जे जेकर आरम्भ आ अन्त मे कोनो अस्तित्व नहि छैक, (ओ अव्यक्त रहैत अछि), ओ बीच मे मात्र भ्रम टा हेबाक चाही, आर तेँ ओकर कोनो प्रभाव मन पर नहि पड़य देबाक चाही ।

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ॥
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥२-२९॥

किछु लोक आत्मा केँ विलक्षण मानैत अछि । दोसर एकरा विस्मयकारी (आश्चर्यजनक) कहैत अछि । किछु आरो लोक एकरा एकटा आश्चर्य जेकाँ सुनैत अछि । आर किछु लोक, सुनितहु, एकरा एकदमे नहि बुझैत अछि । 

एहि श्लोक केर मतलब इहो निकालल जा सकैत अछि कि जे लोक आत्मा केँ देखैत, सुनैत आ कहैत अछि, से अद्भुत लोक अछि, कियैक तँ ओकर संख्या बहुते कम छैक । तेँ ई कोनो अजीब बात नहि छैक जे अहाँ केँ दुःख मनेबाक चाही, कियैक तँ आत्मा केँ बुझनाय बड कठिन काज छैक ।

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ॥
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥२-३०॥

हे भरत केर वंशज, ई सभक शरीर मे रहयवला सदैव अविनाशी अछि । अत: अहाँ केँ कोनो प्राणीक वास्ते शोक नहि करबाक चाही । 

कृष्ण एतय अपन दृष्टिकोण पर लौटैत छथि ।

स्वधर्मपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ॥
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥२-३१॥

अपन धर्म केँ देखैतो अहाँ केँ नहि डगमगेबाक चाही, कियैक तँ क्षत्रिय लेल धर्मयुद्ध सँ बढ़िकय किछु नहि होइछ ।

यानी, क्षत्रिय केर कर्तव्य अछि जे ओ अपन देश, प्रजा आर धर्म केर हित मे लड़य ।

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ॥
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥२-३२॥

हे पृथापुत्र, क्षत्रिय सचमुच भाग्यशाली अछि, जेकरा एहेन युद्ध मे लड़बाक लेल बजायल जाइत छैक जे स्वर्गक खुजल द्वार जेकाँ बिना मंगनहि आबि जाइत छैक । 

शास्त्र कहैत अछि जे यदि कियो क्षत्रिय, सही काजक वास्ते लड़ैते, युद्धक मैदान मे खसि पड़ैत अछि (मरि जाइत अछि), त ओ तुरन्त स्वर्ग जाइत अछि ।

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ॥
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥२-३३॥

मुदा जँ अहाँ एहि धर्मयुक्त युद्ध मे भाग लय सँ मना करब, त अपन धर्म आ प्रतिष्ठा हरेबाक कारण अहाँ केँ पाप लागत । 

अकीर्तिञ्चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ॥
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥२-३४॥

दुनिया सेहो अहाँक एहि अकीर्ति (अकर्मण्यता) केँ हमेशा खराब मानत । प्रतिष्ठित लोक वास्ते (अकीर्ति – अकर्मण्यताक) बदनामी मरइयो सँ खराब होइत छैक ।

ई तर्क – श्लोक ३३-३६ – ई मानैत अछि कि ‘जे कारण सोझाँ उपस्थित भेल अछि से पहिनहिं सँ सही साबित भ’ गेल अछि’ । तेँ अर्जुन एकरा मात्र कायरताक (डरपोक बनबाक) कारण छोड़ि सकैत छलथि । एकटा नायक सेहो अपना भीतर गहींर भावना जगला सँ कमजोर पड़ि सकैत अछि ।

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ॥
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥२-३५॥

बड़का-बड़का रथी-योद्धा लोकनि यैह विश्वास करता जे अहाँ डराकय युद्ध सँ पाछाँ हंटि गेलहुँ । आर जे लोक सब अहाँक बारे मे बहुत पैघ बात सब सोचने छथि ओहो सब अहाँ केँ तुच्छ (नीच) बुझताह । 

अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः ॥
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥२-३६॥

अहाँक दुश्मन पर्यन्त अहाँक महान शक्तिक निन्दा करैत अहाँक बारे मे एहेन बात कहत जे कहबाक योग्य नहि अछि । एहि सँ बेसी बर्दाश्तक बाहर आर कि भ’ सकैत अछि ? 

हतो वा प्राप्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ॥
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥२-३७॥

मरिकय अहाँ स्वर्ग पबैत छी; जीतिकय अहाँ पृथ्वी पर आनन्द लैत छी । तेँ, हे कुन्तीपुत्र, युद्ध करबाक निश्चय कय केँ उठू ।

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ॥
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥२-३८॥

दुःख आ सुख, लाभ आ हानि, जीत आ हार केँ एक मानिकय, अहाँ युद्ध मे लागि जाउ । तखन अहाँ केँ कोनो पाप नहि लागत ।

हमेशा विपरीत चीज मे सँ कोनो एक केर चाहत मात्र बान्हैत अछि । जखन कोनो काज बिना कोनो लगाव केँ कयल जाइत अछि, चाहे ओ अपना लेल हो या ओकर फल केर लेल, तखन कर्मक फल बिना बेसी बढ़ेने चुकायल जा सकैत अछि, आर एहि सँ स्वतंत्रता (मुक्ति) भेटैत अछि ।

एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ॥
बुद्ध्या युक्ता यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥२-३९॥

अहाँ केँ आत्म-साक्षात्कार (सांख्य दर्शनक बुद्धियोग) केर ज्ञान कहल गेल अछि । आब अहाँ (ओहेन) योग केर ज्ञान केँ सुनू, जाहि ज्ञान सँ सम्पन्न भ’ कय, हे पृथापुत्र, अहाँ कर्म केर बन्धन सब केँ तोड़ि देब । 

योग: कर्म-योग, या आचरण केर ओ योजना जे पैछला कर्म सब केँ पूरा करय मे, नव कर्म सब केँ संचित (जमा) नहि करय मे आ पूरा इच्छाशक्तिक संग आत्म-साक्षात्कार लेल प्रयास करबाक वास्ते सुरक्षित करैत अछि । एहि विद्या मे, जीवन मे व्यक्तिक एकमात्र उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार होइत छैक; ताहि सँ कोनो आर चीजक कोनो महत्व नहि देल जाइत छैक । एहि तरहें सब कार्य बिना कोनो आसक्ति या परिणाम केर परवाह कएने बिना कयल जाइत छैक । तेँ कोनो नव कर्म नहि कयल जाइत छैक; मात्र पहिनहिं सँ संचित कयल गेल कर्म टा समाप्त होइत रहैत छैक । आर संगहि, पूरा इच्छाशक्ति केँ मात्र आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करबाक लेल समर्पित होयबाक लेल स्वतंत्र छोड़ि देल जाइत छैक ।

पैछला श्लोक सब, ११-२५ मे, कृष्ण सब सँ उच्च ज्ञान, प्राचीन ब्रह्मज्ञान केर दृष्टिकोण देलनि अछि । २६म आ २७म मे हमरा सब केँ पूर्णतया भौतिकवादी दृष्टिकोण भेटैत अछि । श्लोक २८ सँ ३७ मे दुनियादारीक बारे मे कहल गेल अछि । ३८म श्लोक मे हमरा सब केँ योग केर उम्मीद प्राप्त होइत अछि । आर आगू जे अछि, ताहि मे हमरा सब केँ जीवन केर दर्शन मे श्री कृष्ण केर अपन योगदान भेटैत अछि ।

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ॥
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥२-४०॥

एहि (योग) मे नहि त अधूरा प्रयास केर बर्बादी होइत छैक आर नहिये उल्टा फल (परिणाम) भेटैत छैक । एहि धर्म केर कनियो टा अंश सेहो महान आतंक सँ रक्षा करैत अछि ।

अधूरा प्रयास केर बर्बादी: कोनो निश्चित उद्देश्य वास्ते कयल गेल धार्मिक अनुष्ठान या समारोह, अगर अधूरा छोड़ि देल जाइत छैक, त बर्बाद भ’ जाइत छैक, जेना बिना छतवला घर जे नहि त सेवा योग्य रहैत छैक आ न टिकाउ होइत छैक । जखन कि, कर्म-योग मे, अर्थात् कोनो विशेष चाहत (मनक कामना) बिना कयल गेल कार्य व पूजा मे, ई नियम लागू नहि होइत छैक, कियैक तँ हरेक प्रयासक परिणामस्वरूप हृदय केर तत्काल शुद्धि होइत रहैत छैक ।

उल्टा फल सब भेटब: कोनो वस्तुक पूजा मे, प्रक्रिया मे कोनो तरहक अपूर्णता लाभक बदला सकारात्मक हानि उत्पन्न करैत छैक । जेना कि बीमारीक मामिला सब मे होइत छैक, सही दबाइ केर उपयोग नहि कयला सँ मृत्यु भ’ जाइत छैक ।

महान भय : जन्म आर मृत्यु केर चक्र मे फँसब ।

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ॥
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥२-४१॥

एहि (कर्म-योग) मे, हे कुरुवंशी, बस एक्के टा सुनिश्चित बात छैक । जे निर्णय नहि कय पबैछ ओकर उद्देश्य अनगिनत आ कतेको भाग मे बँटल रहैत छैक । 

कर्म-योग मे, एकमात्र उद्देश्य छैक जे स्वयं केँ प्राप्त करू (आत्म-साक्षात्कार करू) ।

जे निर्णय नहि कय पबैछ (यानी सब सँ नीक “सर्वश्रेष्ठ” केर बारे मे), ओ अपना आप केँ छोट आदर्श (कार्य सब) मे लगा दैत अछि, जाहि मे सँ कोनो टा सन्तोष नहि दय सकैत छैक । एहि तरहें ओ एक योजना सँ दोसर योजना मे जाइत रहैत अछि ।

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ॥
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीतिवादिनः ॥२-४२॥
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ॥
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥२-४३॥
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम ॥
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥२-४४॥

हे पार्थ, जे लोक सुख आर शक्तिक पाछाँ बहुत बेसी लागल रहैत अछि, आर जेकर समझ अज्ञानी लोकक फूल जेहेन (आकर्षक) बात द्वारा चोरा लेल (आकर्षित कय लेल) जाइत अछि (अर्थात् अज्ञानी लोकक आकर्षक बात सब मे जेकर समझशक्ति फँसि गेल करैत छैक), जे कतेको तरहक इच्छा (कामना) सब सँ भरल रहैत अछि आर स्वर्ग केँ अपन सब सँ पैघ गन्तव्य (प्राप्त होयबला उद्देश्य) मानैत अछि आर वेदक स्तुतिपरक शब्द (वेद-स्तोत्र जे विभिन्न देवता लोकनिक प्रशंसा करयवला शब्दभाव सँ भरल अछि) ताहि सब मे आनन्द उठबैत कहैत अछि जे आर बाकी किछु अछिये नहि, ओकर मन मे दृढ़निश्चय इच्छा (निश्चय बुद्धि) नहि बनैछ । ओकर फूल समान (आकर्षक) बात सब सुख आ शक्ति प्राप्तिक साधनक रूप मे किछु खास रीति (कर्माकांडीय उपाय आदि) सँ घेरायल रहैत छैक आ ओकर (सकाम भाव सँ कयल गेल) कर्मक परिणाम स्वरूप नव जन्म केर कारण भेल करैत छैक । 

उपर समाधि केर माने “मन” सँ जोड़ल गेल अछि । एहि शब्दक सामान्यतया मानल जायवला अर्थ (गहींर ध्यान सँ उत्पन्न होयबला ईश्वर-चेतना मे डुबि गेनाय) सेहो ओतबेक एकरूप वला आ प्रसन्नता प्रदान करयवला अर्थ देत; सुख आर शक्तिक पाछाँ लागल लोक दिव्य ध्यान मे मन केँ पूरापूरी स्थिरता नहि पाबि सकैत अछि ।

वेदक स्तुतिपरक बात: वेद केर कर्म-कांड या यज्ञ वला भाग जे खास कर्म आर ओकर फल लेल खास नियम (रीति) बतबैत अछि आर एकर बिना वजह बेसी प्रशंसा करैत अछि ।

आर किछुओ नहि: वेद केर यज्ञ सब सँ भेटयवला स्वर्गीय सुख सभक अलावा ।

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ॥
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥२-४५॥

वेद तीन गुण केर बारे मे कहैत अछि । हे अर्जुन, अहाँ गुण सभक तिकड़ी सँ मुक्त भ’ जाउ, विपरीतार्थक शब्दक जोड़ा सँ मुक्त भ’ जाउ, हमेशा सन्तुलित रहू, पेबाक आ रखबाक (सोच सँ) मुक्त भ’ जाउ, आ स्वयं मे स्थिर रहू । 

वेद एकर बारे मे कहैत अछि, आदि: यानी, वेद सापेक्षताक (गुण सभक सापेक्ष सम्बन्ध) बारे मे बतबैत अछि ।

विपरीतार्थक शब्दक जोड़ा: द्वंद्व, सबटा जुड़ल विचार आ अनुभूति, जेना, नीक आ बेजाय, सुख आ दुःख, गर्मी आ ठंढी, इजोत आ अन्हार, आदि ।

गुण सांख्य दर्शन केर एकटा तकनीकी शब्द अछि जेकरा वेदान्त सेहो एहि अर्थक संग उपयोग करैत अछि । प्रकृति तीन गुण सब सँ बनल अछि; सत्व (इक्विलिब्रियम), रजस (अट्रैक्शन), तमस (इनर्शिया) । प्रकृति केर तीनटा गुण छैक, एहेन नहि छैक जे ओ (प्रकृति) ओकरा सब मे छैक । गुण केर अशुद्ध अनुवाद (माने) क्वालिटी छैक; ई सब्सटेंस (पदार्थ) केर संग क्वालिटी (गुण), मैटर (द्रव्य) आ फोर्स (बल) सेहो छैक । जेतय कतहु नाम आ रूप छैक, ओतय गुण छैक । गुण केर अर्थ रस्सी सेहो होइत छैक, जे बान्हैत अछि ।

हमर नोट: ई बहुते महत्वपूर्ण दर्शन अछि, हमरा सब केँ एहि श्लोक सबपर खुब गहींरता सँ सोचबाक जरूरत अछि । 

यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ॥
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥२-४६॥

जे ब्राह्मण स्वयं केँ जानि लेने छथि, हुनका वास्ते सबटा वेद ओतबे काजक अछि, जतेक बाढ़ि एलापर कोनो पोखरि केर । 

जाहि व्यक्तिक पास आत्मज्ञान होइत छैक ओकरा वेद केर कोनो जरूरत नहि छैक । मुदा, एकर मतलब ई नहि जे वेद बेकार अछि; बस ब्रह्म केँ जननिहार लेल ओकर कोनो महत्व नहि छैक, कियैक तँ ओहि सँ भेटयवला किछु समय केर सुख स्वयं केँ जानि लेबाक (आत्मज्ञान प्राप्त कय लेबाक) अनन्त आनन्द मे भेटि जाइत छैक ।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ॥
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥२-४७॥

अहाँक अधिकार मात्र कर्म करब अछि; मुदा ओकर (कर्मक) फल पर किन्नहुं नहि । अहाँ (अपन) कर्म केर फल केर उत्पादक जुनि बनू; नहिये अपन आसक्ति केँ अकर्मण्यता (कर्महीनता) दिश जाय दिय’ । 

अहाँ उत्पादक आदि नहि बनू: अर्थात् फल केर इच्छा सँ कर्म जुनि करू, कियैक तँ इच्छा सँ कयल गेल कर्महि सँ फल या बन्धन उत्पन्न होइत अछि ।

कर्म केर अर्थ मुख्य रूप सँ क्रिया थिक, मुदा एहि शब्दक संग बहुत गहींर अर्थ जुड़ि गेल अछि । एकर अर्थ अछि जे केकरो पैछला अवतार (जन्म) या वर्तमान मे बनायल गेल नियतिः प्रवृत्ति, आवेग, विशेषता तथा आदति सभक भंडार, जे भविष्य मे जन्म, वातावरण आर ओकर पूरा संगठन केँ निर्धारित करैत अछि ।

कर्म केर एकटा आर अर्थ जे बेसीकाल केकरो जाति या जीवन मे स्थितिक सन्दर्भ मे उपयोग कयल जाइत अछि, से कर्तव्य छी, आचरण केर मार्ग जे कोनो व्यक्ति केँ अपन अतीत मे अर्जित प्रवृत्ति सभक अनुसरण मे पालन करबाक चाही, ओकरा काज मे आनय आ स्वयं केर प्राचीन शुद्धता केँ फेरो प्राप्त करबाक दृष्टि सँ ।

योगस्थः कुरु कर्मणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ॥
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥२-४८॥

हे धनंजय, योग मे स्थिर रहिकय, आसक्ति छोड़िकय, सफलता आर असफलताक चिन्ता कएने बिना कर्म करू । मन केर यैह एकरूपता (समत्व भाव) (सफलता व असफलताक सम्बन्ध मे) योग कहाइत अछि ।

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय ॥
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥२-४९॥

(इच्छाक संग) कर्म करब, मन केँ परिणामक विचार सँ परेशान भेने बिना कयल गेल कर्म सँ कतहु बेसी निम्नतर अछि । हे धनंजय, मन केर एहि समत्व भाव (एकरूपता) मे शरण लिय’ । ओ लोक खराब अछि जे परिणामक लेल कर्म करैत अछि । 

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ॥
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥२-५०॥

मन केर एहि समत्व भाव सँ मनुष्य एहि जीवन मे स्वयं केँ खराब आ नीक दुनू सँ मुक्त कय लैत अछि । तेँ, अहाँ स्वयं केँ एहि योग मे लगा दिय’ । योग टा कर्मक कुशलता थिक । 

खराब आ नीक दुनू सँ एक जेकाँः कर्म-योग केँ मानयवला केँ कोनो काजक लेल कोनो निजी हेतु (उद्देश्य) नहि भ’ सकैत छैक । बिना हेतु केँ हमरा लोकनिक कर्म बेरंग (रंगहीन) भ’ जाइछ, ओहि मे खराब या नीक केर गुण नहि रहैत छैक ।

कर्मक कुशलता: कर्मक स्वभावे छैक बन्धन उत्पन्न कयनाय । कर्म-योग कर्मक कुशलता छी, कियैक तँ ई नहि केवल कर्म बन्हबाक ताकत केँ खत्म करैत अछि, बल्कि ओकरा मुक्तिक एक गोट प्रभावशाली माध्यम सेहो बनबैत अछि ।

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ॥
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयं ॥२-५१॥

एहि समत्व मन वला बुद्धिमान लोक, अपन कर्मक फल केँ छोड़िकय, जन्मक बन्धन सँ हमेशाक लेल मुक्त भ’ कय, ओहि स्थिति मे चलि जाइत अछि जे सबटा खराबी सँ दूर अछि ।

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ॥
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥२-५२॥

जखन अहाँक बुद्धि भ्रम केर दाग सँ आगाँ निकलि जायत, तखन अहाँ सुनल गेल आ सुनल जायवला चीज सभक बारे मे बेपरवाह भ’ जायब । 

भ्रम केर दाग: स्वयं केँ गैर-स्वयं, अहंकार केर संग चिन्हब ।

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ॥
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥२-५३॥

जखन अहाँक बुद्धि, जे विचार सभक टकराहट सँ एम्हर-ओम्हर भटैक रहल छल, स्थिर भ’ जायत आ स्वयं मे दृढ़ता सँ स्थापित भ’ जायत, तखन अहाँ केँ आत्म-साक्षात्कार भेटि जायत । 

अर्जुन उवाच ।

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ॥
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥२-५४॥

अर्जुन कहलनि:

हे केशव, समाधि मे डूबल रहल, स्थिर बुद्धिवला आदमीक कि वर्णन अछि ? दोसर दिश, स्थिर बुद्धिवला आदमी केना बजैत अछि, केना बैसैत अछि, केना चलैत अछि ?

अर्जुन पुछि रहल छथि, (१) समाधि मे रहला पर ज्ञानी आदमी (स्थिर बुद्धिवला लोक) केर मनक हालत केहेन होइत छैक ? आर (२) समाधि सँ बाहर रहला पर ओकर व्यवहार पर एकर असर केना देखाइत छैक ?

स्थिर बुद्धि: प्रत्यक्ष अनुभूति (सीधा अनुभव) सँ भेटयवला स्वयं केर पहिचान ब्रह्म संग हेबाक दृढ़ विश्वास ।

श्री भगवानुवाच ।

प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ॥
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥२-५५॥

भगवान कहलनि:

हे पार्थ, जखन कोनो लोक मन केर सबटा इच्छा सब केँ पूर्णतया त्यागि दैत अछि, आर मात्र आत्मा टा सँ सन्तुष्ट भ’ जाइत अछि, त ओकरा स्थिर बुद्धिवला कहल जाइत छैक । 

ई अर्जुन केर सवालक पहिल भागक जवाब थिक ।

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ॥
वीतरागभयक्रोधः स्थिधीर्मुनिरुच्यते ॥२-५६॥

जेकर मन कठिन घड़ी मे नहि डोलैत (डगमगाइत) अछि, जे खुशीक पाछाँ नहि भागैत अछि, जे प्रेम, भय आ क्रोध सँ मुक्त भ’ गेल अछि, ओ पक्का ज्ञान वला (स्थिरबुद्धि) मुनि थिक । 

ई आर ऐगला दुइ (अध्याय २ केर आर श्लोक) अर्जुन केर सवालक दोसर हिस्साक जवाब दैत अछि, जे पूर्णरूप सँ आत्मज्ञानी व्यक्तिक व्यवहार केहेन हेबाक चाही ।

मुनि: ध्यान करयवला मनुष्य ।

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ॥
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२-५७॥

जे हर जगह अनासक्त रहैत अछि, नीक पाबिकय खुश नहि होइछ, नहिये खराब सँ परेशान होइछ, ओकर बुद्धि स्थिर रहैत छैक । 

खुश नहि होइछ, आदि: तेँ ओ प्रशंसा या निन्दा नहि करैछ । ई एहि सवाल केर जवाब थिकः “ओ केना बजैत अछि?” ।

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ॥
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२-५८॥

जखन कछुआ जेकाँ, ओ अपन सबटा अंग केँ खिचिकय, इंद्रिय सब केँ ओकर चीज सब सँ पूर्ण रूप सँ हंटा सकैत अछि, त ओकर बुद्धि स्थिर भ’ जाइत छैक । 

इंद्रिय केँ वापस खिंचब: मन केँ सब इंद्रिय केर चीज सब सँ वापस अपना आप मे आनब । एकरा योग मे प्रत्याहार कहैत छैक ।

श्लोक केँ आर नीक सँ बुझबाक लेलः सबसँ ऊंच आत्मज्ञान वला लोक, कोनो पल मे, कछुआ जेकाँ अत्यन्तहि सहजता आ प्राकृतिक रूप सँ समाधि मे जा सकैत अछि, इंद्रिय सब केँ दुनियाक सबटा प्रभाव सँ अपना केँ दूर कय सकैत अछि ।

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ॥
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥२-५९॥

संयमी मनुष्य सँ वस्तु सब दूर भ’ जाइत अछि आर लालसा सब सेहो पाछाँ छुटि जाइत अछि । मुदा जे परम (परमात्मा) केँ देखि लैत अछि, ओकरो लालसा सब समाप्त भ’ जाइत छैक । 

संयमी व्यक्ति: एक (ज्ञान केर प्रकाश सँ वंचित) अप्रकाशित व्यक्ति जे तपस्याक वास्ते (संयमित भेला सँ) या फेर शारीरिक अक्षमताक कारण इंद्रिय-सुख सँ दूर रहैत अछि ।

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ॥
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥२-६०॥

हे कुंतीपुत्र, अशांत इंद्रिय सेहो पूर्णताक खोज मे लागल बुद्धिमान लोकक मन केँ एकदम बेतरतीब ढंग सँ हरण कय लैत अछि । 

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ॥
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिताः ॥२-६१॥

जे दृढ़ निश्चयी अछि, ओ ओहि सबटा (अशान्त इंद्रिय सब) केँ नियंत्रण मे कयकेँ, सर्वोच्च मानिकय हमरहि मे ध्यान लगाकय बैसैत अछि । जेकर इंद्रिय सब वश मे छैक, ओकर बुद्धि स्थिर अछि ।

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ॥
सङ्गात् संजायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥२-६२॥

चीज सभक बारे मे सोचला सँ मनुष्य मे ओकरा सब प्रति लगाव उत्पन्न होइत छैक । लगाव सँ चाह उत्पन्न होइत छैक । आ चाह सँ तामस बढ़ैत छैक । 

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ॥
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥२-६३॥

तामस (क्रोध) सँ भ्रम (दुविधा, वहम) होइत अछि, आर भ्रम सँ स्मरणशक्ति हरा जाइत अछि । स्मरण हरा गेला सँ बुद्धिक नाश (बुझनाय खत्म) भ’ जाइछ, आ बुद्धिक नाश भेलापर ओ (स्वयं) खत्म भ’ जाइछ । 

एकटा सुन्दर तस्वीर सोझाँ अबैत अछि । मन केर आदत ओकरा दोहराबय केर होइत छैक । फेर, अगर ओहि तस्वीर केँ बेर-बेर आबय देल जाय, त पसिन पड़य लगैछ । पसिन बढ़ला सँ ओकर लग एबाक, ओकरा हासिल करबाक इच्छा, (हासिल नहि भेलापर) तामश चढ़ब, तामश मन केँ सन्देह मे पाड़ि दैत अछि, जे पहिनेक अनुभव सँ सिखल समझदारीक बात सब पर पर्दा डालि दैत अछि । एहि तरहें अपन नैतिक मानक (स्टैन्डर्ड) सँ दूर भ’ कय, ओ अपन समझ केर उपयोग नहि कय पबैछ । समझ मे चूक (फेल) भेला पर, ओ बिना सोचने-बुझने (अविवेकी जेकाँ), जोश मे आबिकय काज करैत अछि, आर नैतिक मरण केर रास्ता बनबैत अछि ।

एहि तरहें कृष्ण नैतिक गिरावट केर पता ओहि पहिल साँस सँ लगबैत छथि जे मन मे धीरे-धीरे लगभग अन्जानहि मे अबैत अछि ।

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयान्द्रियैश्चरन् ॥
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥२-६४॥

मुदा आत्म-नियंत्रित मनुष्य, इंद्रिय सब केँ संयमित कयकेँ आर आकर्षण (राग) तथा द्वेष सँ मुक्त भ’ केँ वस्तु सभक बीच घुमितो शान्ति प्राप्त करैत अछि । 

उपरोक्त कथन अर्जुन केर चारिम प्रश्न, “ओ केना चलैत अछि?” केर उत्तर मे कहल गेल अछि ।

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ॥
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥२-६५॥

शान्ति मे, सबटा दुःख नष्ट भ’ जाइत छैक । कियैक तँ जे शान्तचित्त अछि ओकर बुद्धि जल्दिये दृढ़ भ’ जाइत छैक । 

यानि स्वयं केँ दृढ़तापूर्वक स्वयं पर केन्द्रित करू ।

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ॥
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥२-६६॥

अस्थिर व्यक्ति केँ (स्वयं केर – आत्मा केर) ज्ञान नहि होइत छैक । आ न ओकरा मे ध्यान होइत छैक । ध्यान नहि करनिहार केँ शान्ति नहि भेटैत छैक । आर शान्तिक बिना लोक केँ खुशी केना भेटि सकैत छैक ? 

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ॥
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥२-६७॥

कियैक तँ, मन, जे भटकैत रहल इंद्रिय सभक पाछाँ चलैत अछि, ओकर समझ केँ ओनाही दूर लय जाइत छैक, जेना हवा पानि पर नाव केँ ओकर रास्ता (निर्धारित मार्ग) सँ दूर लय जाइत छैक । 

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ॥
इन्द्रियाणीन्दियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२-६८॥

तेँ, हे महाबाहो, ओकर ज्ञान स्थिर छैक, जेकर इंद्रिय सब अपन विषय सब सँ पूरा तरीका सँ नियंत्रित छैक ।

एकर मतलब ई नहि अछि जे इंद्रिय सब पूरे तरीका सँ अलग-थलग रहैत छैक, बल्कि ई छैक जे ओ सब अपन स्वेच्छा कयला सँ अलग-थलग रहैत छैक ।

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ॥
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥२-६९॥

जे सब प्राणीक लेल राति अछि, ताहि मे आत्म-नियंत्रित लोक जागैत अछि । जाहि मे सब प्राणी जागैत अछि, ओ आत्म-द्रष्टा मुनिक लेल राति अछि ।

जेतय सब प्राणी अन्हार मे रहैत अछि, ओतय मुनि देखैत छथि, आर एकर उल्टा सेहो होइत छैक । ज्ञानी लोकक चेतना ईश्वर सँ एतबे भरल रहैत छैक जे ओ हुनका अलावा किछु नहि देखि सकैछ । दोसर दिश, अज्ञानी लोक मात्र बहुजनक दुनिया मे रहैत अछि आर ईश्वर ओकरा लेल किछु होइत छथि ।

एकर मतलब अछि, जे प्रकृति केर प्रभाव सँ दूर रहनाय, यानि पूर्ण आत्म-नियंत्रण (जेकरा बारे मे श्लोक ६८ मे कहल गेल अछि) ज्ञानी आत्मा केर ओतबेक प्राकृतिक गुण छैक जतेक कि एकर उलटा अज्ञानी केर ।

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ॥
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥२-७०॥

जेना समुद्र मे – जे लबालब भरल अछि आ शान्त अछि – पानि बहैत छैक, तहिना जाहि मुनि मे सबटा इच्छा सब समा जाइत अछि, हुनका शान्ति भेटैत अछि, नहि कि इच्छा सब केँ चाहनिहार केँ । 

समुद्र पर चारू दिश सँ बहैत पानिक कोनो प्रभाव नहि पड़ैत छैक । तहिना, मात्र वैह लोक सचमुच मे शान्ति पबैत अछि जेकरा मे धरती पर रहबाक दरम्यान भेटयवला भोग-विलास केर चीज-वस्तु सँ कोनो इच्छा उत्पन्न नहि होइत छैक ।

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निस्पृहः ॥
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥२-७१॥

जे आदमी बिना कोनो चाहत केर, सबटा इच्छा सब केँ छोड़िकय, “हम” आ “हमर” केर भावनाक बिना जिबैत अछि, ओकरा शान्ति भेटैत छैक ।

जे आदमी जिबैत अछि – मात्र अपन कर्म सब केँ पूरा करबाक लेल ।

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ॥
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥२-७२॥

हे पृथापुत्र, यैह ब्रह्म मे रहबाक केकरहु स्थिति थिक । ई पाबिकय कियो भ्रमित नहि होइत अछि । एहि मे स्थित भ’ कय, जीवनक अन्त मे पर्यन्त, मनुष्य ब्रह्म केर संग एक भ’ जाइत अछि ।

इति सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः॥

हमर नोट: गीताक चैप्टर १ आ २ पूरा कयलाक बाद, आब हम सब चैप्टर ३ मे आबि गेल छी । हम सब देखलहुँ जे केना श्री कृष्ण अर्जुन केँ अपन राज्य वापस पेबाक अधिकार वास्ते अपनहि लोक सब केँ – गुरु, भाइ, सम्बन्धी आदि सँ नहि लड़बाक हुनकर निर्णय पर बात कयलनि अछि । श्री कृष्ण आत्मा आर दृढ़ आत्मज्ञान केर बारे मे विस्तार सँ बुझौलनि अछि । आर आब पहिले दुइ श्लोक मे अर्जुनक सवाल एहि तरहक अछि: आगू अध्याय ३ मे देखब ।

हरिः हरः!!

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