ॐ श्री परमात्मने नमः !!
॥चतुर्थोऽध्यायः॥
श्री भगवानुवाच ।
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहव्ययम् ॥
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥४-१॥
भगवान कहलनि:
हम ई अविनाशी योग विवस्वत केँ कहलियनि; विवस्वत एकरा मनु केँ बतौलनि; (आर) मनु ई इक्ष्वाकु केँ बतौलनि:
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ॥
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥४-२॥
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ॥
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥४-३॥
एहि तरहें निरन्तर क्रम सँ उत्तराधिकारी लोकनि केँ बतायल गेलनि, राज ऋषि सब केँ ई पता रहनि । हे शत्रु केँ जरौनिहार (अर्जुन)! ई योग बहुते समय बाद एहि दुनिया सँ ह्रास (खत्म) भ’ गेल । हम आइ अहाँ केँ वैह पुरना योग बतेलहुँ अछि, कियैक तँ अहाँ हमर भक्त आ मित्र छी, आर ई रहस्य सचमुच अत्यन्त गूढ़तम (गहींर) अछि ।
रहस्य: कोनो एकटा लोक या समुदाय केर खास अधिकारक रूप मे नहि, मुदा एकर गहींरता (गूढ़ता) केर कारणे ई (रहस्यपूर्ण) अछि ।
हमर नोट: जे हम सब पैछला चैप्टर मे सिखलहुँ, जे काज (कर्म) केना करब आ ओ काज हमरा सब केँ केना नहि बान्हत, हम सब केना बिना इच्छा वला लोक बनि सकैत छी, वैह योग एकटा रहस्य थिकैक । तेँ, सावधान रहू आ दृढ़ रहू जे ई अयोग्य लोकक हाथ मे नहि हरा देब, बरु एकरा अपन जीवन मे जीबू ।
अर्जुन उवाच ।
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ॥
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥४-४॥
अपनेक जन्म बाद मे भेल अछि, आर विवस्वत केर जन्म पहिनहिं भेलन्हि; तखन हम केना बुझू जे अपने ई बात शुरूए मे बता देने रहियनि ?
श्री भगवानुवाच ।
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥४-५॥
अजोऽपि सन्नव्यात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ॥
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥४-६॥
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ॥
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥४-७॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ॥
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥४-८॥
भगवान कहलनि:
हे अर्जुन, हमर आर अहाँक कतेको रास जन्म (पहिने सेहो) भेल अछि । हम ताहि सब केँ जनैत छी, जखन कि हे शत्रु केँ जरौनिहार, अहाँ से नहि जनैत छी । चूँकि हम अजन्मा छी, अपरिवर्तनशील स्वभाव केर छी आर प्राणी सभक स्वामी छी, तैयो अपन प्रकृति केँ अधीन (वश) मे कयकेँ, हम अपन माया सँ अस्तित्व मे अबैत छी । हे भरतवंशी, जखन धर्म केर पतन आ अधर्म केर उदय होइत अछि, तखन हम शरीर धारण करैत छी । साधु (नीक) लोक सभक रक्षाक लेल, दुष्कृत् (खराब कार्य करयवला) लोक सभक विनाश केर लेल, आर धर्म केर स्थापनाक लेल, हम हर युग मे अस्तित्व मे अबैत छी ।
अपन प्रकृति केँ अधीन (वश) मे कयकेँ: ओ दोसर जेकाँ कर्म सँ बान्हल, प्रकृति केर दासता (बन्धन) मे नहि अबैत छथि । ओ गुण सभक जंजीर सँ बान्हल नहि छथि – कियैक तँ ओ सम्पूर्ण मायाक स्वामी छथि ।
अपन माया सँ: हमर अवतार मात्र देखाय पड़ैत अछि आर हमर असली स्वरूप केँ नहि छुबैत अछि ।
धर्म आर ओकर उल्टा अधर्म, ओहि समस्त कर्म (आर तेकर उल्टा कर्म सब) केँ कहैत छैक जे अलग-अलग स्थान पर लोकक लेल ओकर जीवन आ मोक्ष केर सुनिश्चित योजनाक हिसाब सँ तय कयल गेल छैक ।
दुष्कृत् (खराब काज करयवला) लोकक नाश: ओकरा खराबी केँ खत्म करय लेल आर ओकरा सदाचरण (सनातन) जीवन दियए लेल (ओकर नाश कयल जाइछ) ।
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ॥
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥४-९॥
ओ जे सत्य रूप सँ हमरा, हमर दिव्य जन्म आ कर्म केँ जनैत अछि, ओ (अपन) शरीर केँ छोड़लाक बाद दोबारा जन्म नहि लैत अछि; ओ हमरा प्राप्त करैत अछि, हे अर्जुन ।
जे जनैत अछि, इत्यादि: जे एहि महान सत्य केँ जनैत अछि – जे भगवान भले जन्म लैत छथि, मुदा जन्म आ मृत्यु सँ परे (दूर) छथि, धर्म केर काज मे लागल रहैत छथि, आर सब कर्म सब सँ परे (दूर) छथि – ओ (व्यक्ति) आत्म-ज्ञान सँ प्रकाशित भ’ जाइत अछि । एहेन आदमी दोबारा जन्म नहि लैत अछि ।
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिता ॥
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥४-१०॥
आसक्ति (राग), भय आ क्रोध सँ मुक्त भ’ कय, हमरा मे लीन भ’ कय, हमर शरण मे आबिकय, ज्ञानक आगि सँ पवित्र भ’ कय, बहुतो लोक हमर लोक केँ (हमरा) प्राप्त कयलक अछि ।
बहुतो लोक प्राप्त कयलक अछि: एकर मतलब ई अछि जे श्री कृष्ण द्वारा जे मुक्तिक मार्ग एतय कहल गेल अछि, ओ एखुनका नहि थिक, नहिये ई हुनकर एखुनका रूप (श्रीकृष्णक रूप) पर निर्भर अछि, बल्कि ई बहुते प्राचीन समय सँ चलैत आबि रहल अछि ।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ॥
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥४-११॥
लोक जाहि भाव सँँ हमर पूजा करैत अछि, ताहि भाव सँ हम ओकर इच्छा सब पूरा करैत छी; हे पृथापुत्र, लोक हरेक तरीका सँ हमरहि रास्ता अपनाबैत अछि ।
एहि श्लोक मे श्री कृष्ण किछु एहेन आपत्तिक बात पर सम्बोधन करैत देखाइत छथि जाहि मे कहल जाइत छैक जे भगवान किछु लोकक संग पक्षपोषण करैत छथि तथा बाकी आर लोक सभक संग निर्दयता, कियैक तँ ओ किछु लोक केँ आत्म-ज्ञान केर आशीर्वाद दैत छथि आर बाकी केँ अंधकार आ दुःख मे छोड़ि दैत छथि । ई अन्तर ओहि लोक सभक प्रति हुनकर (भगवानक) नजरिया मे कोनो अन्तरक कारण नहि छैक, बल्कि ई लोक सभक अपन पसिनक कारण सँ छैक ।
हमर रास्ता: सोच (विचार) आर काज (कर्म) केर पूरा क्षेत्र मे, जेतय कतहु उद्देश्य पूरा होइत अछि, चाहे किछुओ हो, ओ भगवानहि केर कारण सँ होइत अछि । (हमरा लोकनिक) भीतर आत्माक रूप मे, ओ सबटा इच्छा सब केँ पूरा करैत छथि, जखन जरूरी शर्त सब पूरा भ’ जाइत अछि तखन ।
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवता ॥
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥४-१२॥
एहि दुनिया मे कर्म मे सफलताक इच्छा सँ, (मनुष्य) भगवानक पूजा करैत अछि । कियैक तँ कर्म सँ भेटयवला सफलता, मनुष्यक संसार मे जल्दी भेटि जाइत छैक ।
कियैक तँ सफलता…… मनुष्यक संसार: सांसारिक सफलता, स्वयं (आत्मा) केँ जानय सँ कतहु बेसी सहज छैक । तेँ अनजान लोक स्वयं केँ जनबाक कोशिश नहि करैछ ।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ॥
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥४-१३॥
चारि प्रकारक जाति (वर्ण) हमहीं बनेने छी, से गुण आ कर्म केर फर्क सँ । जखन कि हम एकर बनेनिहार छी, तैयो हमरा अकर्ता आ अपरिवर्तनशील जानब ।
ई श्लोक मनुष्यक स्वभाव आ आदति सभक अलग-अलग प्रकार केर बात सब बुझेबाक लेल अछि । सब मनुष्य एक जेहेन स्वभावक नहि होइत अछि, कियैक तँ ओकरा सब मे अलग-अलग गुणक प्रधानता (प्राबल्यता) रहैत छैक ।
जाति व्यवस्था असल मे मानवताक विकास केँ पूरा करबाक लेल छल, जाहि मे भेदपूर्ण चयन प्रक्रिया द्वारा किछु विशेष संस्कृति केँ किछु विशेष तरीका सँ कयल जायब छल ।
जखन कि हम एकर बनेनिहार छी आदिः भगवान, जाति व्यवस्थाक बनबयवला भेलाक बादो, तैयो बनबयवला नहि छथि । करयवला या एक प्रतिनिधि बुझल जेबाक वैह भय (शंका) बेर-बेर उठैत अछि । एहि दुविधा (उल्झन) केँ अध्याय ९. ५-१० मे बुझायल गेल अछि । माया असली बनबयवाली छी, मुदा हुनका (भगवानकेँ) एना एहि लेल मानल जाइत छन्हि, कियैक तँ हुनकहि प्रकाश टा अछि जे नहि सिर्फ सब काज केँ, बल्कि स्वयं माया केँ सेहो अस्तित्व प्रदान करैत अछि ।
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ॥
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥४-१४॥
नहि तँ कर्म हमरा दूषित (लिप्त) करैत अछि आ न हमरा कर्मक फलहि केर कोनो प्यास (इच्छा या स्पृहा) अछि । जे हमरा एहि सत्यक संग जानि लैत अछि, ओहो कर्म सभक बन्धन मे नहि बन्हाइत अछि ।
कर्म हमरा दूषित नहि करैछ: कर्म हमरा मे किछुओ बाहर सँ नहि आनि सकैत अछि । हम अपन सत्य स्वरूप, जे कि पूर्णतया सम्पूर्ण अछि, ओहि सँ कखनहुँ दूर नहि जाइत छी ।
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वेरपि मुमुक्षुभिः ॥
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥४-१५॥
एना जानिकय, मुक्ति चाहयवला प्राचीन साधक लोकनि सेहो कर्म कयलनि । तेँ, अहाँ सेहो कर्म करू, जेना प्राचीन समय मे प्राचीन लोक सब करैत रहथि ।
एना जानिकय: एहि नजरिया सँ, यानी कि आत्मा केँ कर्मक फल केर कोनो इच्छा नहि भ’ सकैत अछि आर ओ कर्म सँ दूषित सेहो नहि भ’ सकैत अछि ।
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ॥
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥४-१६॥
ऋषि-मुनि लोकनि सेहो उल्झन मे छथि जे कर्म कि थिक आर अकर्म कि थिक । तेँ हम अहाँ केँ बतायब जे कर्म कि थिक, जे जानिकय अहाँ अशुभ (खराबी) सँ मुक्त भ’ जायब ।
अशुभ (खराबी): अस्तित्वक खराबी, जन्म आ मृत्यु केर चक्र ।
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यञ्च विकर्मणः ॥
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥४-१७॥
वास्तव मे, (शास्त्र द्वारा निर्दिष्ट) कर्म सभक सेहो (वास्तविक स्वरूप केँ) जनबाक चाही, संगहि (ओहि) निषिद्ध कर्म आर अकर्म केँ सेहो जनबाक चाही, कर्मक गति बहुत अभेद्य (गहन, गूढ़) होइत छैक ।
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ॥
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥४-१८॥
जे मनुष्य कर्म मे अकर्म आ अकर्म मे कर्म देखैत अछि, से मनुष्य मध्य बुद्धिमान अछि, योगी अछि आर सब कर्म केर कर्ता अछि ।
कोनो कर्म ताबत धरि कर्म अछि जाबत धरि स्वयं (आत्मा) केर भूमिकाक विचार कायम रहैत छैक । जहिना कर्तापन केर विचार लुप्त भ’ जाइत छैक, चाहे किछुओ कयल जाय, चाहे कतबो कयल जाय, कर्म अपन स्वभाव हरा लैत अछि । ई हानिरहित भ’ गेल अछि; ई आब बान्हि नहि सकैत अछि । दोसर दिश, अज्ञानी लोक चाहे कतबोक निष्क्रिय कियैक नहि भ’ जाय, जाबत धरि ओकरा मे कर्तापन केर विचार छैक, ओ निरन्तर कर्म करैत रहैत अछि । कर्म कर्तापन केर विश्वासक बराबर छैक आर अकर्म एकर उल्टा छैक ।
ओ कर्म केर कर्ता अछि: ओ सब कर्मक अन्त पाबि गेल अछि, जे अकर्म थिक ।
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ॥
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥४-१९॥
जेकर सबटा कर्म नियार (योजना) आ नतीजा (परिणाम) केर इच्छा सँ खाली भ’ गेल हो, आर जेकर कर्म ज्ञानक अग्नि सँ जरि गेल हो, ओकरा, ऋषि लोकनि बुद्धिमान कहैत छथि ।
जेकर कर्म ज्ञानक अग्नि सँ, आदि: जे अहंकार सँ खाली हो ।
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ॥
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥४-२०॥
कर्म केर फल सँ आसक्ति छोड़िकय, हमेशा सन्तुष्ट, कोनो चीज पर निर्भर नहि रहैत, कर्म मे लागल रहलो पर ओ किछु नहि करैत अछि ।
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ॥
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥४-२१॥
बिना उम्मीद केँ, शरीर आ मन केँ नियंत्रण मे राखिकय, आर सब चीज (सर्वपरिग्रह) छोड़िकय, ओ मात्र शारीरिक काज कयकेँ कोनो खराब नतीजा (दुष्परिणाम) नहि भोगैत अछि ।
खराब नतीजा: नीक आ बेजा काज सभक नतीजा (परिणाम), कियैक तँ दुनू बन्धन दिश लय जाइत छैक ।
यदृच्छालाभसन्तुष्टौ द्वन्द्वातीतौ विमत्सरः ॥
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥४-२२॥
बिना कोनो विशेष यत्न कएने जेहो किछु भेटैत अछि, ताहि सँ प्रसन्न रहैछ (सन्तुष्ट), उल्टा-सीधाक जोड़ा सँ बेपरवाह (द्वन्द्वातीत), ईर्ष्या-डाह सँ मुक्त (विमत्सर), सफलता आ असफलता मे एक्के समान सोचयवला, कर्म सब करितहु, ओ कोनो बन्धन मे नहि पड़ैछ ।
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ॥
यज्ञायाचरतः कर्म समग्र प्रविलीयते ॥४-२३॥
आसक्ति सँ रहित, ज्ञान मे केन्द्रित मन केर संग मुक्त, केवल यज्ञ केर कार्य करैत, ओकर सबटा कर्म नष्ट भ’ जाइत छैक ।
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ॥
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥४-२४॥
(यज्ञ) प्रक्रिया ब्रह्म अछि, घृत ब्रह्म अछि, ब्रह्म द्वारा ब्रह्म केर अग्नि मे अर्पित कयल गेल; ब्रह्म केँ कर्म करैत देखिकय, ओ मात्र ब्रह्महि धरि पहुँचैत अछि ।
एतय कहल गेल मुताबिक, काज मे लागल लोक केर सबटा कर्म केना पिघैल सकैत छैक ? कियैक तँ ज्ञानक बाद, ओकर पूरा जीवन यज्ञ केर एकटा काज बनि जाइत छैक, जाहि मे आहुति देबाक प्रक्रिया, आहुति, अग्नि, यज्ञ करयवला, कर्म, आर लक्ष्य, सबटा ब्रह्म छथि । चूँकि ओकर कर्म सँ ब्रह्म केँ पेबाक अलावा कोनो आर नतीजा नहि भेटैछ, तेँ कहल जाइत अछि जे ओकर कर्म पिघैल जाइत अछि ।
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ॥
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥४-२५॥
किछु योगी मात्र देवता सभक वास्ते यज्ञ करैत छथि, जखन कि दोसर मात्र ब्रह्म केर अग्नि मे स्वयं (आत्मा) अपना-आप केँ बलिदान सामग्रीक रूप मे अर्पित करैत छथि ।
दोसर लोक अर्पण करैत अछि आदि: एतय जाहि यज्ञ केर चर्चा अछि, से अछि स्वयं केँ ओकर उपाधि (सीमित करयवला सहायक) सँ अलग करब, जाहि सँ ‘ई’ (आत्मा) ‘परम आत्मा’ (परमात्मा) के रूप मे प्राप्त कयल जा सकय ।
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ॥
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥२६॥
किछु लोक सुनयवला (श्रोत्र) आ दोसर इंद्रिय सब केँ बलिदान स्वरूप नियंत्रण केर अग्नि मे चढ़बैत छथि, जखन कि दोसर लोक सब आवाज आर दोसर इंद्रिय केर चीज सब केँ इंद्रिय केर अग्नि मे बलि स्वरूप चढ़बैत छथि ।
दोसर लोक सब आवाज वगैरह चढ़बैत छथि: दोसर लोक अपन इंद्रिय केँ पवित्र तथा निषेधित नहि कयल गेल चीज सब दिश लगबैत छथि, आर एना कय केँ स्वयं केँ बलिक कार्य करयवला मानैत छथि ।
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ॥
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥४-२७॥
गोटेक लोक ज्ञान द्वारा प्रज्वलित (प्रदीप्त) आत्म-नियंत्रण केर अग्नि मे इंद्रिय केर समस्त क्रिया सब केँ तथा प्राण ऊर्जा केर क्रिया सब केँ आहुति (बलिदान) रूप मे अर्पित करैत छथि ।
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथाऽपरे ॥
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥४-२८॥
किछु लोक फेर सँ धन, तपस्या आर योग केँ बलि रूप मे चढ़बैत छथि, जखन कि किछु आर लोक सब संयम आ कठोर व्रत सभक संग शास्त्र आदिक अध्ययन (स्वाध्याय) एवं ज्ञान केँ बलिक रूप मे चढ़बैत छथि ।
योग केँ बलिक रूप मे चढ़ेनाय: अष्टांग योग केर अभ्यास बलिक रूप मे करय पड़ैत छैक ।
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथाऽपरे॥
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ॥४-२९॥
फेर किछु आरो लोक बलिक रूप मे, बाहर जायवला साँस केँ अन्दर जायवाली साँस मे, आर अन्दर आबयवाली साँस केँ बाहर जायवाली साँस मे, अन्दर आबयवाली आ बाहर जायवाली साँसक मार्ग केँ रोकिकय, लगातार महत्वपूर्ण ऊर्जा केर नियमन केर अभ्यास करैत, अर्पित करैत छथि; जखन कि आन लोक सब सेहो नियंत्रित भोजन द्वारा, प्राण मे ओकर कार्य केँ अर्पित करैत छथि ।
प्राण मे ओकर कार्य (नियंत्रित भोजनक कार्य) केँ अर्पित कयनाय: जे कोनो प्राण नियंत्रित कयल गेल अछि, ओहि मे ओ आन समस्त प्राण केर आहुति दैत छथि; ई बादवला, मानू पहिल वला मे विलीन भ’ जाइत अछि । या, दोसर तरीका सँ: ओ विभिन्न प्राण सब केँ नियंत्रित करैत छथि आर ओकरा सब केँ पूर्वोक्त विधि सँ एकीकृत करैत छथि; एहि प्रकारे इंद्रिय सब क्षीण भ’ जाइत अछि आर एकीकृत प्राण मे विलीन भ’ जाइत अछि, जे एकटा यज्ञ कार्य होइत अछि ।
श्लोक २५ सँ २९ मे वर्णित सम्पूर्ण विभिन्न कार्य सब केँ यज्ञ मे चढ़ावा (बलिदान कयल जायवला सामग्री – हविष्य सब) केर रूप मे केवल कल्पना कयल गेल अछि, शास्त्र सभक अध्ययन यज्ञक कार्य मानल जाइत अछि, इत्यादि ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥४-३०॥
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ॥
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥४-३१॥
ई सब गोटे यज्ञक ज्ञाता छथि, यज्ञ द्वारा अपन पाप सब केँ भस्म कयकेँ आर यज्ञ केर अवशेष – अमृत केँ खाकय – ओ सनातन ब्रह्म केँ प्राप्त होइत छथि । यज्ञ नहि करयवलाक लेल त ई संसारो नहि होइत अछि, फेर हे कुरुश्रेष्ठ, दोसर (संसार सँ अलग अन्य विभिन्न ब्रह्माण्डीय संसार सब) केना भ’ सकैछ ?
ओ सनातन ब्रह्म केँ प्राप्त होइत छथिः समय केर संग, हृदय केर शुद्धि द्वारा ज्ञान प्राप्त कयकेँ ओ सनातन ब्रह्म केँ प्राप्त होइत छथि ।
यज्ञ नहि करयवला लेल त ई संसारो नहि होइत अछि: एकर अर्थ अछि – जे उपरोक्त यज्ञ सब मे सँ कोनो एकहु केँ नहि करैछ, ओ एहि दुःखी मानव संसारहु केर योग्य नहि अछि – फेर ओ एहि सँ श्रेष्ठतर लोक केँ प्राप्त करबाक आशा भला केना कय सकैत अछि ?
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ॥
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥४-३२॥
उपर कहल गेल जेकाँ कतेको रास यज्ञ वेदक भंडार मे भरल (बिखड़ल) पड़ल अछि (वर्णित अछि) । ओहि सबटा केँ कर्म सँ उत्पन्न भेल जानू; आर एहि प्रकार सँ जानिकय, अहाँ मुक्त (स्वतंत्र) भ’ जायब ।
वेद केर भंडार मे भरल (बिखड़ल) पड़ल: वेद सँ सिखायल गेल या वेद केर जरिए जानल गेल ।
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ॥
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥४-३३॥
हे शत्रु सब केँ जरबयवला, ज्ञान-यज्ञ, भौतिक वस्तु (हविष्य आदि) सँ कयल गेल यज्ञ सँ श्रेष्ठ अछि । हे पार्थ, सब कर्म अपन संपूर्ण रूप मे ज्ञानहि टा मे अपन पूर्णता प्राप्त करैत अछि ।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ॥
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥४-३४॥
ई जानि लिय’ जे अहाँक स्वयं केँ विनम्र रूप सँ झुकल राखि (दण्डवत प्रणाम कयकेँ), प्रश्न पूछय (सवाल करय) आ सेवा करय सँ; बुद्धिमान लोक, जे सत्य केँ जानि लेलनि अछि, अहाँ केँ सेहो वैह (सत्य) ज्ञान केर शिक्षा देताह ।
गुरु के सामने प्रणाम कयनाय, सवाल पुछनाय आर हुनकर निजी सेवा कयनाय, शिष्यत्व छी ।
जे सत्य केँ जानि लेलनि अछि: सिर्फ सैद्धांतिक ज्ञान, चाहे कतबो सही हो, कोनो व्यक्ति केँ गुरु बनेबाक काबिल नहि बनबैछ: सत्य, या ब्रह्म केँ, केकरो द्वारा ओहि ऊँच पद केर दावा करय सँ पहिने, (अपना आप) मे अनुभति कयल जेबाक चाही ।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ॥
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥४-३५॥
जे जानिकय, हे पांडव, अहाँ फेर एना धोखा नहि खायब, आर जाहि सँ अहाँ पूर्ण सृष्टि केँ (अपन) स्वरूप आ हमरा मे देखब ।
जे जानिकय: पैछला श्लोक मे गुरु सँ सिखबाक लेल कहल गेल ज्ञान ।
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ॥
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥४-३६॥
भले अहाँ सब पापियो मे सब सँ बेसी पापी होइ, तैयो मात्र ज्ञान केर बेड़ा (जहाज) सँ अहाँ सब पाप सँ पार पाबि (पार उतरि) जायब ।
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ॥
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥४-३७॥
जेना धधकैत आगि समिधा (लकड़ी जाहि सँ यज्ञ कयल जाइछ) केँ भस्म बना दैत अछि, तेनाही हे अर्जुन, ज्ञान केर अग्नि सारा कर्म केँ जराकय भस्म कय दैत अछि ।
बिना सन्देह, ओकरा छोड़िकय, यानि प्रारब्ध या ओ कर्म, जे शरीर बनलाक बाद, फल देनाय शुरू कय चुकल अछि ।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ॥
तत्स्वयं योसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥४-३८॥
सच मे, एहि दुनिया मे ज्ञान जेहेन पवित्र करयवला आर किछुओ नहि अछि । सही समय पर, योग मे पूर्णता प्राप्त कयलाक बाद, लोक अपन हृदय मे स्वयं केँ अनुभव (महसूस) करैत अछि ।
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ॥
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥४-३९॥
श्रद्धा राखयवला, समर्पित, अपन इंद्रिय सभक मालिक, एहि ज्ञान केँ पबैत अछि । ज्ञान पाबिकय ओ तुरन्त परम शान्ति केँ प्राप्त भ’ जाइत अछि ।
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ॥
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥४-४०॥
अज्ञानी, श्रद्धा रहित मनुष्य, स्वयं पर सन्देह करयवला लोक विनाश केँ प्राप्त होइत अछि । सन्देह करयवला लोक लग नहि त ई लोक अछि, न परलोक, नहिये सुख ।
अज्ञानी: जे स्वयं (आत्मा) केँ नहि जनैत अछि ।
श्रद्धा विहीन लोक: जेकरा अपन गुरुक शब्द आर शिक्षा सब पर कोनो विश्वास नहि छैक ।
सन्देह करयवला लोक लग, आदि: एकटा सन्देह करयवला स्वभाव (प्रवृत्ति) एहि दुनियाक आनन्द लय मे खसि पड़ैत अछि, ओकर मन-मस्तिष्क मे लगातार लोक सब आ ओकर लग-पासक चीज सभक बारे मे सन्देह बढ़ैत रहबाक कारण, आर ऐगला दुनियाक सम्बन्ध मे सेहो सन्देह सँ भरल होइत छैक; अज्ञानी और श्रद्धाहीन मनुष्य सेहो एहिना करैत अछि ।
योगसंयस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् ॥
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥४-४१॥
हे धनंजय, योग द्वारा कर्म केर त्याग कय देने तथा ज्ञान द्वारा सन्देह केँ दूर कय देने लोक, जे स्वयं (आत्मा) मे स्थित अछि, ओकरा कर्म नहि बान्हैत छैक ।
तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ॥
छित्त्वैनं संशयं योमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥४-४२॥
तेँ अपना हृदय मे रहयवला अज्ञान सँ उत्पन्न एहि ‘स्वयं’ (आत्मा) केर बारे मे सन्देह केँ ज्ञानक तलवार सँ काटिकय योग केर शरण लियह । उठू, हे भारत !
इति ज्ञानकर्मसंन्यासयोगो नाम चतुर्थोऽध्यायः॥
The End of Chapter Four, Designated, The Way of Renunciation of Action in Knowledge !!
हरिः हरः !!
