स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वतीक अंग्रेजी अनुवाद ओ भाष्य केर मैथिली अनुवाद
ॐ श्री परमात्मने नमः !!
॥प्रथमोऽध्यायः॥
धृतराष्ट्र उवाच ।
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ॥
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥१॥
धृतराष्ट्र कहलनि:
हे संजय, हमरा बताउ ! धार्मिक कार्यक केन्द्र कुरुक्षेत्र मे युद्धक इच्छा सँ एकत्रित हमर आ पांडव पक्षक लोक कि कय रहल अछि ?
ई सच अछि जे दुनू पक्ष युद्धक लेल जमा भेल छल, मुदा कि कुरुक्षेत्र, जे कि प्राचीन समय सँ धार्मिक आ आध्यात्मिक कार्यक लेल पवित्र केन्द्र रहल छल, तेकर प्रभाव सँ कोनो परिणाम नहि निकलल की ?
कि ओहि स्थानक आध्यात्मिक प्रभाव कोनो नेतृत्वकर्ता लोकनि पर एहि तरहक प्रभाव नहि देलक जाहि सँ युद्ध होयबा मे मदति नहि करय ? धृतराष्ट्र केर सवालक यैह मतलब अछि ।
सञ्जय उवाच ।
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ॥
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥२॥
संजय कहलनि:
मुदा तखन राजा दुर्योधन पांडव सेनाक युद्ध लेल सजल पाँति (तैयारी अबस्था) मे देखिकय अपन गुरु द्रोण लग जाकय ई शब्द बजलाह:
संजय केर जवाब “मुदा तखन” सँ शुरू होइत अछि आर दुर्योधन केर किरदानीक सम्बन्ध मे कहैत छथि, ई वृद्ध राजा केँ स्पष्ट संकेत रहनि जे हुनकर बेटा डरा गेल रहय । कियैक तँ ओ सेनापतिक बदला अपन गुरु (जिनका पिता मानल जाइत अछि) लग गेलाह, जेना डरायल धियापुता (बच्चा) दोसरक बदला अपन माय-बाप लग भागैत अछि ।
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ॥
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥३॥
“देखल जाउ, हे गुरुदेव ! पांडुपुत्र लोकनिक ई बड़का (भारी) सेना, अपनेहिक प्रतिभाशाली शिष्य ‘द्रुपद केर पुत्र’ केर संग ठाढ़ अछि ।
जेना बिच्छू ओकरो डंक मारि दैत छैक जेकर सुरक्षा ओकरा भय सँ मुक्त करयवला होइत छैक, तहिना दुष्ट दुर्योधन अपन गुरुक अपमान कयलक । स्पष्ट शब्द मे ओकर कहबाक मतलब ई छैक: अपने एना सोचू जे अहाँ द्रुपद केर बेटा आ पांडुक बेटा सब केँ युद्धक विद्या सिखाकय कतेक बेवकूफी कयलहुँ । ओ सब आब अहाँ केँ मारबाक लेल तैयार अछि !
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ॥
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥४॥
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ॥
पुरुजित् कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥५॥
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ॥
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥६॥
“एतय वीर, शक्तिशाली धनुर्धर, युद्ध मे भीम आ अर्जुनक बराबर, महान योद्धा लोकनि युयुधान, विराट, द्रुपद; बहादुर धृष्टकेतु, चेकितान, आर काशीक राजा; पुरुष लोकनि मे सर्वश्रेष्ठ, पुरुजित, कुंतीभोज, आर शैब्य; शक्तिशाली युधामन्यु, आर बहादुर उत्तमौजा, सुभद्राक बेटा आ द्रौपदीक बेटा – ई सब महान रथ केर स्वामी सब अछि ।
महारथ: महान रथवला: ओ जे युद्ध केर विद्या मे पारंगत होइथ तथा एगारह हजार धनुर्धारी लोकनिक नेतृत्व करैत होइथ ।
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ॥
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते ॥७॥
“हे द्विज लोकनि मे श्रेष्ठजन ! हुनका लोकनिक नाम सेहो सुनू जे हमरा सभक बीच मे गणमान्य (प्रतिष्ठित लोक सब) छथि, हमर सेनाक नेतृत्वकर्ता सब जे छथि । ई हम अपनेक जानकारी वास्ते अपने केँ कहि रहल छी ।
अपने युद्ध विज्ञान मे कतबो पारंगत कियैक न होइ, आखिरकार अपने एकटा ब्राह्मण (द्विज मे सर्वश्रेष्ठ), शान्ति प्रेमी, कहबाक तात्पर्य जे, एक डरपोक लोक छी । तेँ पांडव सेना सँ अपनेक भयभीत होयब स्वाभाविक अछि । मुदा हिम्मत राखू, हमर सेना मे सेहो महान योद्धा सब छथि – दुर्योधनक शब्द केर परोक्ष अर्थ यैह छन्हि ।
भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः ॥
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिर्जयद्रथः ॥८॥
“अपने स्वयं आर भीष्म आर कर्ण आर कृपा, युद्ध मे जितनिहार । अश्वत्थामा आर विकर्ण आर सोमदत्तक बेटा जयद्रथ ।
डर भेलनि जे कहीं बेसी नहि कहि देने होइयनि, तेँ दुर्योधन द्रोणक खुशामद कय रहल छथि, भीष्महु सँ पहिने द्रोणक जिकिर कयकेँ आ द्रोणक सार (कृपाचार्य) केँ “युद्ध मे जितनिहार” कहिकय, एहेन बात सब जे लोकक हृदय केँ छुबि सकैत अछि ।
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ॥
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥९॥
“आरो बहुते रास नायक सब छथि, जे लड़ाइ मे माहिर छथि, आर कतेको प्रकारक हथियार सब सँ लैस छथि, आर हमरा लेल अपन जान तक दय देबाक पकिया नेत बना चुकल छथि ।
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ॥
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥१०॥
“हमरा लोकनिक ई सेना, जेकर बचाव भीष्म द्वारा भेल अछि, तेकर गिनती करब असम्भव अछि, मुदा ओकरा लोकनिक सेना, जेकर बचाव भीम द्वारा भेल अछि, तेकर गिनती करब आसान अछि ।
पहिलुका भारतीय युद्ध सब मे, सेनाक कमान सम्हारनिहारक मुख्य आधार ओकर आस-पास एकटा रक्षक होइत छलैक, जेकर स्थिति सेहो कम महत्वपूर्ण नहि रहैक । एतय मुख्य रक्षक सभक नाम देल गेल अछि, मुख्य सेनापति सभक नहि ।
एहि श्लोक केँ अक्सर यैह मतलब निकालल जाइत अछि जे दुर्योधन अपन सेना केँ अपर्याप्त (नाकाबिल) आर दुश्मन केर सेना केँ पर्याप्त (काबिल) बुझैत छथि । मुदा ई बात सन्दर्भक हिसाब सँ सही नहि लगैत अछि ।
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ॥
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥११॥
“(आब) सेनाक टुकड़ी सब मे अपन उचित स्थान पर तैनात रहिकय केवल भीष्म केँ सहयोग करू ।”
चूँकि हम अहाँ सँ कोनो डेग केर उम्मीद नहि कय सकैत छी, तेँ वैह करू जे अहाँ सँ करबाक लेल कहल गेल अछि, एना लगैछ जे दुर्योधनक यैह इच्छा छन्हि ।
तस्य संजनयन्हर्ष कुरुवृद्धः पितामहः ॥
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्ख दध्मौ प्रतापवान् ॥१२॥
कौरव पक्ष मे सब सँ बेसी ताकतवर, सब सँ बेसी बूढ़ (उमेरगर), भीष्म पितामह दुर्योधन केँ उत्साहित (खुश) करबाक लेल आब खुब जोर सँ सिंह-दहाड़ लगौलनि तथा अपन शंख बजौलनि ।
सभक नजरि दुर्योधन पर टिक गेल छल आ भीष्मक तेज समझ ओकर डर केँ चिन्हि लेलक; आर चूँकि द्रोण दुर्योधनक बात पर ध्यान नहि देलनि, कियैक तँ ओ अपन पोता केँ जनैत रहथि, तेँ हुनका ई बुझय मे कनिकबो दिक्कत नहि भेलनि जे दुर्योधन अपन गुरु सँ एहि तरहक कार्य कएने छलथि जाहि सँ द्रोण मे जोश नहि बल्कि हतोत्साह उत्पन्न भ’ गेल छलन्हि । पितामह केर हृदय मे दया भरि गेलनि आर तेँ ओ उपर देल गेल श्लोक मे वर्णित क्रिया केँ कयलनि । एतय ई ध्यान देबाक चाही जे ई एकटा चुनौती वला काज छल, जे वास्तव मे युद्ध केँ शुरुआत कयलक । आर ई फेरो कौरवहि सभक दिश सँ भेल जे हमलावरक पक्ष लेलक ।
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ॥
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥१३॥
पुनः भीष्मक पाछाँ-पाछाँ कौरव लोकनिक दिश सँ अचानक शंख, ढोल, नगाड़ा, तुरहि आर गायक सींग सब बाजय लागल, आर ओकर शोर (आवाज) बहुते बेसी छलैक ।
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ॥
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥१४॥
पुनः, माधव व पांडव, जे उज्जर घोड़ा सब सँ जुड़ल अपन शानदार रथ पर बैसल रहथि, ओहो लोकनि जोरदार आवाजक संग अपन दिव्य शंख बजौलनि ।
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ॥
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्ख भीमकर्मा वृकोदरः ॥१५॥
हृषिकेश पांचजन्य, धनंजय, देवदत्त आर भयानक कर्म करयवला वृकोदर अपन विशाल शंख पौंड्र बजौलनि ।
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥१६॥
कुन्तीक पुत्र राजा युधिष्ठिर अनन्तविजय नामक शंख बजौलनि, आर नकुल ओ सहदेव अपन सुघोष ओ मणिपुष्पक नामक शंख बजौलनि ।
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ॥
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥१७॥
कुशल धनुर्धर, काशीक राजा, आ महान योद्धा शिखंडी, धृष्टद्युम्न, आर विराट, आर अजेय सात्यकि;
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ॥
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक् पृथक् ॥१८॥
हे पृथ्वीक स्वामी ! द्रुपद, द्रौपदीक पुत्र लोकनि आर सुभद्राक महाबाहु पुत्र, सब गोटे अपन-अपन शंख बजौलनि ।
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ॥
नभश्च पृथिवीञ्चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन् ॥१९॥
आर आसमान व धरती मे गूंजयवला भयानक शोर धृतराष्ट्रक सेना लोकनिक हृदय केँ विदीर्ण कय देलक ।
श्लोक १४-१९ पांडव सेनाक बेहतर हेबाक आ परिणामस्वरूप धृतराष्ट्र सेनाक पक्का हारि हेबाक बारे मे संकेत सँ भरल अछि । संजय वृद्ध राजाक ध्यान सब सँ पहिने जिनका सभक दिश भीष्म केर चुनौती केँ स्वीकार करैत दियाओल गेल अछि, से सबटा सौभाग्यक देवता आर पांडव – पांडू राजकुमार लोकनिक सर्वश्रेष्ठ रूप मे हुनका द्वारा वर्णन कयल गेल अछि । ओहि विवरण सब पर ध्यान दियौक जाहि मे पांडव सेनाक रथ, घोड़ा आ शंख सभक बारे मे कहल गेल अछि; आर अन्ततोगत्वा, जखन कि कौरवक सेना पांडवक सेना सँ एक तिहाइयो सँ बेसी संख्या मे छल, मुदा कौरव सभक शोर टा बहुत अधिक छल, जखन कि पांडवक शोर नहि केवल बहुत अधिक छल बल्कि ओहि सँ धरती आ आसमान गुंजित भ’ उठल छल आर जे कौरव सभक हृदय केँ विदीर्ण कय देलक ।
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ॥
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ॥१-२०॥
पुनः, हे पृथ्वीपति, धृतराष्ट्रक सेना केँ युद्ध लेल ठाढ़ आर निशाना लगेनाय शुरू होयबला (स्थिति) देखिकय, पांडव, जिनकर (रथ उपर लागल) झंडा मे वानरक निशानी छल, ओ अपन धनुष उठाकय कृष्ण सँ ई शब्द कहलनिः
अर्जुन मे आयल अचानक परिवर्तनक भाव केँ देखैत, हमरा सब केँ एहि श्लोक मे इहो ध्यान देबाक चाही जे युद्धक भावना हुनका मे कतेक भरल छल ।
अर्जुन उवाच ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥२१॥
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ॥
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ॥२२॥
अर्जुन कहलनि:
हे अच्युत ! हमर रथ दुनू सेनाक मध्य मे ठाढ़ करू जाहि सँ हम ओहि लोक सब केँ देखि सकी जे सब एतय युद्धक लेल तैयार ठाढ़ अछि । एहि युद्धक पूर्व-सन्ध्या मे (हमरा देखबाक/जनबाक अछि) जे हमरा केकरा संग लड़बाक अछि ।
संजय उवाच ।
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ॥
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥२३॥
संजय कहलनि:
हे भरत, गुडाकेश केर कहलापर, हृषीकेश ओहि सबसँ पैघ रथ केँ दुनू सेना सभक बीच एकटा स्थान पर ल’ जाकय ठाढ़ कयलनि, जेतय भीष्म, द्रोण आ धरतीक सबटा राजा मौजूद रहथि, आर फेर ओ कहलनि, “हे पार्थ, देखू, सब कौरव एक संग एकत्रित भ’ गेल अछि !”
तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄनथ पितामहान् ॥
आचार्यान् मातुलान् भ्रातॄन् पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा ॥
श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ॥२६॥
फेर पार्थ ओहिठाम तैनात दुनू सेना मे, दादा, ससुर, चाचा, भाइ, चचेरा-फुफेरा-ममेरा भाइ सब, हुनकर अपन आ आर लोकक बेटा-पोता, संगी, गुरुजन एवं आरो मित्र सब केँ देखलनि ।
तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ॥२७॥
फेर कुन्तीपुत्र ओहि समस्त सम्बन्धी लोकनि केँ अपन-अपन ओहदा मे तैनात देखिकय, गहींर दयालुता सँ भरिकय, दुःखी भ’ कय एना कहलनि ।
अर्जुन उवाच ।
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ॥२८॥
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥
गाण्डीवं संसते हस्तात्त्वक् चैव परिदह्यते ॥२९॥
अर्जुन कहलनि:
हे कृष्ण, एतय एकत्रित भेल हमर एहि सम्बन्धी लोकनि केँ लड़ाइ लेल उत्सुक देखिकय, हमर हाथ-पैर काज कयनाय छोड़ि रहल अछि, आर हमर मुँह सुखा गेल अछि । हमर पूरा शरीर काँपि रहल अछि, आर रोइयाँ सेहो ठाढ़ भ’ गेल अछि । गांडीव धनुष हमरा हाथ सँ छुटैत (फिसलैत) अछि, आर हमर त्वचा सब मे जलन भ’ रहल अछि ।
करुणा हुनका उपर काबू पाबि गेल । एहेन नहि जे ई समझदारी केर कारण सँ भेल, बल्कि एकर कमीक कारण सँ भेल । ओ अपना उपर नियंत्रण हरा लेलनि – अज्ञानताक खद्धा मे पहिल डेग कहू ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ॥३०॥
हे केशव, नहिये हम सीधा ठाढ़े रहि सकैत छी । हमर माथा घुमि रहल अछि । आर हमरा खराब शकुन सब देखा रहल अछि ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥
न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ॥३१॥
हे कृष्ण, नहिये हमरा युद्ध मे एहि अपनहि लोक सब केँ मारय मे कोनो फायदा देखाइत अछि । हमरा नहिये जीत चाही, न राज चाही, आ न खुशिये चाही ।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥
येषामर्थे कांक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ॥३२॥
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ॥३३॥
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबन्धिनस्तथा ॥३४॥
हे गोविन्द ! जँ ई लोकनि, जिनका वास्ते ई सब इच्छित अछि जे राज्य, आनन्द आर सुख हमर हेबाक चाही, अपन गुरु, चाचा, बेटा, दादा, मामा, ससुर, पोता, साला, आर आनो सम्बन्धी लोकनि; अगर ई सब लोक अपन जान (जीवन) आ धन (सम्पत्ति) केँ छोड़िकय एतय युद्ध मे ठाढ़ छथि – तखन एहेन राज्य हमर कोन काज मे आओत, एहेन सुख या फेर जीवने सँ हमरा कि भेटत ।
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ॥
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ ३५॥
हे मधु केँ वध करयवला (मधुसूदन) ! यद्यपि ई सब हमरा मारहे वास्ते कियैक न होइथ, तैयो हम हिनका सब केँ मारय लेल चाहियो तक नहि सकैत छी – तीनू लोक पर राज्य करबाक लेल सेहो नहि, फेर पृथ्वीक लेल त आर कतेक कम (मारय चाहब) !
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ॥
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानात तायिनः ॥३६॥
हे जनार्दन, धृतराष्ट्रक एहि बेटा सब केँ मारय सँ हमरा कि खुशी भेटि सकैत अछि ? एहि अपराधी (आततायी) सब केँ मारय सँ हमरा खाली पापे टा लागि सकैत अछि ।
अपराधी: आततायी, ओ जे केकरहु घर मे आगि लगबैत अछि, (केकरहु) जहर खुअबैत अछि, (केकरो उपर) तलवार सँ आक्रमण करैत अछि, कोनो दोसर व्यक्तिक धन, जमीन आर पत्नी चोरबैत अछि । दुर्योधन ई सब किछु पांडव भाइ सभक संग कएने छल । अर्थशास्त्र केर अनुसार, आततायी केँ मारय सँ कोनो पाप नहि लगैछ, भले ओ वेदान्तक पूरा जानकारे कियैक न हो । लेकिन अर्जुन ई तर्क दैत एना लगैत छथि, “सच छैक, धृतराष्ट्रक बेटा सब केँ मारय सँ अपन कोनो निकट-सम्बन्धी केँ मारबाक खास पाप नहि लागत, कियैक तँ ओ सब आततायी अछि, मुदा तखन हत्याक सामान्य पाप तँ हमरा लागिये टा जायत, कियैक तँ धर्म-शास्त्र, जे अर्थ-शास्त्र सँ बेसी भरोसावला (विश्वसनीय) अछि, से हत्या नहि करबाक आज्ञा दैत अछि ।”
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् ॥
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥३७॥
तेँ हमरा अपन सम्बन्धी सब केँ, धृतराष्ट्रक बेटा सब केँ नहि मारबाक चाही । हे माधव, अपनहिं सम्बन्धी सब केँ मारिकय हमरा खुशी केना भेटि सकैत अछि ?
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ॥
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥३८॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निर्वाततुम् ॥
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥३९॥
जखन कि ई सब, लालच सँ दबि गेल समझ केर संग, कुल मे क्षय (परिवारक टुटला) सँ होयवला खराबी केँ नहि देखैछ, आर मित्र सभक संग दुश्मनी मे कोनो पाप नहि देखैछ, तखन हे जनार्दन, हम जे कुलक्षय सँ होयवला खराबी केँ साफ-साफ देखैत छी, एहि पाप सँ कियैक न मुंह फेड़ी ?
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ॥
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥
कुल मे क्षय भेलापर ओहि कुल (परिवार) केर पुरान धार्मिक रीति-रेबाज खत्म भ’ जाइत छैक । आध्यात्मिकता (धर्म) केर खत्म भेला पर, पूरा कुल (परिवार) पर अधर्म हावी भ’ जाइत छैक ।
अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ॥
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥४१॥
हे कृष्ण, अधर्म केर बढ़ि गेलापर घरक स्त्री बिगैड़ जाइत अछि; आर स्त्री सभक बिगैड़ गेलापर, हे वार्ष्णेय, जाति मे मिश्रण भ’ जाइत अछि । (वर्णसङ्करक उत्पत्ति भ’ जाइत अछि ।)
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ॥
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥४२॥
कुल केर सम्मिश्रण, सच मे, कुलक वास्ते नरक आर कुल केँ नाश करयवला होइछ; ओहेन लोकक पुरखा चाउरक पिण्ड आ जल (पानि) केर प्रसाद तक सँ वंचित रहि जाइत छथि ।
सच में, कुल (परिवार) केर उलझन कुल (परिवार) केँ खत्म करयवलाक नरक छी । (कियैक तँ तखन) ओकर अपन पुरखा सब खसि पड़ैत छथि, वंचित रहि जाइत छथि, आदि । ई हिन्दू लोकनिक जानल-मानल श्राद्ध समारोहक बारे मे अछि, जेकर मुख्य सिद्धान्त मृत भेल सम्बन्धी संग-संग पितृ-लोक (मृत्युक तुरन्त बादक एकटा अस्थायी निवास) मे रहयवला सब पितरक लेल सहयोग केर विचार पठायब अछि, संगहि (विचार सब केँ आर बेसी प्रभावी बनेबाक लेल) ठोस प्रसाद (दानादि) सेहो देनाय अछि । गरीब सब केँ सेहो ओकर नीक-निकुत खेबाक इच्छा सब केँ पूरा करबाक लेल खाना खुआयल जाइत अछि ।
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ॥
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥४३॥
कुल केँ तोड़यवलाक एहि गलत काज सब सँ, जाति मे गड़बड़ी पैदा कयकेँ (वर्णसङ्करक उत्पत्ति भेला सँ), जाति ओ कुल केर पुरान धार्मिक रीति-रेबाज नष्ट भ’ जाइछ ।
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ॥
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥४४॥
हे जनार्दन, हम सुनलहुँ अछि जे जाहि लोकक कुल (परिवार) मे धार्मिक रीति-रेबाज नष्ट भ’ गेल अछि, ओकरा लेल नरक मे रहनाय तय (अनिवार्य) छैक ।
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ॥
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ ४५ ॥
अहो! हम बड पैघ पाप मे शामिल भ’ गेलहुँ अछि, कियैक तँ हम राज्यक सुख केर लालच मे अपनहि सम्बन्धी सब केँ मारबाक लेल तैयार भ’ गेल छी ।
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ॥
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥ ४६ ॥
सच मे, अगर धृतराष्ट्रक बेटा, हाथ मे हथियार लय केँ, युद्ध मे बिना विरोध कएने आर बिना हथियार केँ हमरा मारि दिअए, त ई हमरा लेल नीक होयत ।
सञ्जय उवाच ।
एवमुक्त्त्वाऽर्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ॥
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ ४७ ॥
संजय कहलनि:
युद्ध केर मैदान मे एना कहिकय, अर्जुन अपन धनुष-बाण फेकिकय, दुःख सँ व्याकुल भ’ कय, अपन रथ केर स्थान पर बैसि गेलाह ।
इति अर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः
हरिः हरः!!
