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श्रीमद्भागवद्गीता सप्तम अध्याय

5 भ्यूज

ॐ श्री परमात्मने नमः!!

॥सप्तमोऽध्यायः॥

श्री भगवानुवाच ।

मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ॥
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥७-१॥

भगवान कहलनि:

हे पृथापुत्र, हमरा मे मन लगाकय, हमर शरण मे आबिकय, आर योग केर अभ्यास कयकेँ, अहाँ बिना कोनो सन्देह केँ हमरा कोन प्रकार सँ पूरापूरी जानि लेब, आब अहाँ से सुनू । 

पूरापूरी: यानि, अनन्त महानता, ताकत, शक्ति, कृपा एवं दोसर अनन्त गुण सब सँ युक्त (भगवान् केर स्वरूप केँ पूर्ण रूप सँ जनबाक अभिप्राय अछि) ।

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ॥
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥७-२॥

हम अहाँ केँ ज्ञान, आनुमानिक (अनुभवात्मक) एवं व्यवहारिक, सब किछु पूरापूरी कहब, जे जानि लेलाक बाद बाकी किछु जानय लेल नहि बचि जाइत अछि । 

हमर नोट: हमरा सभक लेल अर्जुन बननाय आर श्री कृष्ण केर हरेक बात पर अमल कयनाय बहुत जरूरी अछि ।

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ॥
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥७-३॥

शायद हजारों लोक मे सँ कियो एक गोटे, पूर्णता (ईश्वर केँ पूर्ण रूप सँ जनबाक) लेल प्रयत्न करैत अछि; आर शायद, एहेन धन्य (आशीर्वादित) लोक सब मे सँ कियो एक गोटे, एहि तरहें प्रयत्न करैत, हमरा वास्तव मे जनैत अछि ।

धन्य: सिद्धानम् – एहि शब्द केर मतलब अछि सिद्ध लोक – लेकिन एहिठाम एकर मतलब मात्र ओहेन लोक अछि जे पैछला जन्म मे नीक कर्म कयकेँ, एहि जीवन मे स्वतंत्रता (मुक्ति, मोक्ष) केर वास्ते प्रयत्न कयलक अछि ।

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ॥
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥७-४॥

भूमि (धरा, क्षिति), अप (पानि, जल), अनल (आगि), वायु (हवा), ख (इथर), मन, बुद्धि आर अहंकार: एहि तरहें हमर प्रकृति आठ भाग मे बँटल अछि ।

द्रव्य (मैटर) केँ पाँच तत्त्व (एलिमेंट) मे बाँटल जेबाक कारण आधुनिक विज्ञान (मॉडर्न साइंस) केर सोच सँ काफी अलग अछि । मनुष्यक पास मात्र पाँच टा ज्ञानेन्द्रिय (सेंसेज) छैक, मात्र पाँच तरीका छैक जाहि सँ ओ द्रव्य (मैटर) सँ प्रभावित भ’ सकैत अछि; ताहि लेल द्रव्य केर बारे मे ओकर समझ केँ आर (आगाँ धरि) नहि बाँटल जा सकैछ । पाँच तत्त्व दुइ प्रकार केर होइत अछि, सूक्ष्म आ स्थूल । कहल जाइत छैक जे स्थूल अवस्था एकटा सूक्ष्म तत्त्वक आधा हिस्सा लय केँ, बाकी हर एक केर १/८ हिस्सा ओहि मे मिलाकय बनैत अछि: जेना, स्थूल आकाश = १/२ सूक्ष्म आकाश + १/८ सूक्ष्म वायु + १/८ सूक्ष्म तेजस + १/८ सूक्ष्म अप + १/८ सूक्ष्म भूमि । फेर, आधुनिक विज्ञान केर ईथर, हवा, अग्नि, पानि आर भूमि हिन्दू दर्शन (फिलॉसफी) केर पाँच तत्त्व केर उत्तर नहि दैछ । आकाश मात्र आवाज पैदा करयवाली कारक (एजेंसी, अभिकर्ता) थिक । आकाश सँ वायु निकलैत अछि, जाहि मे आवाज आ छूबय केर गुण (स्पृश्यता) होएत छैक । वायु सँ तेजस (अग्नि) निकलैत अछि, जाहि मे देखेबाक गुण (दृश्यता) होएत छैक, संगहि अपना सँ पहिलुका तत्त्व सभक गुण सेहो होएत छैक । तेजस सँ अप् निकलैत छैक, जे उपर कहल गेल गुण सभक संग अपन विशेष गुण (खासियत) – स्वाद (रस) – केँ मिलबैत अछि । अप् सँ भूमि बनैत अछि, जे अपना विरासत मे गन्ध केर अतिरिक्त गुण अनैत अछि ।

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ॥
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥७-५॥

ई (हमर) नीचाँ केर (प्रकृति) छी । मुदा एहि सँ अलग, हे महाबाहु, हमर उपर केर प्रकृति केँ जानू – आत्म-चेतना केर सिद्धान्त, जाहि सँ ई ब्रह्माण्ड बनल अछि ।

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ॥
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥७-६॥

जानि लिय’ जे यैह (दुनू प्रकृति) समस्त प्राणी सभक गर्भ थिक; हमहीं पूरे ब्रह्माण्ड केर आरम्भ (मूल) आर अंत (विनाश, विलय) छी ।

हमहीं आरम्भ छी, आदि: हमरहि टा सँ पूरा ब्रह्माण्ड शुरू आर खत्म होइत अछि, जेना सब किछु हमरहि प्रकृति सँ निकलैत अछि ।

मतः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ॥
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥७-७॥

हमरा सँ हंटिकय, हे धनंजय, किछुओ नहि अछि । ई सब हमरहि मे धागा मे मणि सभक पाँति जेकाँ गाँथल अछि । 

हमरा सँ हंटिकय: हमरा अलावा ब्रह्माण्ड केर कोनो आन कारण नहि अछि ।

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभाऽस्मि शशिसूर्ययोः ॥
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥७-८॥

हे कुंतीपुत्र, हम पानि मे स्वाद छी; हम चाँद आर सूरज मे चमक छी; हम सब वेद मे ॐ (प्रणव अक्षर), आकाश मे आवाज आर मर्द (मनुष्य) मे मर्दानगी हमहीं छी ।

ई सब हमर सार रूप मे बुनल गेल अछि, हमर (प्रकट) रूप हेबाक नाते ।

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ॥
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥७-९॥

हम धरती मे सुन्दर सुगन्ध छी, आर आगि मे तेज (चमक) छी; सब प्राणी मे जीवन छी, आर तपस्वी लोकनि मे तपस्या छी ।

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ॥
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥७-१०॥

हे पृथापुत्र, हमरा समस्त प्राणी सभक सनातन बीज जानू । हम बुद्धिमान सभक बुद्धि आर वीर सभक वीरता छी ।

बलं बलवतामस्मि कामरागविवर्जितम् ॥
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥७-११॥

बलवान सब मे हम ओ बल छी जाहि मे कोनो इच्छा तथा आसक्ति नहि होइत अछि । हे भरतर्षभ (भरतवंश के बलशाली अर्षभ अर्थात् साँढ़), हम जीव सब मे ओ इच्छा छी जे धर्म केर विरुद्ध नहि होइछ ।

इच्छा: काम – ताहि चीज सभक प्यास जे इंद्रिय सभक सोझाँ नहि होइछ ।

आसक्ति: राग – ताहि चीज सभक लेल जे इंद्रिय सभक सोझाँ होइछ ।

धर्मक विरुद्ध नहि: ओहेन इच्छा जे जीवन केर तय काज (कर्तव्य) केर संग तालमेल बैसाकय चलैत अछि ।

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ॥
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥७-१२॥

आर जेहो सत्व, रजस आर तमस सँ जुड़ल अवस्था सब अछि, तेकरा केवल हमरहि सँ आयल जानू; तैयो हम ओहि मे नहि छी, लेकिन ओ सब हमरा मे अछि । 

सब चीज हुनका मे अछि, तैयो ओ ओहि सब मे नहि छथि । तार्किक रूप सँ, ई केवल भ्रान्ति (भ्रम, माया, ईल्यूजन) केर मार्फत आरोपित (उपर चढ़ायल गेल आवरण जेकाँ – सुपरइम्पोज़िशन) मे टा भ’ सकैत अछि; जेना कोनो भूत केँ गाछक ठूंठ मे देखल जाइत अछि; अन्हार मे रहयवला आदमीक नजरिया सँ भूत ठूंठ मे रहैत अछि, मुदा ठूंठ कखनहुँ भूत मे नहि रहैछ । तहिना ई ब्रह्माण्ड (यूनिवर्स) भगवान पर आरोपित (सुपरइम्पोज़्ड) अछि, मायाक जरिए हुनकर स्थान पर देखल जाइत अछि, लेकिन ओ ओहिमे नहि छथि । भगवान श्रीकृष्ण चैप्टर IX, ४, ५ मे एहि शिक्षा (उपदेश) पर वापस अबैत छथि ।

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ॥
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥७-१३॥

एहि अवस्था सब सँ, तीनू (प्रकृति केर) गुण सभक बदलाव सब सँ मोहित (भ्रमित) भ’ कय, ई सम्पूर्ण दुनिया हमरा नहि जनैत अछि, जे एहि सँ नितान्त दूर (परे) छी आ जेकरा बदलल नहि जा सकैत अछि । 

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ॥
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥७-१४॥

वास्तव मे गुण सब सँ बनल हमर यैह दैविक (दिव्य) माया केँ पार करब कठिन अछि; जे लोक स्वयं केँ केवल हमरा प्रति समर्पित करैत अछि, ओ एहि भ्रम सँ पार भ’ जाइत अछि ।

दैविक (दिव्य): मानवीय धारणा सँ अलग भ’ कय (नितान्त हंटिकय, परे) ।

भक्त … केवल: समस्त औपचारिक धर्म केँ पूरापूरी त्यागिकय हमरा मे, अपन स्वयं केर स्वरूप मे, माया केर भगवान मे शरण लियए ।

न मां दुष्कृतिनो मूढ़ाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ॥
माययाऽपहृज्ञानां आसुरं भावमाश्रिताः ॥७-१५॥

ओ लोक स्वयं केँ हमरा दिश नहि लगबैत अछि – जे खराब काज करयवला अछि, मोह-माया सँ भ्रमित लोक अछि, सब सँ नीच लोक अछि, माया केर कारण (सही) समझ (बुझय) सँ दूर अछि, आर जे असुर लोकनिक बाट पर चलयवला लोक अछि । 

असुर लोकनिक बाट: यानि, क्रूरता, झूठ, आर एहि तरहक आर काज सब ।

चतुर्विधा भजन्ते मां नाः सुकृतिनोऽर्जुन ॥
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥१६॥

हे अर्जुन, चारि प्रकारक पुण्यात्मा पुरुष हमर पूजा करैत अछि – दुःखी (आर्त), ज्ञान चाहयवला (जिज्ञासु), भोग चाहयवला (अर्थार्थी) आर बुद्धिमान (ज्ञानी), हे भरतवंशी मे सर्वथा वीरपुरुष (अर्षभ – साँढ़ समान अर्जुन) ।

भोग चाहयवला (अर्थार्थी): जे एतय (एहि संसार मे) आर एकर बाद (अन्य संसार मे) भोग (आनन्द केर) वस्तु सभक इच्छा रखैत अछि ।

बुद्धिमान (ज्ञानी): जे सब इच्छा सब केँ माया सँ उत्पन्न भेल जानिकय त्यागि दैत अछि ।

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ॥
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥७-१७॥

ओहि मे सँ, बुद्धिमान लोक (ज्ञानीजन), जे हमेशा एक केर प्रति दृढ़, आ भक्ति सँ (भरल) रहैत अछि, से श्रेष्ठ अछि; कियैक तँ हम बुद्धिमान (ज्ञानी) केँ बहुते प्रिय छी, आर ओ हमरा प्रिय अछि ।

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ॥
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥७-१८॥

ओना ओ सब गोटे महान अछि, मुदा बुद्धिमान (ज्ञानी) लोक केँ हम अपनहि स्वरूप मानैत छी; कियैक तँ दृढ़ स्थिर (निश्चल) मन सँ,  ओ मात्र हमरहि टा मे, सर्वोच्च लक्ष्य केर रूप मे, स्थित रहैत अछि ।

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ॥
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥७-१९॥

कतेको जन्मक अन्त मे, बुद्धिमान (ज्ञानी) लोक ई जानिकय हमर शरण लैत अछि जे ई सबटा वासुदेव (अंतरतम आत्मा मे) अछि । ओ महान आत्मा अत्यन्त दुर्लभ होइछ ।

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ॥
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥७-२०॥

फेर, किछु लोक, एहि या ओहि इच्छा केर कारण सँ विवेक हेराकय, एहि या ओहि विधि (रस्म, रिबाज) केँ मानैत, अपन स्वभाव केर अनुसार दोसर देवता सब केँ समर्पित भ’ जाइत अछि ।

अपन स्वभाव: अपन पैछला जन्म सब मे भेटल संस्कार सब सँ बनल रहैत अछि ।

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयाऽर्चितुमिच्छति ॥
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥७-२१॥

कोनो भक्त श्रद्धा सँ जाहि कोनो रूप मे पूजा करय चाहैत अछि – ओकर वैह श्रद्धा केँ हम अटल बनबैत छी ।

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ॥
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥७-२२॥

वैह श्रद्धा सँ युक्त भ’ कय, ओ ओकर पूजा मे संलग्न होइत अछि, आर ओकरा सँ अपन इच्छा सब केँ प्राप्त करैत अछि – ई वास्तव मे केवल हमरहि द्वारा टा प्रदान कयल जाइत अछि ।

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ॥
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥७-२३॥

मुदा एहि कम समझ वला लोक केँ (भेटयवला) फल सीमित होइछ । देवता लोकनिक पूजा करयवला देवता लोकनि लग पहुँचैत अछि; हमर भक्त सेहो हमरहि लग अबैत अछि ।

ई कम समझ वला लोक: भले मेहनतक मात्रा (दुनू तरहक पूजा मे) एक जेकाँ छैक, ई लोक सब हमर शरण मे नहि अबैछ, जाहि सँ ओकरा अनन्त फल भेटि सकैत छैक ।

हमर समस्त सन्ततिवर्ग लेल हमर नोट: एक-दोसर सँ जुड़ल हरेक श्लोक केर बहुत खास ध्यान राखब । ई अध्याय VII हमरा सब केँ भगवानक भक्त बनबाक सही तरीका सिखबैत अछि ।

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ॥
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमुत्तमम् ॥७-२४॥

मूर्ख लोक हमरा, अव्यक्त केँ, व्यक्त मानैत अछि, हमर सर्वोच्च स्थिति – अपरिवर्तनीय आर पारलौकिक, केँ नहि जनैत अछि ।

अज्ञानी हमरा एकटा साधारण नश्वर व्यक्ति केर रूप मे लैत अछि, जे आन सब मनुष्य सब जेकाँ अव्यक्त अवस्था सँ व्यक्त अवस्था मे अवतार लैत अछि, जे कि पैछला कर्म सभक बल सँ प्रेरित रहैत छैक । ई हमर वास्तविक स्वरूप केर प्रति ओकर अज्ञानताक कारण छैक; तेँ ओ हमर, जे कि बिना कोनो आर दोसर केँ केवल एक छी, पूजा नहि करैत अछि ।

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ॥
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥७-२५॥

गुण सभक मेल सँ उत्पन्न भेल भ्रम मे, हम सभक सामने नहि देखाइत छी (व्यक्त नहि होइत छी) । ई भ्रमित संसार हमरा नहि जनैत अछि – जे अजन्मा छी, अटल छी ।

ई योग-माया भगवान पर पसरल छन्हि, जे दोसर केँ हुनका चिन्ह पेबाक समझशक्ति केँ झाँपि दैत छैक, ई हुनकर (भगवानक) अपन ज्ञान केँ नहि धुन्धला करैछ, कियैक तँ ई (योगमाया) हुनकहि थिकन्हि, आर वैह एकर मालिक छथि – ठीक ओहिना जेना कोनो जादूगर (मायावी) केर कारण सँ होयवला चमत्कारिक आकर्षण (माया) ओकर अपन ज्ञान (वास्तविक बात बुझय) मे बाधा नहि दैत छैक । ई भ्रम जे दोसर केँ बाँधैत अछि, से भगवानक नजरि केँ धुंधला नहि कय सकैछ । 

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ॥
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥७-२६॥

हे अर्जुन! हम भूत, वर्तमान आ भविष्य केर समस्त सत्ता सब केँ जनैत छी, मुदा हमरा कियो नहि जनैत अछि ।

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ॥
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥७-२७॥

हे भरतवंशी, इच्छा आ द्वेष सँ जन्म लयवला विपरीत गुण सभक भ्रम सँ, समस्त प्राणी जन्महि सँ भ्रम मे पड़ि जाइत अछि, हे शत्रु सब केँ जरबयवला (अर्जुन) । 

जेकर मन इच्छा व द्वेष केर जुनून सँ जन्म लयवला दोहरा भ्रम मे रहैत छैक, ओकरा चीज सभक, एतय धरि जे बाहरी संसारक सेहो, जेहेन जे चीज सब रहैत छैक, तेकर ज्ञान नहि भ’ सकैत छैक; एहेन बुद्धि लेल अन्तरतम आत्माक दिव्य ज्ञान केँ त आरो कमे टा बुझि सकैत अछि । 

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ॥
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥७-२८॥

जे बढियाँ कर्म करयवला लोक अछि, जेकर पाप खत्म भ’ गेल छैक – ओ विपरीत गुण सभक भ्रम सँ मुक्त भ’ कय, दृढ़ इच्छा (पक्का इरादा) सँ हमर पूजा करैत अछि । 

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ॥
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥७-२९॥

जे लोक बुढ़ापा आ मृत्यु सँ छुटकारा (स्वतंत्रता) वास्ते, हमर शरण मे आबिकय, पूरा यत्न (कोशिश) करैत अछि – ओ ब्रह्म केँ, पूरे अध्यात्म केँ आ कर्म केँ पूरापूरी जनैत अछि । 

(ओ लोक) पूरा अध्यात्म केँ जनैत अछि: ओ अपना भीतर मे छुपल सत्य (सच्चाइ) केँ पूरापूरी अनुभव करैत अछि । 

साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ॥
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥७-३०॥

जे लोक हमरा अधिभूत, अधिदैव आर अधियज्ञ केर रूप मे जनैत अछि, ओ मृत्यु केर समय सेहो मन मे दृढ़ रहैत हमरा जानैत रहैत अछि ।

हमर चेतना हमेशा जेकाँ बनल रहैत छैक, आबयवाली मृत्युक बदलाव सँ अप्रभावित रहिकय । 

इति ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥

The end of the seventh chapter, designated, The Way of Knowledge with Realisation. 

हरिः हरः!!

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