संस्कृति-सभ्यता
(लेख-विचार)
– कुमुद मोहन झा, विराटनगर, नेपाल ।
रक्षा-बन्धन : एकटा धागामे बान्हल प्रेम, विश्वास आ उत्तरदायित्वक अनन्त कथा
श्रावण पूर्णिमाक पावन दिन । चारूकात वर्षाक हरियरी, आकाशमे बादलक उज्जर-श्याम छटा, माटिक सुगन्ध आ प्रकृतिक नवजीवन के मनोरम वातावरण बीच भारतवर्षक सांस्कृतिक चेतनामे एकटा एहेन पर्व अबैत अछि, जे केवल पूजा-पाठ अथवा परम्पराक निर्वाह नहि, बल्कि मानवीय सम्बन्धक कोमलतम भावना केँ पुनः जागृत करबाक अवसर प्रदान करैत अछि । ई उल्लासमय पर्व थिक “राखी” वा “रक्षा-बन्धन” ।
‘रक्षा’ अर्थात् संरक्षण आ ‘बन्धन’ अर्थात् प्रेमपूर्वक बान्हल सम्बन्ध । एहि दू शब्दक संयोगमे एहि पर्वक सम्पूर्ण दर्शन निहित अछि । राखीक छोटछिन धागा वास्तवमे धागा नहि, ई विश्वासक प्रतीक थिक, स्नेहक अभिव्यक्ति थिक, अपनत्वक घोषणा आ एक-दोसराक सुख-दुःखमे साथ देबाक मौन प्रतिज्ञा थिक ।
परम्परागत रूपमे बहिन भाइ केर कलाइमे राखी बाँधैत छथि, तिलक लगा आरती करैत छथि, मिठाइ खुआबैत छथि आ भाइ बहिनक रक्षा, सम्मान आ सहयोगक वचन दैत छथिन्ह । मुदा आधुनिक सामाजिक चेतनाक दृष्टिसँ रक्षा एकतरफा दायित्व नहि भ’ सकैत अछि । बहिनक रक्षा भाइ करत आ भाइकेर रक्षा बहिन – एहिसँ आगाँ बढ़ि दुनू एक-दोसराक सम्मान, सुरक्षा, मानसिक सम्बल आ जीवन-संघर्षमे साथ देथि – तखने रक्षा-बन्धनक मूल भाव पूर्ण होएत ।
पौराणिक महत्व
रक्षा-बन्धनक सम्बन्धमे भारतवर्षीय परम्परामे अनेक पौराणिक आख्यान प्रचलित अछि । एहि कथासभक ऐतिहासिक सत्यता एक समान नहि अछि, आ सब कथा एकहि ग्रन्थमे एकहि रूपमे उपलब्ध हो, सेहो आवश्यक नहि । मुदा एहि आख्यानसभमे निहित सांस्कृतिक सन्देश अत्यन्त महत्वपूर्ण अछि ।
भविष्य पुराणसँ सम्बद्ध एक प्रसिद्ध आख्यानमे इन्द्र आ इन्द्राणीकेँ राखी-सदृश रक्षा-सूत्रक परम्परासँ जोड़ल गेल अछि । युद्धमे जायसँ पूर्व इन्द्राणी इन्द्रक कलाईमे रक्षा-सूत्र बाँधैत छथि । एहि कथामे रक्षा-सूत्र केवल बाहरी सुरक्षा नहि, बल्कि आत्मविश्वास, मंगलकामना आ आध्यात्मिक संरक्षणक प्रतीक बनैत अछि ।
एक अन्य प्रसिद्ध परम्परामे दैत्य-गुरु शुक्राचार्य, राजा बलि आ माता लक्ष्मीक कथा अबैत अछि । भगवान विष्णु बलिक प्रति अपन वचनक कारण ओकर राज्यमे रहि गेलाह । लक्ष्मीजी बलिक घर पहुँचलीह आ रक्षा-सूत्र बाँधि बलिकेँ अपन भाइ के रूपमे स्वीकार कएलनि । एहि कथाक अन्तर्निहित संदेश अछि जे स्नेह रक्त-सम्बन्धक सीमासँ बहुत पैघ होइत अछि । सम्बन्ध प्रेम आ विश्वाससँ बनैत छैक ।
यम आ यमुनाक कथामे सेहो भाई-बहिनक स्नेह के मार्मिक चित्रण भेटैत अछि । यमुना अपन भाइ के स्वागत-सत्कार क’ स्नेहक बन्धन स्थापित करैत छथि । एहि आख्यानक मूल भाव अछि – प्रेम मृत्यु आ दूरीसँ सेहो पैघ सम्बन्ध स्थापित क’ सकैत अछि ।
लोकप्रिय लोकपरम्परामे कृष्ण आ द्रौपदीक कथा रक्षा-बन्धन केर भावनासँ जोड़ल जाइत अछि । एहि कथामे छोट सन उपकार, करुणा आ स्नेह भविष्यक सम्बन्धमे विशाल उत्तरदायित्वक रूप ल’ सकैत अछि – एहि मानवीय सत्यकेँ प्रतीकात्मक ढंगसँ देखाओल गेल अछि । हालांकि एहि कथाक वर्तमान लोकप्रिय रूपकेँ प्राचीन महाभारतक मूल पाठसँ सीधा ऐतिहासिक प्रमाण मानब उचित नहि होयत ।
अर्थात् पौराणिक कथासभ केँ अक्षरशः इतिहास मानबाक अपेक्षा यदि हम ओकर नैतिक आ सांस्कृतिक सन्देश बुझी, तँ रक्षा-बन्धनक दर्शन बेसी स्पष्ट भ’ जाइत अछि ।
पारिवारिक महत्व
परिवार मानव जीवनक पहिल विद्यालय थिक । बाल्यकालमे भाइ-बहिन एकहि आँगनमे खेलैत छथि, झगड़ैत छथि, एक-दोसराक वस्तु नुकबैत छथि, फेर क्षणभरिमे एक-दोसरासँ मिलि जाइत छथि । एहि छोट-छोट घटनासभक बीच प्रेम, त्याग, क्षमा, सहयोग आ साझेदारीक संस्कार विकसित होइत अछि । रक्षा-बन्धन एहि पुरान स्मृतिसभकेँ पुनः जीवित करबाक अवसर थिक । बहिनक हाथसँ बान्हल राखी भाइकेँ केवल ई नहि कहैत अछि जे – अहाँ हमर रक्षा करब बल्कि ई सेहो कहैत अछि – “हमर जीवनमे अहाँक उपस्थिति हमरा लेल मूल्यवान अछि, अहाँक सुख हमर सुख थिक, आ अहाँक दुःखमे सेहो हम सहभागी छी ।”
एहि कारणेँ रक्षा-बन्धनक वास्तविक अर्थ केवल उपहार देब-लेब नहि, बल्कि परिवारमे भावनात्मक दूरी घटेनाइ थिक । आजुक व्यस्त जीवनमे परिवारक सदस्य अलग-अलग शहर, देश आ महाद्वीपमे रहैत छथि । एकहि परिवारक लोक कतेको सालधरि भेटि नहि पबैत छथि । एहन परिस्थितिमे राखी डाकसँ पठाओल जा सकैत अछि, वीडियो-कॉलपर राखी बाँधल जा सकैत अछि, आ डिजिटल माध्यमसँ शुभकामना पठाओल जा सकैत अछि । माध्यम बदलि गेल, मुदा भाव नहि बदलल । रक्त-सम्बन्धसँ उपर भावनात्मक सम्बन्ध होइत अछि ।
भावनात्मक महत्व
राखी देखितहिं बचपनक कतेको स्मृति आँखिक आगाँ आबि जाइत अछि – माय-बापक घर, बहिनक हँसी, भाइसँ भेल झगड़ा, एकहि थारीमे खेनाइ, परीक्षाक समयमे एक-दोसराकेँ सहयोग करब, आ जीवनक कठिन समयमे चुपचाप साथ देनाइ । एहि अर्थमे राखी स्मृतिक धागा सेहो थिक ।
कतेको बहिन अपन नैहरसँ दूर विवाहोपरान्त दोसर परिवारमे रहैत छथि । भाइ सेहो शिक्षा, रोजगार वा व्यवसायके कारण घरसँ दूर रहैत छथि । सालमे एक दिन एहन अबैत अछि, जखन दूरीक बावजूद सम्बन्धकेँ स्पर्शक अनुभूति भेटैत अछि । एहि कारणेँ राखीमे आर्थिक मूल्य कम आ भावनात्मक मूल्य अधिक अछि ।
महँग राखी, महँग उपहार वा भव्य आयोजन राखीक महत्व नहि बढ़बैत अछि । एकटा साधारण सूतके धागा सेहो अमूल्य भ’ सकैत अछि, जँ ओकरा बान्हयवाला हाथमे स्नेह आ ग्रहण कएनिहार हृदयमे अपनत्व हो ।
सामाजिक महत्व
रक्षा-बन्धनक परम्परा के एकटा व्यापक सामाजिक पक्ष सेहो अछि । सनातन संस्कृतिमे रक्षा-सूत्र केवल भाइ-बहिनक बीच सीमित नहि रहल । विभिन्न क्षेत्रमे गुरु, पुरोहित, मित्र, सामाजिक सहयोगी आ अन्य सम्बन्धमे सेहो रक्षा-सूत्र बाँधबाक परम्परा रहल अछि । एहि कारणेँ ‘रक्षा’क अर्थ क्रमशः व्यापक सामाजिक उत्तरदायित्वसँ जुड़ैत गेल ।
इतिहासमे रक्षा-बन्धनकेँ सामाजिक एकताक प्रतीक के रूपमे सेहो प्रयोग कएल गेल । 1905 मे बंगाल विभाजनक विरोध के समय रविन्द्रनाथ ठाकुर राखी-बन्धनकेँ हिन्दू-मुस्लिम एकता आ सामाजिक सद्भावक प्रतीक बनौलनि । लोक एक-दोसराक कलाईमे राखी बाँधि विभाजनक विरुद्ध एकताक सन्देश देलक ।एहि घटनासँ एकटा महत्वपूर्ण बात स्पष्ट होइत अछि जे रक्षा-बन्धन केवल “हमरा” आ “अहाँ”क पर्व नहि बल्कि ई “हमरा सभ”क पर्व बनि सकैत अछि ।
जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, आर्थिक स्थिति अथवा सामाजिक परिचय के भिन्नताक बावजूद यदि मनुष्य एक-दोसराक सुरक्षा, सम्मान आ अधिकारक लेल प्रतिबद्ध हो, तँ रक्षा-बन्धनक वास्तविक सामाजिक उद्देश्य पूरा होएत ।
वैज्ञानिक आ मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण
विज्ञान राखीकेँ अलौकिक शक्तिसम्पन्न धागा मानबाक पुष्टि नहि करैत अछि । राखी बाँधलासँ स्वतः रोग, दुर्घटना अथवा मृत्यु टलि जाएत – एहन दावाक वैज्ञानिक प्रमाण नहि अछि । मुदा एहि कारणेँ सुमेरु के महत्व समाप्त नहि भ’ जाइत अछि ।
विज्ञानक दृष्टिसँ मानवीय सम्बन्ध, भावनात्मक समर्थन, सामाजिक जुड़ाव आ सकारात्मक संवाद मानसिक कल्याण लेल महत्वपूर्ण होइत अछि । भाइ-बहिनक स्वस्थ सम्बन्ध बच्चासभमे सहानुभूति, संवाद, भावनात्मक नियन्त्रण आ संघर्ष समाधानक क्षमता विकसित करबाक अवसर द’ सकैत अछि । एहि दृष्टिसँ राखी बाँधबाक वास्तविक वैज्ञानिक मूल्य ओकर धागामे नहि, बल्कि ओकर केन्द्रमे निहित मानवीय व्यवहारमे अछि ।
जखन बहिन भाइकेँ कहैत छथि – “अहाँ स्वस्थ रहू, सुखी रहू”- तखन शुभकामनाक सकारात्मक भाव उत्पन्न होइत अछि । जखन भाइ कहैत छथि – “जखन आवश्यकता पड़त, हम अहाँक साथ रहब”- तखन भावनात्मक सुरक्षा उत्पन्न होइत अछि । जखन परिवार एकत्रित होइत अछि, हँसी-मजाक होइत अछि, पुरान स्मृति साझा होइत अछि, तँ सामाजिक जुड़ाव मजबूत होइत अछि । अर्थात् राखी शरीरक रक्षा करबाक जादुइ साधन नहि, बल्कि सम्बन्ध रक्षा करबाक मनोवैज्ञानिक माध्यम थिक ।
परम्परा
परम्परागत रक्षा-बन्धनमे बहिन स्नान क’ पूजा-थारी सजबैत छथि । थारीमे रोली अथवा कुमकुम, अक्षत, दीप, मिठाइ आ राखी राखल जाइत अछि । भाइकेँ तिलक लगा आरती कएल जाइत अछि, राखी बाँधि मिठाइ खुआओल जाइत अछि । बदला मे भाइ बहिनकेँ उपहार दैत छथि आ ओकर सम्मान तथा संरक्षणक वचन दैत छथि । एहि सम्पूर्ण विधिमे प्रतीकात्मक अर्थ नुकायल अछि ।
तिलक – मंगल आ सम्मानक प्रतीक। अक्षत – पूर्णता आ अखण्डताक प्रतीक । दीप – प्रकाश आ सकारात्मकताक प्रतीक । मिठाइ – सम्बन्धमे मधुरताक प्रतीक । राखी – प्रेम, विश्वास आ उत्तरदायित्वक प्रतीक । अर्थात् परम्पराक प्रत्येक तत्व केर एकटा सांस्कृतिक भाषा अछि ।
नेपालमे रक्षा-बन्धन : जनै पूर्णिमा
नेपालक सांस्कृतिक परिवेशमे श्रावण पूर्णिमाक विशेष महत्व अछि । अनेक समुदायमे एहि दिन जनै पूर्णिमा मनाओल जाइत अछि। गुरु-शिष्य परम्परा के निरन्तरता स्वरूप गुरुलोकनि अपन शिष्यसभकेॅ रक्षा-सूत्र प्रदान करैत जीवन के प्रत्येक क्षेत्रमे सुरक्षित रहि विजयी होएबाक आशीर्वाद दैत छथिन्ह । एहि प्रकारेँ नेपालक सन्दर्भमे रक्षा-बन्धन केवल एकटा सम्बन्धक मात्र नहि, बल्कि सनातन संस्कृति, धार्मिक, सांस्कृतिक आ पारिवारिक स्नेहक विविधताकेँ एकहि सूत्रमे जोड़ि अभिव्यक्त करएवाला पर्व थीक ।
वर्तमान अवस्था : परम्परा, परिवर्तन आ बाजारवाद
समय बदलैत अछि तँ पर्व के स्वरूप सेहो बदलैत छैक । आजुक रक्षा-बन्धनमे राखीक अनेक आधुनिक रूप उपलब्ध अछि – रेशम, मोती, चाँदी, धातु, कार्टून-चरित्र, डिजिटल डिजाइन, व्यक्तिगत नामवाला राखी आदि । ई परिवर्तन स्वाभाविक थिक । समस्या तखन शुरू होइत अछि, जखन भावनापर बाजार हावी भ’ जाइत अछि ।
राखीक मूल्य बढ़लासँ सम्बन्धक मूल्य नहि बढ़ैत अछि । महँग उपहार देलासँ प्रेमक गहराइ नहि नापल जा सकैत अछि । सोशल मीडियापर सुन्दर फोटो प्रकाशित कएलासँ सम्बन्ध मजबूत नहि होइत अछि ।
परम्पराक वैज्ञानिक पुनर्व्याख्या आवश्यक अछि । परम्परा आँखि मूँदि केँ स्वीकार करबाक वस्तु नहि, ओकरा समय केर आवश्यकतानुरूप समझिकय जीवित रखबाक आवश्यकता अछि । यदि कोनो परम्परा मानवता, प्रेम, अनुशासन, सद्भाव, परिवार आ सामाजिक उत्तरदायित्व बढ़बैत अछि, तँ ओकर संरक्षण होयबाक चाही । जँ कोनो रूढ़ि अन्धविश्वास, भेदभाव, आर्थिक प्रदर्शन अथवा सामाजिक दबाव पैदा करैत अछि, तँ ओहि पर पुनर्विचार आवश्यक अछि ।
रक्षा-बन्धनक सन्दर्भमे एकर वैज्ञानिक दृष्टिकोणक अर्थ स्पष्ट अछि – राखी बाँधू, मुदा अन्धविश्वास नहि । वचन दिऔ, मुदा केवल औपचारिकता नहि । उपहार दिऔ, मुदा प्रदर्शन लेल नहि । परम्परा निभाउ, मुदा मानवीयता बिसरि केँ नहि ।
नारीक सम्मान आ रक्षा-बन्धन
परम्परागत व्याख्यामे प्रायः ई कहल जाइत अछि जे भाइ बहिनक रक्षा करत । मुदा आधुनिक समाजमे एहि विचारकेँ व्यापक बनयबाक आवश्यकता अछि । नारी केवल “रक्षाक पात्र” नहि, ओ स्वयं सक्षम, आत्मनिर्भर आ निर्णय क्षमता युक्त छथि ।
अतः आजुक रक्षा-बन्धनक प्रतिज्ञा एहेन होएबाक चाही जे “हम अहाँक सम्मान, स्वतन्त्रता, अधिकार आ गरिमाक रक्षा करब।” आ एहि वचनक दायित्व केवल भाइपर नहि, बल्कि सम्पूर्ण समाजपर अछि । नारीक वास्तविक सुरक्षा राखीक धागासँ नहि, समान अवसर, शिक्षा, कानूनी अधिकार, सुरक्षित वातावरण आ सम्मानजनक व्यवहारसँ सुनिश्चित होइत अछि ।
हरित राखीक आवश्यकता
वर्तमान समयमे पर्वक पर्यावरणीय पक्षपर सेहो विचार आवश्यक अछि । प्लास्टिक, कृत्रिम रसायन, चमकीला धातु अथवा एकबेर प्रयोगक सामग्रीसँ बनल राखी अन्ततः कचरामे परिवर्तित होइत अछि । ताहि लेल प्राकृतिक सूत, कपड़ा, ऊन, कागज, बाँस अथवा अन्य पर्यावरण-अनुकूल सामग्रीसँ बनल राखीकेँ प्रोत्साहन देब उचित होयत । किएक तँ – जे पर्व रक्षा करबाक सन्देश दैत अछि, ओ पृथ्वीकेँ क्षति पहुँचबैत मनाओल जाए – ई स्वयं मे विरोधाभास थिक । यदि राखी “रक्षाक धागा” थीक तँ ओकरा प्रकृति-रक्षाक प्रतीक सेहो बनाओल जा सकैत अछि ।
रक्षा-बन्धनक वास्तविक अर्थ
समयक संग रक्षा-बन्धन केर अर्थक विस्तार होबाक चाही । पहिने प्रश्न छल — “ बहिनक रक्षा के करत ?” आब प्रश्न होएबाक चाही – “हम सभ एक-दोसराक रक्षा कोना करब ?” माता-पिताक रक्षा के करत ? वृद्धक सहारा के बनत ? असहायकक आवाज के बनत ? नारीक सम्मान के सुनिश्चित करत ? प्रकृतिक रक्षा के करत ? समाजमे सद्भाव के बचाएत ? देशक एकता आ अखण्डताक लेल के उत्तरदायी होयत ? एहि प्रश्नसभक उत्तरमे रक्षा-बन्धनक दर्शन परिवारक चारदीवारीसँ निकलि समाज आ मानवताधरि पहुँचि जाइत अछि ।
राखी वास्तवमे अत्यन्त छोट वस्तु थिक । ओकर मूल्य सेहो बहुत बेसी नहि होइत छैक । मुदा ओकर भावनात्मक मूल्य अनन्त भ’ सकैत अछि । ई धागा कलाइमे बन्हाइत अछि, मुदा सम्बन्ध हृदयकेँ बान्हैत अछि । ई धागा आँखिसँ देखाइत अछि, मुदा विश्वास आँखिसँ नहि बल्कि हृदयसँ अनुभव कयल जाइत अछि । रक्षा-बन्धन हमरा सभकेँ स्मरण करबैत अछि जे जीवनक वास्तविक सम्पत्ति धन-दौलत नहि, बल्कि विश्वासयोग्य सम्बन्ध थिक ।
अतः एहि रक्षा-बन्धनपर राखी बाँन्हैत काल केवल ई नहि कही – “भाइ, हमर रक्षा करिह ।” बल्कि कही जे “हम दुनू एक-दोसराक सम्मान, सुख, गरिमा आ कठिन समयमे साथ देबाक संकल्प करी।” आ एहि भावकेँ परिवारसँ समाज धरि विस्तार दिऔ – मानव मानवक रक्षा करय, समाज समाजक रक्षा करय, प्रकृति मानवक रक्षा करय आ मानव प्रकृतिक रक्षा करय । तखने श्रावण पूर्णिमाक ई पवित्र पर्व केवल एकटा वार्षिक परम्परा नहि , बल्कि प्रेम, करुणा, उत्तरदायित्व, सामाजिक सद्भाव आ मानवीय सभ्यताक जीवित संस्कार बनि केँ रहत ।
(लेखक बैंक प्रबन्धक संग मिथिला संस्कृति व सभ्यता सँ जुड़ल लेखन मे काफी रुचि रखैत छथि ।)
