ॐ श्री परमात्मने नमः !!
॥अष्टमोऽध्यायः॥
अर्जुन उवाच ।
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ॥
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥८-१॥
अर्जुन कहलनि:
हे पुरुषोत्तम, ब्रह्म कि थिक, अध्यात्म कि थिक, कर्म कि थिक ? अधिभूत केकरा कहल जाइत छैक, आर अधिदैव केकरा कहल जाइत छैक ?
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन् मधुसूदन ॥
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥८-२॥
हे मधुसूदन, एहि शरीर मे अधियज्ञ के आ कोन तरहें रहैत छथि (केहेन छथि) ? आर मृत्युक समय आत्म-नियंत्रित मनुष्य अहाँ केँ केना चिन्हैत अछि ?
हमर नोट: जेना कि भगवान अध्याय ७ केर आखिरी श्लोक मे बतेलनि अछि, वैह बात सँ जुड़ल अछि, अर्जुन एहि अध्याय ८ केर आरम्भ मे पुछलनि अछि । आउ एहि जरूरी सवाल सभक जवाब सँ सिखय जाय, स्वयं केँ ओहि स्थान पर राखू जेतय अर्जुन छथि ।
श्रीभगवानुवाच ।
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ॥
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥८-३॥
भगवान कहलनि:
ओ अविनाशी परम ब्रह्म छथि । हरेक शरीर मे हुनकर निवास अध्यात्म कहाइत अछि; यज्ञ मे जे आहुति देल जाइत अछि, जाहि सँ प्राणी सभक उत्पत्ति आ पालन होइत अछि, ओकरा कर्म कहल जाइत अछि ।
यज्ञ मे आहुति – एहिठाम सबटा नीक कर्म शामिल अछि ।
कर्म: देखू गीता अध्याय – ३ केर १४ आ १५ श्लोक ।
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ॥
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥८-४॥
नाशवान (क्षर) सहायक अधिभूत थिक, आर अधिवासी अधिदैवता थिकाह; हे देहधारी सब मे श्रेष्ठ (अर्जुन), हमहीं एहि शरीर मे अधियज्ञ थिकहुँ ।
अधिभूत: ओ नाशवान सहायक जे अलग अछि, आर तैयो आत्मचेतना सिद्धांत पर अपन अस्तित्वक लेल निर्भर करैत अछि, यानि, हरेक चीज जे भौतिक अछि, हरेक चीज जेकर जन्म होइत छैक ।
अधिदैवता: अपन सूक्ष्म स्वरूप मे सार्वभौमिक स्व (आत्मा); ओ केन्द्र जेतय सँ सब जीवित प्राणी केँ अपन इंद्रिय शक्ति प्राप्त होइत अछि ।
अधियज्ञ: यज्ञ केर अधिष्ठाता देवता – विष्णु ।
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ॥
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥८-५॥
आर जे मृत्युक समय हमरहि ध्यान करैत शरीर त्याग कयकेँ आगाँ बढ़ैत अछि, ओ हमर स्वरूप (अस्तित्व लोक) केँ प्राप्त करैत अछि: एहि मे कोनो सन्देह नहि अछि ।
यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ॥
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥८-६॥
अन्त घड़ी (मरबाक समय) मे, जाहि कोनो वस्तु केर स्मरण करिते ओ शरीर छोड़ैत अछि, ताहि वस्तु धरि ओ पहुँचि जाइत अछि, हे कुन्तीपुत्र, (कियैक तँ) ओ ताहि वस्तु केर निरन्तर चिन्तन करैत रहैत अछि ।
निरन्तर चिन्तन: विचार (अवधारणा) ई अछि जे केकरहु जीवन केर सबसँ प्रमुख सोच (विचार) मरबाक समय दिमाग मे रहैत छैक । कियो ओहि सँ छुटकारा नहि पाबि सकैत अछि, जेना कियो सपना मे कोनो अप्रिय विचार-छवि सँ छुटकारा नहि पाबि सकैछ; तेँ कोनो व्यक्तिक ऐगला बेर प्राप्त होयबला शरीर केर चरित्र, यानि अन्तिम विचार सँ निर्धारित होइत छैक ।
तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ॥
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयः ॥८-७॥
तेँ, हरेक समय, लगातार हमरा याद करू, आर युद्ध करू । मन आ बुद्धि हमरा मे लागल रहला सँ अहाँ निश्चयपूर्वक हमरहि लग आयब ।
हमरा याद करू आर युद्ध करू: अहाँ अपन मन हमेशा हमरा मे लगेने राखू आ संगहि एकटा क्षत्रिय केर रूप मे अपन स्वधर्म निभाउ; आर एहि तरहें अहाँ हृदय केर शुद्धि पायब ।
हमर नोट: अर्जुन केर सवाल आर भगवान कृष्ण केर जवाब केँ बहुत ध्यान सँ देखू आर अपन जीवनक लेल सेहो यैह सिद्धान्त सीखू ।
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ॥
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥८-८॥
कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ॥
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥८-९॥
प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ॥
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥८-१०॥
ओ सर्वज्ञ, प्राचीन, अधिपति, परमाणुओ सँ सूक्ष्म, सभक पालनकर्ता, अकल्पनीय, सूर्य केर समान स्वयं प्रकाशवान तथा माया केर अंधकार सँ उपर (दूर, परे) छथि – जे एहि तरहें हुनकर ध्यान करैत छथि, मरबाक समय, मन केँ स्थिर राखिकय, आर योग केर शक्ति सँ, भौंह केर बीच पूरा प्राण केँ स्थिर कयकेँ, से ओहि परम तेजस्वी पुरुष (परमब्रह्म) लग जाइत छथि ।
स्व-प्रकाशमान: मन या इंद्रिय सभक बुझयवला कोनो कारक (अभिकर्ता) द्वारा नहि, बल्कि केवल स्वयं द्वारा जानल जाइत छथि ।
योग केर शक्ति: जे समाधि केर निरंतर अभ्यास सँ अबैत अछि ।
प्राण: महत्वपूर्ण (ऊर्जा – शक्ति केर) धारा ।
सम्पूर्ण प्राण केँ स्थिर करब – अर्थात सम्पूर्ण संकल्प आ आत्मचेतना केँ एकाग्र करब ।
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ॥
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥८-११॥
वेदक ज्ञाता जिनका अविनाशी कहैत छथि, आत्म-संयमी (संन्यासी) लोकनि आसक्ति सँ मुक्त भ’ कय जाहि विषय मे प्रवेश करैत छथि आर जाहि लक्ष्य केर प्राप्तिक लेल ओ सब ब्रह्मचारी केर जीवन जिबैत छथि, से हम संक्षेप मे अहाँ सँ कहब ।
ब्रह्मचारी – एक धार्मिक छात्र जे संयम आदि केर व्रत लैत अछि; एहि चरण केर प्रत्येक क्षण कठिन अनुशासन आ तपस्या केर होइछ ।
यानि कठोपनिषद, द्वितीय अध्याय – १४वाँ श्लोक सँ तुलना करू । {Confer (cf.) means compare}
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ॥
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥८-१२॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ॥
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥८-१३॥
समस्त इंद्रिय सब केँ वश मे कयकेँ, मन केँ हृदय मे सीमित (बंद) कयकेँ, प्राण केँ माथ मे तानिकय, ध्यान लगेबाक अभ्यास मे लागल, एक अक्षर वला “ॐ” – ब्रह्म केर उच्चारण करैत, आर हमर ध्यान करैत – जे एहि तरहें शरीर छोड़िकय महाप्रस्थान (मृत्यु प्राप्त करैत) अछि, ओ परम लक्ष्य (परमब्रह्म) केँ प्राप्त करैत अछि ।
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ॥
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥८-१४॥
हे पृथापुत्र! जे हमेशा दृढ़ रहयवला योगी एक मन सँ लगातार आर नित्य हमर स्मरण करैत अछि, ओकरा लेल हम सहजता सँ प्राप्त होयबाक योग्य छी ।
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ॥
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥८-१५॥
सबसँ ऊँच पूर्णता धरि पहुँचिकय आर हमरा पाबिकय, महान आत्मावला लोक दोबारा जन्म नहि लैछ – जे (जन्म) दर्दक घर छी, आर क्षणिक (किछुए समय केर) छी ।
किछुए समय केर: हमेशा नहि रहयवला, हमेशा बदलैत रहबाक स्वभाववला ।
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ॥
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥८-१६॥
हे अर्जुन, ब्रह्मा केर लोक समेत समस्त लोक सब सँ (आत्मा सब) वापस जायवला होइछ, मुदा हे कुंतीपुत्र, हमरा पेलाक बाद कोनो पुनर्जन्म नहि होइत अछि ।
वापस जायवला: कियैक तँ समय केर सीमा होइछ । (हरेक लोक मे रहबाक समय-सीमा होइछ, आत्मा केँ अपन समय-सीमा बिता लेलाक बाद फेर सँ जन्म-मृत्यु केर चक्र मे प्रवेश करय पड़ैछ । एतय भगवान् श्री कृष्ण एहि बात केँ उजागर कयलनि अछि, संगहि आश्वासन देलनि अछि जे जँ अनन्यचित्त सँ हमेशा हुनकहि टा अर्थात् परमब्रह्म परमात्मा रूपी श्रीकृष्ण केर लोक मे पहुँचला सँ फेर ओकर वापसी नहि होइछ ।)
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ॥
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥८-१७॥
जे दिन आ रातिक (वास्तविक माप केँ) जनैत छथि, से ब्रह्मा केर ओहि दिन केँ सेहो जनैत छथि जे कि एक हजार युग मे समाप्त होइत छैक, आर ओहि राति केँ सेहो जनैत छथि जे कि एक हजार युग मे समाप्त होइत छैक ।
दिन आर राति: क्रमशः पूरे ब्रह्मांड केर विकास (इवोल्यूशन) आर समावेशन (इनवोल्यूशन) ।
अव्यक्ताद्वयक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ॥
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥८-१८॥
ब्रह्माक दिन अयला पर, सब चीज अव्यक्त अवस्था (अनमैनिफेस्टेड स्टेट) सँ व्यक्त होइत (निकलैत) अछि; रातिक अयला पर, ओ सब सच मे ओही मे मिलि जाइत अछि, जेकरा अव्यक्त (अनमैनिफेस्टेड) कहल जाइत छैक ।
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ॥
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥८-१९॥
हे पृथापुत्र, वैह बहुते रास जीव (जे ब्रह्माक पैछला दिन मे रहय), बेर-बेर जन्म लैत अछि, आर राति भेला पर स्वयं हेबाक बादो विलीन (अव्यक्त) भ’ जाइत अछि (अर्थात् ब्रह्मा मे समा जाइत अछि, मिलि जाइत अछि), आर दिन भेला पर फेर सँ प्रकट (व्यक्त) भ’ जाइत अछि ।
स्वयं हेबाक बादो… जन्म लैत अछि: ओ अपन कर्म सभक प्रभाव सँ मजबूर भ’ कय बेर-बेर अबैत अछि आ विलीन होइत (घुलैत) अछि ।
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ॥
याः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥८-२०॥
लेकिन एहि अव्यक्त (अनदेखल) सँ हंटिकय (दूर), एकटा आर अव्यक्त (अनदेखल), शाश्वत अस्तित्व (सनातन लोक) अछि – जे समस्त प्राणी (समस्त लोक) केर विनाश भेलहु पर नष्ट नहि होइत अछि ।
एहि अनदेखल: जे देखल (प्रकट, व्यक्त) केर बीज अछि, ओ स्वयं अविद्या थिक ।
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ॥
यं प्राप्य निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥८-२१॥
जेकरा अव्यक्त आर अविनाशी कहल गेल अछि, ओकरा सर्वोच्च लक्ष्य कहल गेल अछि । ओ हमर सबसँ ऊँच अवस्था छी, जेकर प्राप्तिक बाद कोनो वापसी नहि होइत अछि ।
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ॥
यस्यान्तःस्थानि भूतानि ये सर्वमिदं ततम् ॥८-२२॥
आर हे पृथापुत्र, ताहि परम पुरुष (अविनाशी ब्रह्म) केँ केवल हुनकहि प्रति पूरा मन सँ भक्ति कयला सँ प्राप्त कयल जा सकैत अछि, जाहिमे समस्त प्राणी (लोक) निवास करैत अछि, आर जिनका सँ ई सम्पूर्ण लोक व्याप्त अछि ।
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ॥
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥८-२३॥
आब हम ओहि समय (मार्ग, रास्ता सभक) बारे मे बतायब, हे भरतवंशी लोकनिक भरतर्षभ, जाहि पर चलिकय योगी लोकनि (वापस) लौटैत छथि, (आर फेर ओहि समय/रास्ताक बारे मे सेहो जाहि पर चलिकय) ओ वापस नहि लौटैत छथि ।
ओहि रास्ताक बारे मे ऐगला श्लोक सब मे बतायल जायत ।
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ॥
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥८-२४॥
अग्नि, (दीप केर) लौ, दिन केर समय, शुक्ल पक्ष, सूर्य केर उत्तरायणक छह मास – एहि मार्ग केँ अपनाबैत, ब्रह्म केँ जानयवला ब्रह्म केर समीप (लोक) मे जाइत छथि ।
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ॥
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥८-२५॥
धुआं, राति केर समय, कृष्ण पक्ष, सूरज केर दक्षिणायन (दक्षिण दिशा मे जेबाक) छह मास – एहि रास्ता सँ योगी, चांदक इजोत (इजोरिया) पाबिकय वापस लाौटैत छथि ।
एहि दुइ श्लोक (२४ आ २५) केर असली महत्व (मर्म) निर्धारित करब कठिन अछि । किछु लोक सोचैत छथि जे हरेक चरण केर तात्पर्य एकटा गोला सँ अछि; जखन कि दोसर, चेतनाक एकटा अवस्था सँ बुझैत छथि । तैयो किछु आर लोक सोचैत छथि जे आगि सँ शुरू होयवला क्रमिक यात्राक तात्पर्य ज्ञानप्राप्तिक प्रकाशपुंज जेकाँ आ संन्यास (आसक्ति-बन्धन आदि सँ मुक्ति) केर बढ़ैत अवस्था सँ अछि, आर धुआं सँ शुरू होयवला क्रमिक यात्राक तात्पर्य अछि अज्ञानता आर आसक्ति केर बढ़ैत गेल अवस्था ।
देवयान आ पितृयान, दुइ गोट मार्ग (रास्ता), जाहि सँ मृत लोकक आत्मा अपन गुण-कर्म (नीक या बेजा कर्म) केर हिसाब सँ दोसर दुनिया (लोक) मे जाइत अछि, एहि बातक चर्चा उपनिषद सब मे कयल गेल अछि, खासकय केँ छांदोग्य, V.x. १, २ मे । बादरायण ब्रह्म-सूत्र, IV, ii, १८-२१ मे एहि बाटसभ (मृतक केर आत्मा सभक अन्य लोक सब मे जायवला मार्ग सब) पर चर्चा कयलनि अछि । लेकिन स्वर्गीय श्री तिलक केर आर्य जातिक पूर्वज लोकनिक आर्कटिक घर वला सैद्धान्तिक कथा (थ्योरी) एहि सवाल पर एकटा रोचक प्रकाश (वर्णन) देलक अछि । ओ एहि विषय पर खास रूप सँ एकटा बेश मूल्यवान (कीमती) कार्यपत्र (पेपर) मे सेहो बात कयलनि अछि, जे प्रबुद्ध भारत (वॉल्यूम IX, पेज १६०) मे छपल छल । एहि सिद्धांत केर महत्व आर श्री तिलक द्वारा एकरा जाहि बेहतरीन ढंग सँ बुझायल गेल अछि, से देखैत, हम नीचाँ हुनकर तर्कक मुख्य भाग केँ संछेप मे देखब ।
ऋग्वेद मे पितृयान आर देवयान शब्द सभक कतेको बेर प्रयोग भेल अछि । मुदा उपनिषद सब मे आत्माक गमन-मार्ग (रास्ता) केर बारे मे जे फर्क कहल गेल अछि, जे आदमी साल केर कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष मे मरत, से बात ऋग्वेदक द्रष्टा (सर्जक, कवि) लोकनि केँ पता नहि रहनि, जिनकर माननाय रहनि जे आदमीक आत्मा हमेशा पितृयान मार्ग टा सँ जाइत अछि, चाहे ओकर मृत्युक समय कोनो भी हो । तेँ ई स्पष्ट अछि जे उपनिषद सभक सिद्धांत बाद मे बनल, शायद तखन बनल जखन भौतिक इजोत (प्रकाश) तथा अन्धकार केँ नैतिक नीक आ बेजा सँ जोड़ि देल गेल आर दुनियाक दोहरा (द्वंद्व) चरित्र सेहो स्थापित भ’ गेल । आब, अगर एकरा संगहि हम सब इहो देखब जे आर्कटिक समय सँ सूरज केर दक्षिणी मार्ग मे मृत्यु केँ अशुभ मानल जाइत छल, त हम सब देखि सकैत छी जे लोकक आत्माक (गमन) मार्ग मे केना अन्तर उत्पन्न भेल, ई एहि बात पर निर्भर करैत छल जे ओ सालक अन्हरिया (कृष्णपक्ष) अथवा इजोरिया (शुक्लपक्ष) केर समय मे मरल ।
हरेक बाट मे चरण (डेग) केर क्रमिकताक सम्बन्ध मे, चूँकि ई मानल जाइत छल जे अग्नि अकेले टा आत्मा केँ ओकर बाट देखेनिहार नेतृत्वकर्ता अछि, आर दुनू मार्ग सूर्य केर मार्गहि पर खत्म होइत छल, एहि तरहें शुरू करबाक आ रुकबाक विन्दु तय भ’ जाइत छल, तेँ बीच केर डेग (चरण) सब केँ भरनाय सेहो कठिन नहि छल । आर दोसर मे, दुनियाक दोहरा (द्वंद्व) चरित्र अग्नि मे आगि आ धुआंक रूप मे देखाइत अछि । दिन आर राति, बढ़ैत आ घटैत चांद, सूरज केर उत्तरी आ दक्षिणी मार्ग – ई सबटा प्राकृतिक क्रम (नेचुरल ऑर्डर) में आगाँ आयल छल । चरण (डेग) केर संख्या सहजता सँ बढ़ायल जा सकैत अछि, आर असल मे कौशीतकी तथा किछु आरो उपनिषद सब मे एहि आम सिद्धांत पर एकरा बढ़ायल सेहो गेल अछि ।
एहि बारे मे एकटा आर बात पर ध्यान देल जा सकैत अछि । दोसर यानि पितृयान पथ मे एहेन किछुओ नहि छैक जे पहिल पथ मे अग्नि जेकाँ होइक । तेँ हमरा सब केँ या त पहिल पथ मे, “अग्नि” आर “लौ” शब्द केँ एक जेकाँ सन्दर्भ/तात्पर्य-सम्बन्ध मे प्रयुक्त भेल बुझिकय चरण (डेग) केर संख्या केँ कम करय पड़त, आर ओकर अनुवाद “अग्नि, यानी लौ” जेकाँ करय पड़त, या दोसर पथ मे एकटा आरो चरण केर रूप मे “अग्नि” केँ जोड़िकय बढ़ाबय पड़त ।
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥८-२६॥
सच मे दुनिया केर ई इजोरिया (उजाला) आ अन्हरिया (अन्धेरा) वला मार्ग हमेशा रहयवला मानल जाइत अछि; एकटा मार्ग वापस नहि अबैत अछि; दोसर मार्ग वापस अबैत अछि ।
मार्ग हमेशा रहयवला अछि, कियैक तँ संसार हमेशा रहयवला अछि ।
नैते सृति पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन ॥
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥८-२७॥
हे पृथापुत्र, एहि मार्ग सब केँ जानि लेलाक बाद कोनो योगी भ्रमित (मोहित) नहि होइत अछि । तेँ, हे अर्जुन, अहाँ हर समय योग मे दृढ़ रहू ।
ई जनैते जे एकटा मार्ग संसार दिश लय जाइत छैक आ दोसर मोक्ष दिश, योगी लोकनि ज्ञान दिश लय जायवला मार्ग केँ अपनाबैत छथि आ दोसर केँ छोड़ि दैत छथि ।
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ॥
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥८-२८॥
(शास्त्र सब मे) वेद (केर पढ़ाइ), यज्ञ (केर आयोजन कयनाय), तपस्या (केर अभ्यास) तथा दान सँ जेहो पुण्य सब कहल गेल अछि – ई जानिकय (उपरोक्त वर्णित तथ्य सभक बारे मे ज्ञान प्राप्त कय), योगी लोकनि एहि (शास्त्र निर्देशित कर्म) सबसँ उपर उठि जाइत छथि, आर सबसँ प्राचीन, परम धाम (ब्रह्मलोक) केँ प्राप्त करैत छथि ।
ई जानिकय – भगवान द्वारा कहल गेल सत्य, एहि अध्याय केर आरम्भ मे अर्जुन केर सवाल केर जवाब थिक ।
इति अक्षरब्रह्मयोगो नामाष्टमोध्यायः ॥
The end of the eighth chapter, designated, The Way to the Imperishable Brahman.
हरिः हरः!!
