लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- यज्ञोपवीत संस्कार मे बढ़ैत आडम्बर
यज्ञोपवीत संस्कारमे बढ़ैत आडम्बर : मिथिलाक वैदिक गरिमाक चुनौती
भारतीय जीवन-दर्शनमे षोडश संस्कार मानव जीवनकेँ शारीरिक, मानसिक, नैतिक आऽ आध्यात्मिक परिष्कारक क्रमिक सोपान मानल गेल अछि। एहि संस्कारसभमे यज्ञोपवीत संस्कार (उपनयन) विशेष महत्त्व रखैत अछि, कारण ई बालककेँ केवल एकटा सूत्र धारण करबाक अनुष्ठान नहि, अपितु ज्ञान, अनुशासन, ब्रह्मचर्य, स्वाध्याय आऽ कर्तव्यबोधक जीवनमे प्रवेशक औपचारिक आरम्भ अछि। मिथिलामे ई संस्कार सदिखन वैदिक परम्परा, सादगी, शास्त्रीय विधि आऽ पारिवारिक सहभागिताक अनुपम उदाहरण रहल अछि। मुदा समयक प्रवाहमे सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक प्रदर्शन आऽ प्रतिस्पर्धाक प्रवृत्ति एहि पवित्र संस्कारकेँ सेहो प्रभावित कएने अछि। परिणामस्वरूप, आध्यात्मिक उद्देश्य क्रमशः गौण भऽ रहल अछि आऽ बाह्य आडम्बर प्रधान बनैत जा रहल अछि।
“उपनयन” शब्दक अर्थ अछि गुरुक निकट लए जाएब। वैदिक परम्परामे उपनयनक उपरान्त बालक गायत्री मन्त्रक दीक्षा ग्रहण करैत छल, वेदाध्ययन आरम्भ करैत छल आऽ संयमपूर्ण जीवनक संकल्प लैत छल। यज्ञोपवीत केवल शरीर पर पहिरल सूत्र नहि, अपितु तीन ऋण देवऋण, ऋषिऋण आऽ पितृऋणक स्मरण कराबऽ वला आध्यात्मिक प्रतीक अछि।
मिथिलाक ग्राम्य जीवनमे यज्ञोपवीत संस्कार अत्यन्त सरलतापूर्वक सम्पन्न होइत छल। कुलपुरोहित, सीमित स्वजन, वैदिक मन्त्रोच्चार, आशीर्वाद, ब्रह्मोपदेश आऽ सामूहिक भोजन एतबे एहि संस्कारक गरिमा छल। सामाजिक प्रदर्शनक स्थान पर धार्मिक श्रद्धा आऽ पारिवारिक आत्मीयता प्रमुख रहैत छल।
वर्तमान समयमे यज्ञोपवीत संस्कारमे सामाजिक प्रतिस्पर्धाक प्रवृत्ति तीव्र रूपेँ देखल जा रहल अछि। लाखौँ रुपैयाक खर्च, भव्य पाण्डाल, आकर्षक सजावट, बैंड-बाजा, डीजे, चलचित्र-जेकाँ मंच-सज्जा, महग भोज आऽ प्रदर्शनमुखी आयोजन संस्कारक मूल उद्देश्य पर भारी पड़ि रहल अछि।
कतेको ठाम तऽ बालकक ब्रह्मचर्य दीक्षा सँ बेसी चर्चाक विषय भोजनक विविधता, सजावटक भव्यता आऽ अतिथिक संख्या बनि जाइत अछि। धार्मिक संस्कार क्रमशः सामाजिक प्रतिष्ठा देखाबयक माध्यममे परिणत होइत जा रहल अछि।
मिथिला सदिखन सादगी, विद्वत्ता आऽ शास्त्रीय परम्पराक भूमि रहल अछि। एतय संस्कारमे आडम्बर नहि, बल्कि विधि, मर्यादा आऽ श्रद्धाक प्रधानता रहल। जखन संस्कार प्रदर्शनक माध्यम बनैत अछि, तखन नवपीढ़ीकेँ संस्कारक वास्तविक तात्पर्य बुझबाक अवसर नहि भेटैत अछि।
एहि प्रवृत्तिसँ आर्थिक असमानता सेहो बढ़ैत अछि। सीमित आय वला परिवार सेहो सामाजिक दबावमे अनावश्यक ऋण लऽ कऽ भव्य आयोजन करय लगैत छथि। परिणामस्वरूप संस्कार आनन्दक अवसर नहि रहि आर्थिक बोझ बनि जाइत अछि।
संस्कारक मूल भावनाकेँ पुनर्जीवित करबाक आवश्यकता अछि।
यज्ञोपवीत संस्कारक वास्तविक गरिमा बाह्य वैभवमे नहि, अपितु अन्तःकरणक पवित्रतामे निहित अछि। आवश्यक अछि जे अभिभावक अपन सन्तानकेँ गायत्री मन्त्र, वेदाध्ययन, नैतिकता, अनुशासन, गुरु-श्रद्धा आऽ मिथिलाक सांस्कृतिक मूल्यक महत्त्व बुझाबथि। संस्कारक सफलता आयोजनक खर्चसँ नहि, अपितु संस्कार ग्रहण करऽ वलाक चरित्र निर्माणसँ मापल जाए।
समाजक विद्वान, पुरोहित, शिक्षित युवा आऽ सांस्कृतिक संगठन सभकेँ सेहो एहि दिशामे जनचेतना जागृत करबाक आवश्यकता अछि, जाहिसँ यज्ञोपवीत फेर सँ अपन मूल वैदिक स्वरूपमे प्रतिष्ठित भऽ सकए।
यज्ञोपवीत संस्कार मिथिलाक सांस्कृतिक आत्माक अमूल्य धरोहर अछि। एकर उद्देश्य प्रदर्शन नहि, अपितु व्यक्तित्वक आध्यात्मिक जागरण आऽ जीवनमूल्यक प्रतिष्ठा अछि। जँ हम बाह्य आडम्बरक मोह त्यागि पुनः सादगी, शास्त्रीयता आऽ संस्कारक मूल भावनाकेँ अपनाबी, तँ ई परम्परा आगामी पीढ़ीक लेल प्रेरणाक स्रोत बनल रहत। संस्कार ओतय जीवित रहैत अछि जतए श्रद्धा जीवित रहैत अछि आऽ जखन श्रद्धाक स्थान प्रदर्शन लऽ लैत अछि, तखन संस्कृतिक आत्मा क्षीण होमय लगैत अछि। अतः मिथिलाक गरिमा एहीमे अछि जे यज्ञोपवीत संस्कारकेँ पुनः ज्ञान, संयम, विनय आऽ वैदिक मर्यादाक पवित्र उत्सवक रूपमे प्रतिष्ठित कएल जाइत अछि।
