लेख विचार
प्रेषित: ममता झा मेधा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- यज्ञोपवीत संस्कार आ आडंबर
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यज्ञोपवीत संस्कार सनातन धर्मक सोलह संस्कार मे सँ आठम संस्कार थिक। एकरा उपनयन, जनेऊ वा ब्रतबंध सेहो कहल जाइत अछि। ई संस्कार बालक केँ गुरुकुल प्रवेश आ विद्यारम्भक अधिकार दैत छैक। ‘यज्ञ’ माने पवित्र कर्म आ ‘उपवीत’ माने पहिरबाक वस्त्र। अर्थात पवित्र कर्मक लेल संकल्प लेबाक संस्कार। मुदा आइ-काल्हि ई पवित्र संस्कार आडंबर आ दिखाबाक भेंट चढ़ि गेल अछि।
*यज्ञोपवीतक मूल उद्देश्य*
द्विजत्व प्राप्ति : जनेऊ धारण करला सँ बालक ‘द्विज’ कहबैत अछि। पहिल जन्म मायक गर्भ सँ, दोसर जन्म गायत्री मंत्र आ विद्याक माध्यम सँ।
त्रिसूत्रक महत्व : जनेऊ मे तीन सूत होइत अछि – जे ब्रह्मा, विष्णु, महेश वा देवऋण, पितृऋण, ऋषिऋणक प्रतीक थिक। ई तीनू ऋण सँ उऋण होइबाक संकल्प छी।
गायत्री दीक्षा : एहि दिन बालक केँ गायत्री मंत्रक उपदेश देल जाइत छैक, जे ओकरा सद्बुद्धि आ ज्ञान दिस लए जाइत छैक।
अनुशासन आ नियम : जनेऊ धारण करला के बाद बालक लेल भोजन, शयन, आचरणक नियम बान्हि देल जाइत छल, जाहि सँ ओ संयमी आ चरित्रवान बनए।
संस्कार मे बढ़ैत आडंबर
पहिने ई संस्कार गामक चौपाल पर, गुरु-पुरोहितक सान्निध्य मे सादगी सँ होइत छल। खाली गायत्री मंत्र, हवन आ आशीर्वाद। मुदा आइ स्थिति बदलि गेल अछि।
दिखाबाक होड़ : केकर बेटाक जनेऊ मे कतेक खर्च भेल, केहेन पैघ टेंट लागल, कतेक गोटे केँ भोज खुआएल गेल – एकरे चर्चा होइत अछि।
डीजे आ नाच-गान : जे संस्कार वैदिक मंत्र सँ होइबाक चाही, ओतय आब डीजे पर अश्लील गीत आ राति भरि नाच होइत अछि। पवित्रता भंग भऽ जाइत अछि।
नानी गाम सं भेंट पर दवाब:दहेजक रूप* : कतेक ठाम जनेऊ केँ बहाना बना कऽ लड़की पक्ष सँ , सोना, नगद रुपैया मांगल जाइत अछि। संस्कार व्यवसाय बनि गेल अछि।
भोजक अपव्यय* : 500 सँ 1000 लोक केँ भोज, 10-12 तरहक व्यंजन, भोजनक बर्बादी। जे रुपैया बालकक शिक्षा पर खर्च होइतए, से दिखाबा मे चलि जाइत अछि।
मूल भावक लोप* : ने बालक केँ जनेऊक महत्व बुझाओल जाइत छैक, ने ओ नियम निभबैत अछि। जनेऊ पहिरला के दोसरे दिन कतेक बच्चा ओकरा खोलि कऽ राखि दैत अछि।
*आडंबर सँ हानि*
गरीब परिवार कर्ज लऽ कऽ संस्कार करैत अछि आ जीवन भरि ओहि कर्ज मे डूबल रहैत अछि।
संस्कारक पवित्रता आ आध्यात्मिक ऊर्जा नष्ट भऽ जाइत अछि।
नव पीढ़ी संस्कार केँ खाली ‘खर्चा वाला फंक्शन’ बुझए लगैत अछि, श्रद्धा खतम भऽ जाइत छैक।
समाधान केना हो?
सादगी अपनाऊ : संस्कार घर पर वा मंदिर मे 10-20 गोटेक उपस्थिति मे, वैदिक विधि सँ करू। मंत्र, हवन आ आशीर्वाद – बस एतबे पर्याप्त।
शिक्षा पर जोर : भोज पर खर्च करबा सँ नीक जे ओहि रुपैया सँ बालकक नामे FD करा दिअ, वा कोनो गरीब बच्चाक पढ़ाइ मे लगा दिअ।
बालक केँ बुझाऊ : जनेऊ पहिरेबा सँ पहिने बालक केँ एकर महत्व, नियम आ कर्तव्य बुझाउ। जे जनेऊ धारण करत, से ओकर मर्यादा सेहो राखत।
सामूहिक उपनयन* : गाम-समाज मे एके दिन 10-15 बच्चाक जनेऊ एक संग कराऊ। खर्चो कम हेतैक, एकता सेहो बढ़तैक।
यज्ञोपवीत संस्कार आत्मशुद्धि आ ज्ञानक मार्ग थिक, उत्सव वा स्टेटस सिंबल नहि। जँ हम सभ आडंबर त्यागि कऽ एकर मूल भाव केँ पकड़ब तखने ई संस्कार सार्थक हेतैक। जनेऊक तीन सूत हमरा सभ केँ कर्तव्य, ज्ञान आ त्यागक यादि दिआबैत अछि। ओकरा डीजे आ भोजक शोर मे दबा नहि दिअ।
“संस्कार सादगी मे बसैत अछि, दिखाबा मे नहि। जनेऊ पहिरू, मुदा पहिने ओकर योग्य बनू।”
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