लेख विचार
प्रेषित: अशोक झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- मिथिला मे बेरोजगारी क’ दंश
मिथिलाक माटिमे जे सौंन्हगर सुगंध आ अपनापन छै, से संसारक कोनो कोनामे नहि भेटैत अछि। जाहि धरतीक पहचान विद्यापति के गीत, जनकक दर्शन, भारती-मंडनक शास्त्रार्थ आ ताल-पोखरि, मखान-पान आ माछक सम्पन्नता सँ छल, आइ वैह मिथिला पलायनक असह्य दर्द सँ सिसकि रहल अछि। गामक चौपाल, दलान पर बूढ़-बुजुर्गक पान सुपारी केर आदान- प्रदान आ आँगनमे बजैत मैथिलीक मिठास आइ परदेसक कोलाहलमे किछु एहि तरहें विस्मृत भ’ रहल अछि जे पाछाँ मात्र सूनापन आ उदासी छूटि जाइत अछि।
गामक सून दलान आ ताला लागल कपाट
आइ यदि कोनो ठेठ मैथिल गाममे घुमि कए देखल जाउ तँ पहिने जे चहल-पहल भेटैत छल, ओ नदारद अछि। घरक-घर ताला लागल अछि, दलान पर बिछल चौकी धूल धूसरित भेल अछि आ गामक रस्ता पर मात्र बूढ़-बुजुर्ग वा छोट बच्चा सभ नजरि अबैत छथि। नवयुवकक पाँत-क-पाँत गाम सँ पलायन केलक अछि। ओ सभ रोजगारक खोजमे दिल्ली, मुम्बई, पंजाब, सूरत वा बैंगलोर जेहन पैघ शहरक सँकरी गलीमे अपन जवानी खपा रहल छथि।
गामक ई सूनापन मात्र जनसांख्यिकीय बदलाव नहि, बल्कि एकटा सांस्कृतिक आ भावनात्मक त्रासदी अछि। जखन कोनो गामक नव पीढ़ी शहर पलायन कऽ जाइत अछि, तँ ओ केवल अपन देह नहि लऽ जाइत, बल्कि गामक ऊर्जा, उत्सव आ परंपरा केँ सेहो संग लऽ जाइत अछि।
दरभंगा, मधुबनी, सहरसा वा समस्तीपुर स्टेशनक प्लेटफार्म पर जा कए देखू, तँ पलायनक असली दर्द प्रत्यक्ष देखाइ पड़ैत अछि। जनरल बोगीमे भेंड़-बकरी जकाँ ठूँसल मैथिल युवक सभ, जे हाथमे टिनक बक्सा आ माथ पर भारी बोरा लेने ट्रेनक पायदान पर लटकबाक लेल विवश छथि। ओहि आँखिमे कतेक सपना होइत अछि आ कतेक बेबसी, से स्टेशन पर छोड़य आएल माय-बाप आ नवविवाहिताक अश्रुधार सँ बुझल जा सकैत अछि।
पलायन कोनो शौख नहि, पेटक आगि आ भविष्य संवारबाक बेगरता थिक। मिथिलाक उपजाऊ माटि आ प्रतिभाशाली मेधा होइतो, स्थानीय स्तर पर उद्योगक अभाव, चीनी मिल आ जूट मिल सभक बंदी, आ हर साल कोसी-कमलाक बाढ़िक विभीषिका लोकक कमर तोड़ि देलक अछि। जखन अपन माटि पर श्रम आ प्रतिभाक उचित मोल नहि भेटैत अछि, तखन परदेसक गतर तोड़निहार मजूरी करब विवशता बनि जाइत अछि।
पलायनक एहि दंश सँ मुक्ति पाबय लेल हमरा सभकेँ अपन सोच आ व्यवस्था दुनूमे बदलाव आनब आवश्यक अछि।
मिथिलाक कृषि आधारित उद्योग जेना—मखान प्रसंस्करण, आम-लीचीक पैकेजिंग, मत्स्य पालन आ डेयरी उद्योग केँ बढ़ावा देबऽ पड़त।
हस्तशिल्प, विशेष रूप सँ मिथिला पेंटिंग आ सिक्की कला सँ जुड़ल कलाकार सभकेँ वैश्विक बाजार उपलब्ध कराबय पड़त जाहि से ओ अपन घरे बैसि सम्मानजनक आमदनी कऽ सकथि।
स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण तकनीकी आ उच्च शिक्षाक संस्थान खोलब आवश्यक अछि ताकि नव पीढ़ी केँ पढ़बाक लेल बाहर नहि भागय पड़य।
कोसी आ कमला नदीक बाढ़िक स्थायी निदान करब जरूरी अछि, जाहि सँ हर साल होबय बला विनाश रुकय आ किसानक मेहनत व्यर्थ नहि जाइ।
मिथिलाक माटिमे ओ सामर्थ्य अछि जे ओ अपन हरेक संतानक पेट पोसि सकैत अछि, मुदा एकरा लेल नीति, नीयत आ जनमानसक संकल्पक आवश्यकता अछि। जहिया मिथिलाक बेटा-बेटी अपन गाम-घरमे रहि कए स्वाभिमानक संग जीविकोपार्जन कऽ सकत, तहिये सही अर्थमे विद्यापतिक ई पावन धरती अपन गौरव फेर प्राप्त कऽ सकत आ स्टेशनक ओ उदास प्लेटफार्म सँ विदाईक सिसकी बंद होयत।
