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नारी सशक्तिकरण खाली गप्पहिमे वास्तवमे एखनहु प्रताड़ित भ’ए रहलीह यत्र -तत्र

19 भ्यूज

 

लेख विचार
प्रेषित: अर्चना मिश्रा अर्शी

श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :– स्वेक्षिक

शीर्षक – कोठी
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शान्त अछि हमर मोन! असंख्य सवालक संग सभकेँ देखि रहल छी।
नारी सशक्तिकरण पर गप सगरो भ’ रहल अछि।आबतँ एहि डिजिटल युगमे कियो एक रती बेसी सफल या असफल छथि तँ सगरो खबरि पसैर जाइत छैक! लोक गुणगान करै लगैत अछि ,होयबाको चाही।
लेकिन अखनोहुँ ओतहि के ओतहि छी! घबराइत छी बेटीक जन्म पर नहि सोचैत छी कर्मक लिखल नहि छोड़ैत छियनि विधाता पर आ स्वयं अपन हाथसँ भाग्यक रेख लिखैत छी।सुनने छलौं फल्लां बाबू अपन हाथक लकीर कर्मसँ बदलि लेलनि।बेटी कर्मठ तहियो छली आ आइयो छथि ।
मुदा आब तँ लोक बिसरि गेल ओ ज़माना,नहि जानि कतय चलि गेल।जखन सभ संग बेसी करैत छलै गप -सप आ हँसी ठहाका संग आंखिमे अबैत छलैं खुशीक नोर।
जखन शुरू होइत छलैं गपक फुलझड़ी तँ कहाँ रहैत छलै समयक ज्ञान। जल्दीसँ काज खत्मक’ चल जाइत छली बहिनपा लग जेष्ठ -श्रेष्ठ आ छोटक आंगन घुमबा लेल ! नीक बेजाय बुझब आ बुझैबा लेल।कोठी बखारी पर चर्चा करबा लेल ,लुड़ि सिखबा लेल ओकर गुणदोष बुझबाल’।कोठीमे चाउर राखू आ किछु मासक बात देखियो रूपे बदलल लागत।मेंजनी ओकरा मांजि क’ साफक’ दैत छैक।आकार तँ रहैत छैक सूरे सन मुदा दोसर प्रजातिक! ओ खोह नै बनबै छैक पूरा पालिस करैत छैक ,आ फटकला सँ साफ भ’ जाइत छैक। अकबरपुर बाली के कोठी केहन सुंदर होइत छनि अपने हाथे पारैत छली,खुब नकासी संग दर्शनिय होइत छलनि।बेटाक बियाह मे देखने रहियनि कोठी माछक आकारक एनमेन भाकूर माछ सन।रंग टीपसँ लगैत छल जेना इन्द्र धनुषक छटा छिटकैत हो। आब कहाँ समय किनको लग आब सब अपने मे व्यस्त छथि।अड़ोसी -पड़ोसी संग हाय हैलो तक सिमित जहाँ तक संभव हो बाहरेसँ बाय बाय टा टा भ’ जाइत छनि।जखन अपन घरक लोक ल’ समय नहि तँ दोसर के कथे कोन।आब तँ चाही सबके भौतिक सुख,देह नहि डोलायब दबाइ फांकब मुदा आंटा हाथ सँ नहि सानि मसिने सँ सानब। मसाला सिलोट पर के ह’लकरत बुकनी मे स्लो पॉइजन रहैत छै तँ छै !कनी मनीसँ कोन असर हेतै सभ खाइत छैक हमहुँ खाइत छी कम्पनी चलि रहल छैक हमरे सबहक सहयोगसँ नै।आ देह मे जान कहाँ ई सब काजक बासते जांत चकड़ी चलाएब त दूरक गप आब त दाइलौ मिक्सी मे दरैर लैत छी।
फुरसति कहाँ अछि भरि दिन मोबाइल पर व्यस्त छी। मोबाइल तँ धीरे-धीरे शरीर शून्य कयने जाइत छैक नहियो चाहिक’ अपना दिश आकर्षित कय लैत छै।
तहियो नारीमे गुणक खान रहनि आब नारी तँ सब पर भारी छथि पुरुषक कांह सँ कांह मिला चलैत छथि लेकिन आबो बेटी गर्भेमे दम तोड़ैत छथि अल्ट्रासाउंड माध्यमसँ ।
लेकिन इहो युगमे अकबरपुर बाली अपने हाथे सब काज करैत छथि कोठी पर्यन्त रखने छथि।
युग बदलल सोच नहि आइयो बेटी जराउल जाइत छथि! तहियो प्रताड़ित होइत छली !

 

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