खिस्सा-पिहानी
– प्रवीण नारायण चौधरी
बाबा-पोताक ओ खिस्सा
(प्रवीण स्मृति मे सिखल एक अद्भुत नैतिक कथा)
काल्हि कहने रही न जे खिस्सा कहब… से सुनू !
गीता एक बेर पढ़िकय अथवा बेर-बेर पढ़िकय पर्यन्त पूर्ण रूप मे हम मानव समुदाय स्मृति मे अक्षरशः नहि राखि सकैत छी । विरले कियो सुपर स्मृति (बेजोड़ स्मरण शक्ति) रखनिहार अपवाद भ’ सकैछ, तथापि बड मुश्किल छैक एकरा सम्पूर्णता मे स्मरण मे राखब । गुरुवर्ग प्रति आ विशेष रूप सँ जे व्याकरणाचार्य एवं वैदिक ज्ञान सँ परिपूर्ण छथि, हुनका सब लेल एकर पढ़ि-पढ़िकय व्याख्या करब सम्भव अछि, मुदा जाहि धाराप्रवाह ढंग सँ श्री कृष्ण आ अर्जुन बीच संवादक क्रम मे गीत अभरल अछि, ताहि रूप मे धाराप्रवाह स्मरण शक्तिक उपयोग करैत बाजब-बुझब कि बुझायब शायद सम्भव नहि । एहि सन्दर्भ बहुतो वर्ष पूर्व मे एकटा सुन्दर नैतिक कथा पढ़ने रही । आइ ओ कथा सुना रहल छीः
बाबा-पोताक कथा मे ई बात एलैक जे बाबाक कहला पर पोता बेर-बेर गीता पढ़य आ फेर बिसरि-बिसरि जाय । एना बेर-बेर पढ़लो पर नहि बुझि पेबाक अथवा सब बात दिमाग मे नहि अँटा पेबाक कारण मन सँ दुःखी भ’ जाइत छल पोता ।
बाबा कहलखिन जे एना कर बौआ, तूँ कोयला उठबयवला पथिया ले आ पोखरि सँ ओहि मे जल भरिकय लाबे । पोता बाबाक कहल अनुसार जाय, ओहि कोयला उठबयवला कारी झामर आ कोयलाक बुरादा सब सँ गह-गह गथायल पथिया (छिट्टा) मे जल भरय आ जा-जा धरि बाबा लग पहुँचय-पहुँचय, सबटा जल चूबि गेल करैक ।
तखन ओ बाबा उपर भनभनाकय बाजल, “अहूँ न बाबा ! नहि जाइन केहेन-केहेन काज मे लगा दैत छी ! कहू त एहि छिट्टा मे कतहु पानि भरिकय आनि सकब हम ? पूरा भूरे-भूर छैक । ई त कोयलाक बुरादा सँ गथायल रहबाक कारण मूनल बुझाइत अछि ।”
बाबा हँसिकय कहलखिन, ” हे रौ छौंड़ा ! बुझय नय छिहिन जे हमर-तोहर माथ एहि छिट्टा जेकाँ भूरे-भूर वला अछि ! ई त देखय मे मूनल-मानल बुझाइत अछि । मुदा एकर स्मृति शक्ति जे छैक से ततेक रास औंज-गौंज बात सब मे ओझरायल रहैछ (किंवा ओझरा जाइछ) जे गीताक सबटा बात केँ अथवा आने-आने महत्वपूर्ण बात सभक समूह केँ, यथा गीता, वेद, शास्त्र व पुराण आदिक बात केँ अपने-अपने अनुसारें आंशिक रूप मे बुझैत आ थोड़बे-बहुत स्मृति मे राखि पबैत अछि ।”
आगू फेर बाबा कहलखिन, “आब देखहिन न ! ई कोयलावला छिट्टा शुरू मे केहेन छलौक ? आर, बेर-बेर एहि मे पानि भरि अनबाक कोशिश मे आब कतेक झकझका गेलौक ?”
अर्थात् निरन्तर स्वाध्याय सँ हमरा सभक जीवनक करियौंछ क्रमशः दूर होइत चलि जाइछ । कहियो त पूर्ण स्वच्छ हेब्बे करत ! कथाक सार मे यैह निष्कर्ष निकलैछ । कोशिश सँ भगनाय मूर्खक काज थिक, आलसी-प्रमादीक काज थिक । अपना केँ जेना संकल्पित कय केँ लोक स्वाध्यायक कोशिश करत, ओकर जीवन ओतबे पवित्र आ पुण्यदायी बनैत चलि जेतैक । नोट कय लियह आ शुरू करू प्रयोग आइये सँ ।
हरिः हरः!!
