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आखिर नेपाल-भारत मैत्री केकरा खटैक रहल छैक आ कियैक ?

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नेपाली राजनीति आ भारत

‘भारतवर्ष’ अन्तर्गतक अनेकों देश मे आइ अपना – अपना भूगोल अनुसारक अनेकों दावी आ गाथा सब पर आधारित बात-विचार सब सुनि-देखि रहल छी हम सब ।

कहल जाइत छैक – भारत बीच मे, आजू-बाजू विभिन्न देश । उत्तर नेपाल, पूब बंगलादेश, पच्छिम पाकिस्तान आ दक्षिण म्यांमार । सीमा सँ जुड़ल आरो देश सब अछि, धरि ई चारि गोट भारत सँ पूर्णतया सटल आ समीपक देश सब थिक ।

भारतक उत्तर मे पड़ैछ नेपाल । हिमालयक कोरा मे अवस्थित ई सुन्दर प्राकृतिक देश, लेकिन राजनीतिक चेतना आ बौद्धिकताक एतबा भरमार जे पुछू जुनि । कहियो शान्ति सँ भरल कहल जाइत छल, आइ कतेको दशक सँ अनेकों क्रान्ति आ परिवर्तन झेलि रहल अछि नेपाल ।

लिपुलेख, लिम्पियाधुरा आ कालापानी केकर ?

नेपाल आ भारत केर सीमा निर्धारण ‘सुगौली सन्धि’ (१८१६) अनुसार भेल । १८१६ केर दुइ तिथि – ४ मार्च १८१६ आ पुनः ९ दिसम्बर १८१६ । ई दुइ समझौता द्वारा नेपाल व भारतक सीमा तय कयल गेल । धरि सीमा रेखाक निर्धारण (डिमार्केशन) केर इतिहास एहि समझौता उपरान्त लगभग ५० वर्षक अबधि धरि चलल, से विभिन्न शोधालेखक अध्ययन सँ पता चलैत अछि ।

विगत १ दशक सँ नेपाल-भारत सीमा विवाद किछु बेसिये चर्चा मे रहबाक कारण आइ ‘मैथिली जिन्दाबाद’ पर प्रकाशनार्थ ई लेख लिखि रहल छी । अफसोसक बात पहिने कहि दी – वर्तमान मीडिया चाहे नेपाल हो, चाहे भारत – बहुत आधा-अधूरा तथ्य-कथ्य पर आधारित समाचार छापि देल करैछ । ओहि मे नहिये पूर्ण सत्यता रहैछ, आ न विश्वसनीयता । जेकरा जेहेन स्रोत भेटल, ओ तेहेन समाचार ठोकलक ।

एहेन पत्रकारिता केँ हम त क्षुद्रे कहब, ठीक जेना नेपाल-भारतक मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध मे फूहड़ सत्तालोलुप राजनीति केर कारण सँ अनेकों विवादास्पद हो-हल्ला मचायल जाइछ, ठीक तहिना पत्रकारिता सेहो अपन-अपन देशक मुताबिक अपने-अपने सुर-तान-तर्ज वला पत्रकारिता ।

यथार्थ सत्य कहैछ जे नेपाल व भारत दुनू देशक बीच समझौता सभक बहुत लम्बा फेहरिश्त (सूची) अछि । सुगौली सन्धि ब्रिटिश इंडिया सँ तत्कालीन शाहवंशीय नेपाली राजाक भेल छल । तद् उपरान्त शाहवंशीय राजा केँ मात्र अलंकारिक राष्ट्रप्रमुख मानि कार्यकारी प्रमुख रूप मे श्री ३ राणा सरकार द्वारा नेपालक राज्य-व्यवस्था हाथ मे लेल गेल । पुनः राणाकालीन शासन संग विभिन्न समझौता ब्रिटिश इंडिया सरकार कयलक ।

जखन १९४७ ई. मे भारत केँ अंग्रेजी उपनिवेशवादी शासक सँ मुक्ति भेटल, यानि भारत एक गोट स्वतंत्र राष्ट्र रूप मे भारतीय शासक केर हाथ मे आबि गेल, तदोपरान्त भारतक शासकीय स्वरूप आ राजकीय व्यवस्था लेल संविधान सभा द्वारा संविधान बनबैत २६ जनवरी १९५० ई. केँ भारतीय गणराज्य (Republic of India) केर गठन भेल । तहिया सँ स्वतंत्र भारत अपन संवैधानिक विधिक शासन पर चलैत अछि । संघीय सरकार व राज्य सरकारक अवधारणा अनुरूप आजुक ‘भारत’ ठाढ़ अछि ।

लगभग ५५० गोट ‘रियासत’ (Princely States) जेकरा सब केँ ब्रिटिश भारत सरकार द्वारा ब्रिटिश सम्राज्य प्रति ‘सर्वोपरिताक सिद्धान्त’ (Doctrine of Paramountcy) स्वेच्छा अथवा जबर्दस्ती मनबाकय ‘ब्रिटिश भारत’ पर आनल गेल छल । वैह ब्रिटिश भारत द्वारा १८१४-१६ ई. ‘ब्रिटिश-गोरखा युद्ध’ (Anglo-Gorkha War) केर समझौता ‘सुगौली सन्धि’ कहायल आ एकरे द्वारा तय कयल गेल सीमा केँ नेपाल-भारत बीचक अन्तर्राष्ट्रीय सीमा मानि लेल गेल अछि ।

जेना भारत मे ५५० गोट रियासत, किछु तहिना नेपालक इतिहास द्वारा वर्णित २२-राज्य, २४-राज्यक स्थिति जेकरा एकीकृत करबाक श्रेय गोरखा राजा पृथ्वी नारायण शाह केँ देल गेल अछि । पृथ्वी नारायण शाह उपरान्त हुनक सुपुत्र व सिपहसलार लोकनि नेपालक सीमा विस्तार लेल अनेकों युद्ध व अभियान केँ निरन्तरता प्रदान कयलनि ।

नेपालक राजा द्वारा अपन सैन्य बल केर उपयोग करैत एकटा ‘छोट राज्य गोरखा’ सँ सीमा बढ़बैत कतय पंजाब केर सतलज धरि आ एम्हर पूब मे तिस्ता धरि सीमा विस्तार कयल गेल । मुदा दक्षिणी तराई भूभाग मे सघन वन ओ नदी सभक जल केर छितरायल रहल भौगोलिक स्थिति, ताहि मे रहल आबादी सब केँ मुगलकालहि सँ ‘मुगलान कर’ देबाक अवस्था, तेकर विरोध मे गोरखा राजाक नियुक्त कयल भरदार सब द्वारा जोर-जबर्दस्तीक कथा – एकीकृत ‘नेपाल’ मे मिलेबाक प्रयत्न, एकर विरोध आ समर्थनक द्वन्द्व सभक स्थिति – ई सब इतिहास विद्यमान रहल ।

आखिरकार नेपाली राजाक सीमा विस्तार अभियान केँ रोकबाक लेल ब्रिटिश गोरखा युद्ध भेल आ परिणाम सुगौली सन्धि । ४ मार्च १८१६ द्वारा निर्धारित सीमा सँ नेपाली राजाक असन्तुष्टि, तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारी संग बेर-बेर आग्रह आ पुनः ब्रिटिश अधिकारी द्वारा ब्रिटिश इंडिया अन्तर्गत समझौता कएने सारण व तिरहुत क्षेत्रक अधिकार केँ कटौती करैत ९ दिसम्बर १८१६ केँ कोसी सँ गंडक बीचक तराई केर नेपाली राजा केँ हस्तान्तरण – एहि सभक विशद् इतिहास अछि ।

फेर नेपाल मे श्री ३ सरकार यानि राणा शासनक आविर्भाव, राणा शासक द्वारा अंग्रेज संग मित्रता, १८५७ ई. भारतक लखनऊ सँ सिपाही विद्रोह आ तेकर दमन करय मे नेपालक गोरखा सैन्यबलक ब्रिटिश भारत सरकार द्वारा उपयोग, १८६०-१८६५ बीच नेपाल-भारत सीमारेखा निर्धारणक अभियान – बँटवारा लेल तत्कालीन जमीन सर्वे प्रविधिक उपयोग, सेन्टर प्वाइन्ट आ प्राकृतिक जलबहाव (नदी) केँ सीमा निर्धारण करबाक ‘आधारविन्दु’, विभिन्न समयान्तराल मे जलबहावक स्थान-परिवर्तन (change in course of river flow) आदिक कारण ‘सीमा विवाद’ (border dispute) केर दुरावस्था सँ दुनू देश रूबरू होइत रहबाक यथास्थिति अछि ।

१९५० केर सन्धिक महत्व

ब्रिटिश भारत द्वारा कयल गेल समझौता आ स्वतंत्र भारत द्वारा कयल गेल समझौता – दुनूक तुलना कयला सँ नेपाल-भारतक स्थिति आर फरिच्छ होइत अछि । ९ दिसम्बर १८१६ केँ सुगौली सन्धि द्वारा प्रदत्त तराई भूभाग सहित सीमा सन्दर्भ मे भारत द्वारा नेपालक पूर्व-निर्धारित सीमा केँ मान्यता देल गेल अछि । लेकिन एकटा अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय ई अछि जे तहिया भारत नेपाल-तिब्बत केर सीमा धरि अपन सैन्य सुरक्षा बल रखबाक अधिकार सेहो लय लेलक, जे बाद मे नेपालक राजा महेन्द्रक असन्तोष आ विरोधक बाद १९६० ई. केर आसपास बदलल गेल । भारतक सैन्यबल केँ नेपाल-तिब्बत केर सीमा-रेखा सँ पाछू हंटय पड़ल । मुदा कालापानी एरिया मे ‘शारदा’ नदीक जाहि मुहान केँ ताहि समय मानिकय लिम्पियाधुरा, लिपुलेख व कालापानी क्षेत्र केँ भारत अपन क्षेत्र मानलक तेकर विरोध बहुत बाद लगभग १९९५ ई. मे नेपालक गोटेक राजनीतिक दल द्वारा आरम्भ कयल जेबाक यथासत्य अछि ।

एतय सवाल उठैछ जे राजा महेन्द्र द्वारा भारतीय सैन्यबल केँ नेपाल-तिब्बत सीमारेखा सँ हंटा लेबाक अनुरोध पर भारत जखन अपन सैन्यबल केँ हंटा लेलक, तत्कालीन समय शारदा नदी (महाकाली) केर पच्छिम मे अपन सैन्य कैम्प राखलक, त ताहि समय राजा महेन्द्र लिम्पियाधुरा, लिपुलेख व कालापानी सहितक भूभाग पर नेपालक दावी कयलनि वा नहि ? ताहि समयक कोनो प्रामाणिक अभिलेख वर्तमान मे नेपाल लग अछि वा नहि ?

जँ अछि, त नेपालक दावी जायज बनैछ । जँ नहि, त ई केवल नेपाल-भारत बीच कटुता उत्पन्न कय नेपालक बदलल राजनीतिक परिवेश यानि नेपाली राजतंत्रक अन्तोपरान्त लागू बहुदलीय प्रजातंत्र मे भारत विरोधी भावना केँ भड़केबाक आ ताहि बल सँ नेपालक सत्ता पर काबिज रहबाक एकटा तुरुप केर एक्का मात्र थिक, एहि तरहक सीमा-विवाद मे कोनो दम नहि अछि ।

आब आउ कूटनीति व रणनीतिक समझौता आ सहमतिक आगामी आयाम पर

नेपाल आ भारत बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध मे खटासक इतिहास सेहो आब लगभग ६५ वर्ष पुरि गेल कहि सकैत छी । चीन-भारत युद्ध आ चीन संग नेपालक नजदीकी एहि मित्रता मे ‘जहर’ घोरबाक काज कयलक से स्पष्ट अछि । नेपालक राजा त्रिभुवन बारे कहल जाइछ जे ई भारत सँ नेपाल केँ अपना मे मिला लेबाक आग्रह नेहरूजी सँ कएने रहथि, परञ्च नेपाल भारत-चीन बीच एकटा बफर स्टेट केर रणनीतिक काज करत, संगहि ई एकमात्र हिन्दूराष्ट्र रूप मे हिन्दू धर्मावलम्बी लेल प्रतिष्ठाक विषय रहत, एहि सब तरहक भाष्यक कारण नेपाल केँ भारत मे नहि मिलायल जेबाक तथ्य सब इतिहासकार लोकनि वर्णन करैत छथि ।

भारत संग राजनयिक सम्बन्ध मे राजा महेन्द्रक कार्यकालहि सँ मतान्तर स्पष्ट भेल । बहुत बाद मे राजा विरेन्द्रक कार्यकाल मे भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गाँधीक समय १९८७-८८ मे फेर नेपाल-चीन नजदीकी आ चीन द्वारा नेपाल धरि सड़क निर्माण एवं शान्ति-मैत्री समझौताक मर्म जे नेपाल कोनो हथियार आदिक क्रय करत त भारत सँ या भारतक सहमति सँ आन राष्ट्र सँ करत, तेकर विपरीत नेपाल द्वारा किछु हथियार चीन सँ बिना भारत केँ जानकारी देने कीनबाक कारण ‘भारत द्वारा आर्थिक नाकाबन्दी’ केर घोषणा १९८९ मे भेल छल ।

नेपाल एक भू-परिवेष्ठित राष्ट्र रहबाक कारण एहि नाकाबन्दी सँ काफी परेशान सेहो भेल छल । मात्र दुइ गोट अन्तर्राष्ट्रीय नाका आ केवल एक गोट समुद्री बन्दरगाह सँ जोड़यवला पारगमन मार्गक सुविधा सँ नेपाली आम जनता केँ नून आ मटियातेल तक उपलब्ध नहि भ’ पबैत छल । एहि कारण नेपाल मे राजनीतिक आन्दोलन भड़कल आ पंचायती व्यवस्था वला राजतंत्रक अधिकार सिमटिकय ‘बहुदल प्रजातंत्र एवं राजतांत्रिक प्रजातंत्रक नया संविधान २०४७ वि. सं. साल’ अनुसार नेपालक राज्य व्यवस्था आगू बढ़ल ।

बाद मे भारत द्वारा नेपाल केँ मोस्ट फेवर्ड नेशन केर दर्जा समेत दय केँ नेपाली उत्पादन लेल भारतीय बाजारक विशाल-वृहत् क्षेत्र खोलि देल गेल, कोनो सीमा शुल्क नहि, मात्र एक्साइज ड्यूटी जेहेन काउन्टरवेलिंग ड्यूटी एक भारतीय उत्पादक जेकाँ भुगतान कय केँ सुविधायुक्त बाजार-विस्तार पेबाक अद्भुत उदाहरण ठाढ़ भेल आ एहि नेपाल-भारत व्यापार एवं पारवहन समझौता (ट्रीटी अफ ट्रेड एन्ड ट्रान्जिट) केर प्रत्युत्पादन सँ नेपाल मे जबर्दस्त औद्योगिक क्रान्ति १९९१ ई. उपरान्त भेल छल । ई सुविधा आइ धरि कायम अछि ।

मात्र राजनीतिक लाभ लेल नेपाल-भारत सम्बन्ध मे अनावश्यक खींचातानी

स्पष्ट कि अछि जे नेपाल-भारत सम्बन्ध आइ के नहि, ई अत्यन्त प्राचीनकाल सँ चलैत आबि रहल अछि । लेकिन राजनीतिक कारण सँ विभिन्न मत-विचार वला लोक एहि दुइ राष्ट्रक प्राकृतिक मित्रताक विरूद्ध अपन शासन-नीति आ उपद्रवी मानसिकता सँ भारत विरोधी भावना भड़का-भड़का केवल अपन राजनीतिक स्वार्थ पूरा करैछ, धरि देशहित मे ओ किछु नहि कय पबैछ । बेर-बेर ई मानसिकता गद्दी पर जाइछ, आ पुनः मुँहें भ’रे खसैछ । देशक कोनो हित भारत केँ दुःखी कय नहि पाबि सकैछ, कारण एतुका अर्थतंत्र लगभग ८०% भारतहि पर निर्भर अछि । भारतक नीति एकर हितपोषण लेल नहि रहैछ, त स्वाभाविक तौर पर शासक कुर्सी पर जाइतो कुर्सीविहीन निरीह प्राणी जेकाँ कछमछ-कछमछ करैत अपन समय खेपि लैत अछि । नेपाली जनता एहि कारण त्रस्त रहैछ ।

एक दिश कूटनीतिक आ विज्ञ लोकनिक वार्ता – दोसर दिश अराजक राजनीतिक निर्णयक दुरावस्था

नेपाल-भारत बीचक अनेकों संयंत्र द्वारा द्विपक्षीय मुद्दा आ सरोकार सभक सूचीकरण कयल गेल अछि । एहि तरहक सूची मे ‘सीमा विवाद’ आ ताहि सीमा विवाद मे कालापानी, लिपुलेख व लिम्पियाधुरा सहित सुस्ता आदिक संग शताधिक स्थान पर ‘विवाद’ दुनू पक्ष स्वीकार कएने अछि ।

हालहि भारत मे नरेन्द्र मोदीक अगुवाई मे २०१४ मे एनडीए सरकार बनलाक तुरन्त बाद ‘नेवर फर्स्ट’ फौरेन पालिसी अनुरूप नेपाल-भारतक विभिन्न मुद्दा व सरोकार जेना १९५० केर सन्धिक पुनरावलोकन, दुइपक्षीय स्थितिक समीक्षा लेल प्रबुद्धजनक समूह केर निर्माण, सीमा विवाद समाधान लेल विज्ञजनक संयुक्त टोलीक सर्वे व अध्ययन आदिक संगहि विभिन्न समझौता सब भेल ।

लेकिन नेपाल मे विद्यमान मधेश केन्द्रित आन्दोलनक जिम्मेदारी भारत पर सौंपैत नेपालक एकटा खास शासक वर्ग द्वारा नेपाल-भारत सम्बन्ध केँ ताड़-ताड़ करबाक कोनो कसैर बाकी नहि राखल गेल । २०१५ मे नया संविधान जारी करय सँ पूर्व भारतीय प्रधानमंत्रीक विशेष दूत तत्कालीन विदेश सचिव (वर्तमान विदेश मंत्री) एस. जयशंकर केर नेपाल भ्रमण आ आन्तरिक विवाद (आन्दोलन) केँ सम्बोधन उपरान्त संविधान जारी करबाक अनुरोध केँ पर्यन्त ठुकराबैत भारत पर अघोषित नाकाबन्दीक आरोप मढ़ैत अन्तर्राष्ट्रीय फोरम संयुक्त राष्ट्रसंघ तक भारत संग पंगा लय सँ नहि बचल ओ राजनीतिक शक्ति ।

ई त जे से, एक दिश दुइदेशक समझौता अनुसार सँ सीमा विवाद लेल विज्ञजनक टोली खटिये रहल अछि, ओकर निष्कर्ष हाथ मे एबो नहि कयल, एम्हर मनमानी ढंग सँ नेपालक नक्शा मे संशोधन कय केँ कालापानी, लिपुलेख आ लिम्पियाधुरा केँ नेपाली भूभाग मे जोड़बाक काज कयल गेल जेकर भारत सख्त विरोध कयलक ।

एहेन स्थिति मे द्विपक्षीय वार्ताक कोनो औचित्य सेहो नहि रहि जेबाक व्याख्या अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धक विशेषज्ञ लोकनि कयलनि । त स्थिति सम्हारबाक स्थान पर बिगाड़बाक काज अराजक राजनीतिक सिद्धान्त, सत्तालोलुप राजनीतिक शक्ति सब द्वारा भेल अछि । दुइ प्राकृतिक मित्रक मित्रता केँ यैह शक्ति द्वारा खंडित करबाक दुष्प्रयास एखन धरि चलिये रहल अछि ।

नेपालक नव सरकार एहि मे परिवर्तन आनय, ई अपेक्षा कय सकैत छी ।

हरिः हरः!!

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