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बलिराजगढ़ मे पुरातात्विक उत्खनन सन्दर्भित साहित्यकार डा. महेन्द्र नारायण रामक प्रतिवेदन

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बलिराजगढ परिभ्रमण

– डा. महेन्द्र नारायण राम
बलिराजगढ, बाबूबरही जिला-मधुबनी, बिहार केर खुदाइ ऐतिहासिक ओ पुरातात्विक दृष्टि सं अत्यंत महत्वपूर्ण रहल अछि । मार्च, 2026 मे एकर दोसर चरणक खुदाइ फेर सं आरंभ भेल अछि, जे एहि क्षेत्रक प्राचीन गौरव कें उजागर करबा मे पैघ भूमिका निबहा रहल अछि ।
एकर पुरातात्विक महत्व पर विचार करी तs पबैत छी जे बलिराजगढ, प्राचीन मिथिलाक राजधानीक रूप मे देखल जाइत अछि । एहिठामक खुदाइ सं प्राप्त अवशेष मुख्य रूप सं शुन्ग आ कुषाण कालक इतिहास के प्रकाशित करैत अछि ।
एकर प्रारंभिक खुदाइ सर्वप्रथम 1962-63 आ फेर 1970 केर दशक मे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा सीमित खुदाइ कयल गेल छल । किछु काज 2012 मे सेहो भेल छल ।
2026 मे शुरू भेल नव क्रमक खुदाइक उद्देश्य किलाक देवालक संरचना आ ओहि समयक नागरिक जीवनक बारे मे बेसी स्पष्ट जनतब जुटायब थिक ।
खुदाइक क्रमे एखनधरि महत्वपूर्ण वस्तु सभ भेटल अछि –
*ईंटा सं बनल एक मजगूत आ चौड़ा देवाल, जे प्राचीन रक्षा प्रणालीक प्रमाण अछि
*माटिक बर्तनक रूप मे उत्तरी कारी पालिश वाला मृदभान्डक अवशेष
*ताम्बाक सिक्का, टेराकोटा केर मूर्ति आ मनके (Beads)
*शुंग कालक विशिष्ट मृण्मूर्ति सभ, जे तहियाक वेश-भूषा आ संस्कृति कें दर्शबैत अछि
ई स्थल नहि मात्र मौर्येत्तर कालक इतिहास के बुझबा मे मदति करैत अछि, अपितु ई मिथिलाक प्राचीन शहरी सभ्यताक एक जीवन्त प्रमाण सेहो अछि । एकर खुदाइ मे शुंगकालक विशेष महत्व अछि, कारण एहिठाम सं प्राप्त अवशेष ओहि समयक उन्नत वास्तुकला आ नागरिक जीवनक एक स्पष्ट छवि उपस्थापित करैत अछि । शुंगकालीन स्थापत्य सं युक्त बलिराजगढ सभ सं पैघ विशेषता एतs केर विशाल किला अछि । खुदाइ मे ईंटाक बनल एक विशाल देवाल भेटल अछि जकर चौड़ाइ लगभग 5 मीटर सं बेसी अछि । देवालक निर्माण मे पैघ ईंटाक प्रयोग शुंगकालीन सैन्य स्थापत्यक विलक्षण उदाहरण अछि । ई दर्शबैत अछि जे तहिया ई क्षेत्र सामरिक रूप सं बहुत महत्वपूर्ण छल ।
कला संस्कृतिक पर ध्यान देला सं अभरैत अछि जे एहि कालक सभ सं सुन्दर खोज टेराकोटाक मूर्ति सभ अछि । एहिठाम सं प्राप्त महिला आ पुरूष मूर्ति सभ मे महीन आभूषण, जटिल केश विन्यास आ विशिष्ट वेश-भूषा देखाइ दैत अछि, जे शुंगकालक ”मथुरा” आ “पाटलिपुत्र” शैली सं मेल खाइत अछि ।
कतोक एहन आकृति सभ भेटल अछि जे तत्कालीन लोकदेवता/लोकदेवी आ यक्षिणी सभक पूजा दिस इंगित करैत अछि । वर्तमान खुदाइ केर लक्ष्य दिस जखन देखैत छी तs ई आशान्वित करैत अछि जे ई सुनिश्चित करत जे शुंगकाल सं पहिने (मौर्यकाल) आ ओकर बाद (कुषाणकाल) क अवशेषक मध्य केहेन सम्बंध छल ।
*किलाक भीतर नाला/नाली अथवा सडकक कोनो व्यवस्था छलैक ।
*खुदाइ मे भेटल मनको(Beads) आ सिक्का सं ई जनतब होयत जे बलिराजगढक व्यापार अन्य प्राचीन शहरादि मे केहेन छलैक ।
विद्वान लोकनिक मानब अछि जे ई स्थल प्राचीन मिथिलाक केन्द्र मे स्थित होयबाक कारणे नहि मात्र एक प्रशासनिक केन्द्र छल अपितु कला आ शिक्षाक सेहो केन्द्र रहल हयत । शुंगकालक क्रमे जखन मगध मे शुंग वंशक शासन छल, तखन ई क्षेत्र सांस्कृतिक गतिविधि मे समृद्ध छल ।
एखन धरि बलिराजगढ मे प्राप्त कलाकृति सभ नहि मात्र कलाक नमूना अछि अपितु तहियाक समाज आ जीवनशैलीक “दस्तावेजीकरण” सेहो करैत अछि –
*एहिठाम सं भेटल महिला मूर्ति सभ मे अत्यधिक महीन आभूषण जेना कुंडल, हार आ मेखला तहियाक सौंदर्यबोधक अनुभूति करबैत अछि ।
*किछू मूर्ति सभ मे वेशभूषा आ बनावटि मे मध्य एशियाक प्रभाव सेहो देखाइ दैत अछि जे कुषाणकालक संक्रमण कें दर्शाबैत अछि ।
*खुदाइ मे भेटल माटिक छोट गाडी सभ, पशु जेना हाथी, वरद आ सीटीसभ अछि जे तहियाक बच्चा सभक मनोरंजनक साधन कें बतबैत अछि ।
*एतsसं विभिन्न तरहक कीमती आ अर्द्ध कीमती पाथर सं बनल मनके भेटल जे अगेट, कार्नेलियन आ जैस्पर जेहन पाथरक प्रयोग कयल गेल अछि ।
*मनका पर कयल गेल नक्काशी आ ओकर फिनिशिंग ई बतबैत अछि जे तहिया एक विकसित “बीड मेकिंग” उद्योग रहल हयत ।
*खुदाइ मे आहत सिक्का आ ताम्बाक सिक्का भेटल अछि जाहि पर सूर्य, गाछ आ मांछ जेहन चेन्ह बनल अछि । ई एहि बातक प्रमाण अछि जे बलिराजगढ गढ एक सक्रिय व्यापारिक केन्द्र छल ।
एहिठाम ई जनतब देब आब आवश्यक बुझाइत ई अछि जे हमर गाम खुटौना छी । खुटौनाक नामकरण पर सोचैत छी तs ई सोझा अबैत अछि जे व्यापारी लोकनि अपन-अपन टायरगाड़ी, बैलगाड़ी मे दलहन, तेलहन, चाउर, गहुम आदि लादिकय क्रय-विक्रय हेतु केन्द्र पर जयबाक क्रमे राति बीतेबाक क्रमे एहिठाम खट्टा गाड़ी छल । वरद-पशु सभके बान्हैत छल आ एहि क्रमे खुटौना नाम पडि गेल । एहिठाम सं सटल गाम मे कौल्ह मे तेल पेड़ल जाइत छल जे कोल्हट्टा नामे अभिहित भेल । तहिना गाडी मे अन्नादि लाधल जाइत छल जकर नाम लदनिया पडि गेल । एहन तरहक कतोक उदारहण एहि परिक्षेत्र मे अछि । ई तारतम्य बलिराजगढ सं मेल खाइत अछि ।
*एतs भेटल उत्तरी कारी पालिश वाला वर्तन प्राचीन भारतक धातु विग्यान आ लेपन तकनीकक श्रेष्ठता कें प्रमाणित करैत अछि ।
संक्षेप मे ई स्पष्ट कहबा मे अशोकर्य नहि जे बलिराजगढ प्राचीन मिथिलाक राजधानी छल ।
प्रोफेसर श्रवण कुमार, प्राचार्य, गान्धी अम्बेडकर जनता महाविद्यालय, तोरियाही संग शनिदिन बलिराजगढक परिभ्रमण कयलहुं । जनतब भेल जे खुदाइ क्रमे भेटल किछु सामग्रीक चोरी भs गेलैक अछि । एहन महत्वपूर्ण काजक सुरक्षा मात्र दू गोट चौकीदारक माध्यमे नहि संभव थिक । एहि लेल विशेष व्यवस्थाक आवश्यकता अछि । जखन हमसभ गेल छलहुं तs देखल जे दू-तीनटा पुलिस गाड़ी कैम्पस सं निकलि रहल अछि ।जनतब भेल जे प्रखंड स्तरीय पदाधिकारीक संग जिला पुलिस अधीक्षक सभ छलाह जे एकर सुरक्षा व्यवस्थापरक विमर्श लेल आयल छलाह । शायद इएह कारण छल जे हमरा एहिठाम छवि लेला सं रोकल गेल मुदा जखन हम अपन परिचय एक लेखक रूपेँ देलियनि आ ई कहलियनि जे हमरो काज अहींक सभक जकां एहि पर किछु लिखब अछि तs उपस्थित आरक्षी द्वारा छवि लेबाक अनुमति देलनि ।

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