सत्चिन्तनः दुर्गापाठ केर लोक-प्रासंगिकता
(सन्दर्भ उत्तर चरित्र – महासरस्वतीक प्रीति-प्रसन्नता लेल सत्चिन्तन)
असुर सभक उत्पात बढ़ि गेला पर देवलोक मे हड़कम्प मचि जाइछ । एहिना भेल छल जखन शुम्भ आ निशुम्भ नाम्ना दुइ असुर केर प्रकोप बढ़ि गेल । इन्द्रक गद्दी छिना गेलनि । इन्द्रक हाथ सँ तीनू लोकक राज्य आ यज्ञभाग छिना गेलनि । सूर्य, चन्द्रमा, कुबेर, यम आ वरुण केर अधिकारक सेहो उपयोग शुम्भ-निशुम्भ नाम्ना दानव करय लागल । वायु ओ अग्निक कार्य सेहो वैह दुनू असुर करय लागल । यैह दुनू सब देवता लोकनि केँ अपमानित, राज्यभ्रष्ट, पराजित तथा अधिकारहीन कय केँ स्वर्ग सँ निकालि देलक । एहि दुनू महान् असुर सँ तिरस्कृत देवता सब अपराजिता देवी केँ स्मरण कयलनि आ सोचलनि जे जगदम्बा हमरा सब केँ वरदान देने रहथि जे आपत्तिकाल मे स्मरण कयला पर हम अहाँ सभक आपत्ति केँ तत्काल नाश कय देब ।
“तयास्माकं वरो दत्तो यथाऽऽपत्सु स्मृताखिलाः ॥
भवतां नाशयिष्यामि तत्क्षणात्परमापदः ॥”
आर यैह विचारिकय देवता सब गिरिराज हिमालयपर गेलाह आ ओतय भगवती विष्णुमायाक स्तुति करय लगलाह –
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ॥
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥१॥
रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः ॥
ज्योत्सनायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमः ॥२॥
कल्याण्यै प्रणतां वृद्धयै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः ॥
नैर्ऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः ॥३॥
दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै ॥
ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः ॥४॥
अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः ॥
नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः ॥५॥
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥६॥
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥७॥
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥८॥
या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥९॥
या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥१०॥
या देवी सर्वभूतेषुच्छायारूपेण संस्थिता ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥११॥
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥१२॥
या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥१३॥
या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥१४॥
या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥१५॥
या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥१६॥
या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥१७॥
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥१८॥
या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥१९॥
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥२०॥
या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥२१॥
या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥२२॥
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥२३॥
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥२४॥
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥२५॥
या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता ॥
नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥२६॥
इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या ॥
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नमः ॥२७॥
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद् व्याप्य स्थिता जगत् ॥
नमस्तस्ये ! नमस्तस्यै ! नमस्तस्यै नमो नमः ॥२८॥
स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता ॥
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः ॥२९॥
या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितैरस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते ॥
या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः सर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिः ॥३०॥
देवता लोकनिक एहि स्तुतिक समय पार्वती देवी गंगाजीक जल मे स्नान करय ओतय अयलिह आ देवता सब सँ पुछलनि जे अहाँ लोकनि एतय किनकर स्तुति कय रहल छी ? तखन हुनकहि शरीरकोश सँ प्रकट भेली शिवादेवी । ओ बतेलनि जे ई देवता सब शुम्भ दैत्य सँ तिरस्कृत तथा युद्ध मे निशुम्भ सँ पराजित भ’ एतय एकत्रित भेल ई सब देवता हमरहि स्तुति कय रहल छथि ।
‘स्तोत्रं ममैतत् क्रियते शुम्भदैत्यनिराकृतैः ॥
देवैः समेतैः समरे निशुम्भेन पराजितैः ॥’
मार्कण्डेय ऋषि वर्णन करैत महादुर्गाक उत्तरचरित्र (दुर्गा सप्तशती, पाँचम अध्याय) मे ई वर्णन करैत कहने छथि । पार्वतीक शरीरकोश सँ उत्पन्न भेलि देवी केँ ‘कौशिकी’ सेहो कहल जाइत छन्हि । कौशिकीक प्रकट भेला उपरान्त पार्वतीदेवीक शरीर कारी रंगक भ’ गेलनि, तेँ हिमालय पर रहयवाली ‘कालिकादेवी’ नाम सँ सेहो विख्यात भेलिह । आर एतहि सँ आरम्भ होइछ शुम्भ-निशुम्भ जेहेन दुर्दान्त दैत्यक अन्तक गाथा ।
आब कनेक आबि जाउ अपन-अपन जीवन यात्रा मे । देखिते होयब जे ‘उत्पात’ आ ‘आपत्ति’ केर कतहु कमी नहि अछि हमर-अहाँक जीवन यात्रा मे । हमरा लोकनिक पुराण सब मे जे कोनो कथा वर्णित अछि से केवल मानवीय जीवन मे होयबला घटनाक्रम सँ जुड़ल विषय-वस्तु पर आधारित अछि । वर्णन करबाक शैली भले दैविक चरित्र आ ताहि मे अनेकों बात चमत्कारिक ढंग सँ घटित होइत देखायल जाय, सामान्य जनजीवन मे सेहो आंशिक रूप सँ वैह प्रसंग जुड़ैत अछि ।
एहेन नहि छैक जे शुम्भ-निशुम्भ हमरा-अहाँ आजू-बाजू नहि अछि । आसुरिक चरित्र जँ स्वयं मे हो, ओहो शुम्भ-निशुम्भ समान अछि जे हमरा सभक दैवीय गुण केँ अपहरण करैछ । ओकरा संहार करय मे जँ हम सब स्वयं सक्षम नहि भ’ सकब, यानि पराजित आ तिरस्कृत अबस्था मे रहब; त स्वाभाविक छैक जे शक्तिदात्री भवानी केँ मोन पाड़ब । आर स्तुतिगानक अर्थ होइछ मन, वचन आ कर्म (mind, speech and action) सँ सर्वश्रेष्ठ शक्तिशाली केर विभिन्न श्रेष्ठ सँ श्रेष्ठतम् उदाहरण केँ बेर-बेर वाचन-स्मरण करब । ई सनातन परम्परा रहि आयल हँ । हिन्दू धर्मावलम्बीक वेद, पुराण, शास्त्र, आदिक यैह सार्थक-सकारात्मक अभीष्ट रहल जे लोक श्रेष्ठ गुण ओ आचरण केँ स्मरण करैत स्वयं मे ओ शक्ति स्थापित करय जाहि सँ ओकर आसुरिकता (दुर्गुण) सब मारल जेतैक, आर आनन्द सँ भरिकय ओ विजयादशमी हर क्षण मनबैत रहत ।
अस्तु, लौकिकता मे पारलौकिकताक अनुभूति लेल निरन्तर साधना जरूरी छैक । तेँ दुर्गापाठ केर विशेष महत्व छैक ।
हरिः हरः!!
