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साधनाक साधन उपलब्ध रहितो समाधान नहि निकालि सकब हमरा लोकनिक दुर्भाग्य मात्र थिक

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आध्यात्मिक चिन्तन

– प्रवीण नारायण चौधरी

सत्चिन्तनः माता दुर्गाक तीन चरित्रक विनियोग आ मानव जीवन

आउ, आइ फेर किछु महत्वपूर्ण आध्यात्मिक चिन्तन आ मिथिलाक शाक्ता-साधना परम्परा मे दुर्गा पाठक महत्व पर चर्चा करी । ध्यान दियौक तीन विनियोग परः

प्रथम चरित्र –

ॐ प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, महाकाली देवता, गायत्री छन्दः, नन्दा शक्तिः, रक्तदन्तिका बीजम्, अग्निस्तत्त्वम्, ऋग्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहाकालीप्रीत्यर्थे प्रथमचरित्रजपे विनियोगः ।

मध्यम चरित्र –

ॐ मध्यमचरित्रस्य विष्णुर्ऋषिः, महालक्ष्मीर्देवता, उष्णिक् छन्दः, शाकम्भरी शक्तिः, दुर्गा बीजम्, वायुस्तत्त्वम्, यजुर्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहालाक्ष्मीप्रीत्यर्थं मध्यमचरित्रजपे विनियोगः ।

उत्तर चरित्र –

ॐ अस्य श्रीउत्तरचरित्रस्य रुद्र ऋषिः, महासरस्वती देवता, अनुष्टुप् छन्दः, भीमा शक्तिः, भ्रामरी बीजम्, सूर्यस्तत्त्वम्, सामवेदः स्वरूपम्, महासरस्वतीप्रीत्यर्थे उत्तरचरित्रपाठे विनियोगः ।

उपरोक्त ३ गोट ‘विनियोग’ केँ खुब ध्यान सँ पढ़ू-देखू-बुझू । सब सँ पहिने विनियोग केर अर्थ बुझब आवश्यक अछि हमरा-अहाँ लेल । विद्वान् सब विनियोग केर परिभाषा ‘काज मे आनब’ कहलनि अछि, अर्थात् ‘उपयोग’ मे अननाय विनियोग कहाइछ । ‘ॐ’ केर संग भगवतीक उपरोक्त तीनू चरित्रक उपयोग करबाक लेल साधक केँ निर्देशन देल गेल अछि । ‘ॐ’ मानू एकटा ‘बाण’ थिक जाहि पर अहाँ अपन ध्वनि अथवा मनक गति सँ कोनो मंत्र केँ चढ़ाकय सीधा लक्षित ईश्वर केर चरण मे पहुँचाबैत छी । एतय ३ गोट विनियोग मे भगवतीक ३ गोट रूप – महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वतीक आराधना निहित अछि ।

विनियोग केँ आधुनिक समय मे ‘निवेश’ (investment) कहल जाइछ । उत्पादकता केँ बढ़ेबाक वास्ते निवेश केर जरूरत होइछ । आन्तरिक निवेश या बाहरी (वैदेशिक) निवेश सँ जेना कोनो देशक अर्थतंत्र मे इजाफा आनल जाइछ, तहिना वैदिक मंत्र केर विनियोग सँ आत्मीय कल्याणक मार्ग प्रशस्त कयल जाइछ । आजुक समय हम-सब वैदिक कथ्य-तथ्य सँ बहुत दूर आधुनिक शिक्षा पद्धति मे सराबोर भ’ गेल छी, चूँकि व्यवस्थे ताहि तरहक बनि गेल अछि, तेँ खाली टकाक विनियोग, भौतिक विनियोग, आदिक बात मात्र बुझि सब गोटे भौतिकतावाद मे ओझरा गेल छी । जखन कि अनादिकाल सँ उपलब्द वैदिक निर्देशन मे विनियोग केर बड पैघ तात्त्विक विवेचना सहित मानव (साधक) लेल सुन्दर मार्गदर्शन कयल गेल अछि ।

दुर्गा सप्तशती मे भगवतीक कुल ३ स्वरूपक चिन्तन-मनन हेतु उपरोक्त ३ गोट चरित्रक विनियोग निहित अछि । तहिना रामरक्षास्तोत्र मे सेहो विनियोग भेटैछ –

“ॐ अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषि: श्रीसीतारामचन्द्रो देवता अनुष्टुप् छन्द: सीताशक्ति: श्रीमान् हनुमान् कीलकं श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोग: ।”

ॐ केर उच्चारणक संग एहि श्रीरामरक्षास्तोत्रम् केर विनियोग अछि ।

एखन हम सब भगवती महादुर्गाक तीन स्वरूप मे जे विनियोग करैत छी ताहि पर केन्द्रित होइ ।

भगवतीक उपरोक्त तीन चरित्रक ऋषि लोकनि क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु आ रुद्र (त्रिदेव) स्वयं छथि । यानि हुनका लोकनि केँ जे-जे मंत्र भगवतीक स्वरूप (भिन्न-चरित्र प्रस्तोता रूप मे) अभरलनि, तेँ हुनका ऋषि यानि मंत्र द्रष्टा रूप मे कहल गेल छन्हि । नियम सँ ऋषिक नाम लैत समय हमरा लोकनि केँ अपन मस्तक (ललाट) केँ छूबि ऋषि प्रति सम्मानक भाव मे अयबाक चाही, धन्यवाद-कृतज्ञता ज्ञापित करबाक सिद्धान्त यैह अछि जे ‘हे ऋषि, धन्य अहाँ छी जे एतेक शक्तिशाली मंत्र’ हमरा सब केँ भगवतीक आराधना लेल प्राप्त भेल ।

आर गौर करू । प्रत्येक विनियोग मे द्रष्टा ऋषिक अतिरिक्त ‘देवता’, ‘छन्द’, ‘शक्ति’, ‘बीज’, ‘तत्त्व’, ‘वेद स्वरूप’ आदिक संग लक्षित देवताक प्रसन्नताक उल्लेख रहैछ । ‘कीलक’ केर उल्लेख सेहो भेटैछ, यथा रामरक्षास्तोत्र मे हनुमानजी केँ कीलक कहल गेल छन्हि । कीलक यानि कील, काँटी । अपन आराधना-साधना मे विनियोग करैत समय ‘केन्द्र’ रूप मानि ओहि सँ बँधायल अपन स्तुति – मंत्रजाप करैत रहब अछि ।

महादुर्गाक प्रथम चरित्र मे द्रष्टा ऋषि ब्रह्मा, महाकाली देवता, गायत्री छन्द, नन्दा शक्ति, रक्तदन्तिका बीज, अग्नि तत्त्व, ऋग्वेद स्वरूप आ महाकाली केर प्रसन्नता हेतु हम भक्त-साधक प्रथम अध्याय केर पाठ केर विनियोग (उपयोग) करैत छी ।

महादुर्गाक दोसर चरित्र मे द्रष्टा ऋषि विष्णु, महालक्ष्मी देवता, उष्णिक छन्द, शाकम्भरी शक्ति, दुर्गा बीज, वायु तत्त्व, यजुर्वेद स्वरूप आ महालक्ष्मी केर प्रसन्नता हेतु हम भक्त-साधक दोसर, तेसर आ चारिम अध्याय केर पाठ केर विनियोग (उपयोग) करैत छी ।

महादुर्गाक तेसर चरित्र मे द्रष्टा ऋषि रुद्र, महासरस्वती देवता, अनुष्टुप् छन्द, भीमा शक्ति, भ्रामरी बीज, सूर्य तत्त्व, सामवेद स्वरूप आ महासरस्वतीक प्रसन्नता हेतु हम भक्त-साधक पाँचम, छठम, सातम, आठम, नवम, दसम आ एगारहम अध्यायक पाठ केर विनियोग (उपयोग) करैत छी ।

तदोपरान्त उपसंहार (epilogue/conclusion) यानि तीनू चरित्र केर अध्ययन (पाठ) केर विनियोग करबाक ‘सारतत्त्व’ कि भेटैछ, ताहि पर मनन करबाक लेल बारहम अध्याय केर पाठ करैत स्वयं केँ बुझबैत छी । अपन आस्था केँ बढ़बैत भगवतीक आशीर्वाद भेटबाक प्रति आश्वस्त होइत छी ।

फेर अन्तिम यानि तेरहम अध्याय मे हम सब प्रथम चरित्रक चर्चा सँ अभरल दुइ आस्थावान् जिज्ञासु राजा सूरथ आ वैश्य जे अपन पत्नी, सन्तान, परिजन एवं हित-मित सँ पीड़ित भ’ ऋषि मार्कण्डेय केर सान्निध्य प्राप्त करैत अपन बदहाली प्रति जिज्ञासा रखलनि आ ताहि अनुसारे ई तीन चरित्रक ‘दुर्गा सप्तशती पाठ’ केर ‘सारतत्त्व’ भेटल, तिनका सब केँ भगवती द्वारा आशीर्वाद-वरदान देबाक वर्णन पढ़ैत छी । यैह थिक ‘दुर्गा पाठ’ ।

आजुक संसार मे हम सब घोर निराशा आ नैराश्यताक पीड़ा-अग्नि मे झरकल रहबाक नियति भोगि रहल छी । एतबो समय नहि निकालि पबैत छी जे अपन वैदिक निर्देशन अनुसार जीवनचर्या सुधारि सकी । तखन ई निस्तुकी बुझू जे हम-अहाँ अपन दुर्भाग्य केँ अपने सँ आमंत्रित करैत छी । समाधानक उपाय ‘साधनारूपी साधनक’ व्यवस्था रहितो अपनहिं अनावश्यक बुधियारी मे पीड़ित भेल मंडराइते-मंडराइते जीवनक अनमोल क्षण नाश करैत रहैत छी ।

हरिः हरः!!

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