दुर्गा पाठ आ वर्तमान जीवन पद्धति
एखन विश्वयुद्धक माहौल देखाइछ । हमरा सभक धर्मशास्त्र मे सेहो युद्धक वर्णन होइत पढ़ैत-गुनैत रहबाक यथास्थिति सँ सब परिचिते छी । युद्धहि केर विम्ब पर आधारित एकटा संछिप्त चर्चा करबाक इच्छा भेल । दुर्गा सप्तशतीक विशेष स्वाध्यायक क्षण मे आइ तेसर अध्याय सँ जे अभरल से देखू, पढ़ू आ गुनय जाउ ।
गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम् ॥
मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः ॥
ई उक्ति ताहि क्षणक छी जखन महिषासुर जेहेन दुर्दान्त राक्षस देवि महालक्ष्मी संग युद्ध कय रहल छल, क्षणे महींस त क्षणे सिंह, क्षणे नररूप त क्षणे गजराज – अत्यन्त मायावी राक्षस जतबे माया पसारय मे माहिर ततबे अस्त्र-शस्त्र चलाबय मे माहिर; लेकिन भगवती ‘सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते’ – ब्रह्मा, विष्णु, महेश संगहि सम्पूर्ण ३३ कोटि देवताक शक्ति समुच्चय सँ लैश रहथि आ असुरक सारा आसुरिकता केँ सूरतापूर्वक काटय मे सक्षम रहथि । तेँ मार्कण्डेय पुराण सँ उद्धृत ई दुर्गा सप्तशतीक तेसर अध्याय मे वर्णित ‘युद्ध’ केर ओ वाक्य थिक जाहि मे भगवती मधुपान करैत छथि, राक्षसक सारा सेनापति व असुरगण केँ कचैर चुकल छथि आ अन्त मे महिषासुर केर सबटा नौटंकी – माया – अस्त्र-शस्त्र आ पर्वत-वृक्षादिक अस्त्ररूप मे प्रयोग केँ ध्वस्त करैत आखिरी मे ओकर गर्जना उपर हँसैत – लड़खड़ाइ बोली सँ विहुँसिकय कहैत छथि –
“ओ मूढ़ ! जाधरि हम मधु पिबैत छी, ताधरि तूँ क्षणभरि लेल खूब गर्जना कय ले । हमरा हाथ सँ तोहर मृत्यु भेलापर आब जल्दिये देवता सब सेहो गर्जना करता ।”
कनेक वर्तमान मे आउ । लौकिक आचरण आ व्यवहार सब देखू । तादात्म्य बैसाउ । युद्धक स्थिति एखनहुँ चौतरफी देखाइते अछि । हथियारक अम्बार लागि गेल अछि । मुदा युद्धक जेहेन दृश्य पौराणिक गाथा माध्यम सँ देखायल गेल अछि, जाहि तरहें सुर-असुर केर परिकल्पना करैत युद्धक दशा-दिशा सँ हमरा-अहाँ केँ बुझबैत स्पष्ट कयल गेल अछि जे मनुष्य रूप मे मनुष्यता बरकरार राखू, अमानुस बनब त मारल जायब – चाहे कियो हो, अमानवीय भेला सँ महिषासुर जेकाँ मारल जायब तय अछि ।
देवी दुर्गा केँ बेर-बेर प्रणाम आ सदिखन अपन शरण मे भक्त लोकनि केँ स्थान देबाक लेल प्रार्थना !!
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यंबिके गौरि नारायणी नमोस्तुते ॥
हरिः हरः!!
