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गन्दगी सँ जन्म लैछ खतरनाक वायरस – आध्यात्म आ यथार्थ बीचक एक विश्लेषण

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स्वाध्यायक एक बेजोड़ प्रसंग

(मात्र आस्तिक-आस्थावान आ स्वाध्यायी लोक वास्ते)

ब्रह्माजी द्वारा विश्वक अधीश्वरी, जगत् केँ धारण करयवाली, संसारक पालन आ संहार करयवाली तथा तेजःस्वरूप भगवान् विष्णुक अनुपम शक्ति छथि, ताहि भगवती निद्रादेवीक स्तुति करय लगलाह –

त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारःस्वरात्मिका ॥
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता ॥१॥
अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः ॥
त्वमेव संध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा ॥२॥
त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैत्सृज्यते जगत् ॥
त्वयैत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ॥३॥
विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने ॥
तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये ॥४॥
महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः ॥
महामोहा च भवती महादेवी महासुरी ॥५॥
प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी ॥
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा ॥६॥
त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा ॥
लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च ॥७॥
खड्गिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा ॥
सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी ॥८॥
परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी ॥
यच्च किंचित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके ॥९॥
तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा ॥
यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत् ॥१०॥
सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः ॥
विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च ॥११॥
कारितास्ते योतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत् ॥
सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता ॥१२॥
मोहयैतो दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभो ॥
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु ॥१३॥
बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ ॥१४॥

देवि ! अहीँ स्वाहा, अहीँ स्वधा आर अहीँ वषट्कार छी । स्वर सेहो अहीँक स्वरूप छी । अहीँ जीवनदायिनी सुधा छी । नित्य अक्षर प्रणव मे अकार, उकार आ मकार – एहि तीन मात्राक रूप मे अहीँ स्थित छी तथा एहि तीना मात्राक अतिरिक्त जे विन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा अछि, जेकर विशेष रूप सँ उच्चारण नहि कयल जा सकैछ, सेहो अहीँ छी ।

देवि ! अहीँ संध्या, सावित्री तथा परम जननी छी । देवि ! अहीँ एहि विश्व-ब्रह्माण्ड केँ धारण करैत छी । अहीँ सँ एहि जगत् केर सृष्टि होइत अछि । अहीँ सँ एकर पालन होइत अछि आर सदैव अहीँ कल्पक अन्त मे सब केँ अपन ग्रास बना लैत छी । जगन्मयी देवि ! एहि जगत् केर उत्पत्तिक समय अहाँ सृष्टिरूपा छी, पालन-काल मे स्थितिरूपा छी तथा कल्पान्तक समय संहाररूप धारण करयवाली छी । अहीँ महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोहरूपा, महादेवी आर महासुरी छी । अहीँ तीनू गुण केँ उत्पन्न करयवाली सभक प्रकृति छी । भयंकर कालरात्रि, महारात्रि आर मोहरात्रि सेहो अहीँ छी । अहाँ श्री, अहाँ ईश्वरी, आर अहाँ बोधस्वरूपा बुद्धि छी । लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति आर क्षमा सेहो अहीँ छी ।

अहाँ खड्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शङ्ख आर धनुष धारण करयवाली छी । बाण, भुशुण्डी आर परिघ – इहो सब अहीँक अस्त्र छी । अहाँ सौम्य आ सौम्यतर छी – एतबहि टा नहि, जे-जतेक सौम्य आ सुन्दर पदार्थ अछि, ओहि सभक अपेक्षा अहाँ अत्यधिक सुन्दरी छी । पर आ अपर – सब सँ हंटिकय (परे) रहयवाली परमेश्वरी अहीँ छी । सर्वस्वरूपे देवि ! कतहुओ सत्-असत् रूपक जे कोनो वस्तु सब अछि आर ओहि सभक जे शक्ति छैक, से अहीँ छी । एहेन अवस्था मे अहाँक स्तुति कि भ’ सकैत अछि ? जे एहि जगतक सृष्टि, पालन आ संहार करैत छथि, ताहि भगवान् केँ सेहो जखन अहाँ निद्राक अधीन कय देलहुँ अछि, तखन अहाँक स्तुति करय मे एतय के समर्थ भ’ सकैत अछि ? हमरा, भगवान् शंकर केँ तथा भगवान् विष्णु केँ सेहो अहीँ शरीर धारण करबेलहुँ अछि; तेँ अहाँक स्तुति करबाक शक्ति केकरा मे छैक ? देवि ! अपने तँ अपन एहि उदार प्रभावे सब सँ प्रशंसित छी । ई जे दुनू दुर्धर्ष असुर मधु आ कैटभ अछि, एकरा मोह मे पाड़ू आ जगदीश्वर भगवान् विष्णु केँ शीघ्रहि जगा देल जाउ । संगहि हुनका भीतर एहि दुनू महान् असुर केँ मारि देबाक बुद्धि उत्पन्न कय देल जाउ ।

हे स्वाध्यायी भक्तजन, ई स्तुति ब्रह्माजी अधीश्वरी देवी केँ मधु-कैटभ नाम्ना दुइ असुर जे हुनका मारबाक लेल उद्यत् भेल छलन्हि, आ ओ समय कल्पक अन्त हेबाक समय केर छल, भगवान् विष्णु पर्यन्त निन्द्रादेवीक प्रभाव सँ शेषशय्या पर निन्द मे चलि गेल रहथि, हुनकहि कानक मैल सँ दुइ खतरनाक असुर मधु-कैटभ केर प्रादुर्भाव भेल छल – ताहि समय केर छी ।

एहि प्रसंगक प्रासंगिकता आइयो हमरा-अहाँक जीवन मे अछिये । एहि सृष्टिलोक मे हर घड़ी ‘गन्दगी’ सँ ‘कतेको खतरनाक वायरस’ केर जन्म भ’ रहल अछि । आर ओ वायरस हमरा-अहाँ केँ मारय लेल उद्यत् होइत रहैत अछि । तेहेन स्थिति मे हम-अहाँ सेहो स्वयं केँ सैनिटाइज करैत छी, गन्दगी सँ बचबाक यत्न करैत छी आ जेना ब्रह्माजी स्तुति कय केँ समस्त सृष्टिक आदि सँ अन्त धरिक सिस्टम ओपरेशन लेल समर्थ छथि – यानि एहि स्थूलदृष्टि सँ नहि देखायवाली भगवती लेकिन अनुभूति सँ एहि विशाल ब्रह्माण्ड आ सृष्टिक नियंत्रक-संचालक रूप स्पष्ट देखायवाली शक्तिस्वरूपा जगदम्बा सँ मनबैत छी जे मधु-कैटभ रूपी असुर सँ प्राणक रक्षा करू । बचाउ हे महारानी – माता !

हरिः हरः!!

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