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दहेजक आगिमे जड़ैत अरमान

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लेख विचार

प्रेषित :  आभा झा अद्विका

श्रोत -दहेज मुक्त मिथिला

लेखनीक धार , बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि

विषय : बेटी नै व्यापार: दहेजक नग्न नाच

मिथिलाक पावन भूमि, जतय सीता सन पुत्रीक जन्म भेल आ जतय नारीकेँ पूजनीय मानल गेल, ओतय एखन ‘दहेज’ सन कुरुप प्रथा अपन पैर पसारि लेने अछि। आइ बेटी कोनो घरक लक्ष्मी नै, बल्कि एकटा वस्तु वा व्यापारक साधन बनि कऽ रहि गेल अछि। दहेजक एहि नग्न नाचक कारण कतेको घरक आंगन उजड़ि रहल अछि आ कतेको बेटीक बलि देल जा रहल अछि।

सौदागर समाज आ बिकाऊ दुल्हा
आइ समाजिक विडम्बना एहन अछि जे वरक योग्यताक आधार पर ओकर ‘रेट’ तय कएल जाइत अछि। जे युवक कते शिक्षित अछि, ओकर नौकरी केहन अछि, एहि आधार पर ओकर पिता बजारमे ओकर बोली लगाबैत छथि। ई कोनो विवाहक गप्प नै भेल, बल्कि एकटा खुजल व्यापार भऽ गेल अछि। जतय प्रेम, संस्कार आ सम्बन्धक कोनो मोल नै अछि, मात्र टाका-कौड़ी, गाड़ी आ सोना-चांदीक चर्चा होइत अछि। जँ मांग पूरा नै भेल, तऽ विवाहक बाद ओहि बेटीक दुर्गति शुरू भऽ जाइत अछि।

दहेजक आगिमे जरैत अरमान
दहेजक लोभी सभक पेट कहियो नै भरैत छनि। विवाहक समय तऽ मरि-खटि कऽ पिता अपन सामर्थ्य सँ बेसी दैत छथि, मुदा सासुर पहुँचिते बेटी कें मानसिक आ शारीरिक प्रताड़नाक सामना करय पड़ैत छैक। “तोहर बाप की देलकौ?” — ई प्रश्न एकटा बेटीक काल बनि जाइत छैक। कखनो ओकरा जरा देल जाइत अछि, तऽ कखनो ओ प्रताड़ना सँ तंग आबि कऽ फँसी लगा लेइत अछि। ई हत्या नै तऽ की अछि? ई तऽ ओहि कुप्रथाक बलि अछि जेकर जड़ि हमर समाजक सोचमे अछि।

शिक्षाक नाम पर कलंक
सभ सँ दुखद पक्ष ई अछि जे आइ काल्हिक शिक्षित वर्ग एहि प्रथा कें बेसी बढ़ावा दऽ रहल अछि। पढ़ल-लिखल युवक सेहो बिना कोनो लाज-शर्मक “उपहार” कें नाम पर भारी भरकम दहेजक मांग करैत छथि। जँ शिक्षा मनुष्य कें मानवता नै सिखा सकल, तऽ एहन शिक्षाक की काज? दहेजक ई नग्न नाच समाजक ओहि तथाकथित “सभ्य” वर्गक मुँह पर तमाचा अछि, जे मुँह सँ तऽ प्रगतिशील गप्प करैत छथि मुदा भीतर सँ लोभी छथि।

सामाजिक आ मनोवैज्ञानिक प्रभाव
एहि कुप्रथाक कारण समाजमे बेटीक जन्म कें अभिशाप मानल जाय लागल अछि। कतेको माता-पिता बेटीक विवाहक लेल कर्जमे डूबी जाइत छथि आ पूरा जीवन ओहि भार कें ढोइत रहैत छथि। एहि सँ भ्रूण हत्या सन पाप सेहो बढ़ि रहल अछि। जखन समाज देखैत अछि जे बेटीक विवाह करब मतलब घरक बर्बादी अछि, तऽ ओ बेटी कें जन्म देबा सँ डराय लागैत अछि।

समाधानक बाट: हमर दायित्व
दहेजक एहि राक्षस कें खत्म करबाक लेल मात्र कानून पर्याप्त नै अछि, बल्कि एकटा सामाजिक क्रान्तिक आवश्यकता अछि:

युवा पीढ़ीक संकल्प: युवक सभकें संकल्प लेबय पड़त जे हम बिना दहेजक विवाह करब।

बेटीक स्वावलम्बन: बेटी कें दहेज नै, शिक्षा दियौक ताकि ओ ककरो आगू हाथ नै पसारय।

सामाजिक बहिष्कार: जे परिवार दहेजक लेनदेन करैत अछि, ओकर सामाजिक बहिष्कार होनाय आवश्यक अछि।

सादा विवाहक परम्परा: विवाह कें आडंबर सँ मुक्त कऽ कऽ एकटा पवित्र संस्कारक रूपमे देखल जाय।

बेटी कोनो व्यापारक वस्तु नै अछि, ओ सृष्टिक आधार अछि। जँ आइ हम सब मिलि कऽ एहि ‘दहेजक नग्न नाच’ कें नै रोकब, तऽ आबय बला समयमे कोनो घर सुरक्षित नै रहत। हमरा सभकें ई बुझय पड़त जे “बेटी बचाओ” मात्र एकटा नारा नै, बल्कि हमर अस्तित्वक रक्षाक लेल अनिवार्य अछि। दहेजक लोभ कें त्यागि कऽ बेटीक सम्मान करू, तखने समाजक कल्याण सम्भव अछि। जय मिथिला, जय मैथिली।

 

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