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शगुन के मूल्य वस्तु मे नहि, भावना मे निहित अछि

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लेख विचार

प्रेषित: दिलीप कुमार झा द

दहेज मुक्त मिथिला

लेखनी के धार,

वृहस्पतिवार , साप्ताहिक गतिविधि

विषय :  शगुनक आत्मा आडंबरक छाया

मिथिला संस्कार, सरसता आऽ आत्मीयता के भूमि रहल अछि। एहि धरती पर विवाह केवल सामाजिक अनुबंध नहि, अपितु पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलैत परंपरा, भाव आऽ विश्वास के उत्सव रहल अछि। कन्यादान के क्षण हो, वरमाला के मुस्की, कि विदाई के भीजल नयन सबमें एक अदृश्य भाव-धारा प्रवाहित रहैत अछि।
एहि भावधारा के संग जुड़ल अछि “शगुन” नेग, उपहार, दक्षिणा, वस्त्र, मिष्ठान आऽ स्नेहक प्रतीक। मुदा समयक संग प्रश्न उठल अछि की शगुन आइयो व्यवहार अछि, कि ओ केवल बाह्य दिखावा बनि रहल अछि?
पुरान मिथिला में शगुन के स्वरूप सरल आऽ सहज छल।
माता-पिता कन्या के विदा करैत समय अपन सामर्थ्य अनुसार वस्त्र, आभूषण, पात्र-भांड देइत छलाह ने प्रदर्शन, ने तुलना। भाय बहिन के नेग देइत छल, मामा कन्या के आँचर में रुपैया राखि आशीष देइत छलाह। ई सब व्यवहार “कतेक देल?” सँ अधिक “कते स्नेह देल?” पर आधारित छल।
शगुनक मूल अर्थ रहल शुभकामनाक मूर्त रूप, अपनापनक प्रमाण आऽ संबंधक मधुर सूत्र। ओहि समय शगुन सामाजिक एकताक सेतु छल लेन-देन नहि, मन-सँ-मन के आदान-प्रदान।
मुदा आधुनिकता, बाजारवाद आऽ सामाजिक प्रतिस्पर्धाक एहि युग मे शगुन के स्वरूप बदलि गेल। जे उपहार पहिने आँचर मे चुपचाप देल जाइत छल, ओ आब मंच पर सजायल जाइत अछि। जे नेग भाव सऽ देल जाइत छल, ओ आब सूची मे दर्ज होइत अछि। आई प्रश्न होइत अछि “ओ पक्ष कतेक देलक?” “हमरा कम कियैक?” शगुन धीरे-धीरे प्रतिष्ठा प्रदर्शन के साधन बनि रहल अछि।
सामाजिक दबाव एहन कि मध्यमवर्गीय परिवार सेहो अपन सामर्थ्य सऽ अधिक खर्च करय पर विवश भऽ जाइत अछि। जे परंपरा आत्मीयता के प्रतीक छल, ओ कतहु-कतहु बोझ मे परिवर्तित होइत देखाइत अछि।

  1. शगुन स्वयं दोषी नहि अछि दोष तखन उत्पन्न होइत अछि, जखन भावना बदलि जाइत अछि। जँ शगुन स्नेह सऽ प्रेरित अछि तऽ ओ व्यवहार आऽ जँ शगुन सामाजिक भय या प्रतिस्पर्धा सऽ प्रेरित अछि तऽ ओ दिखावा। परंपरा के आत्मा सरलता में बसैत अछि, आडंबर ओकर छाया मात्र अछि।
    मिथिलाक विवाह गीत सभ आइयो गूँजैत अछि “नेग बिना नहि होय काज…” मुदा ई नेग काज के गति देबाक लेल छल, ने कि कर्ज के गठरी बाँधबाक लेल।
    शगुन के मूल तत्व अछि शुभ भावना जँ भावना जीवित रहत, तऽ परंपरा सेहो पवित्र रहत। मिथिलाक सांस्कृतिक गरिमा आऽ सादगी के संरक्षित करब आई हमरो लोकनिक दायित्व अछि। शगुन के व्यवहार बनेने राखी, ओकरा दिखावा मे परिवर्तित होमय सऽ बचाबी। विवाह संस्कार अछि प्रतिस्पर्धा नहि। संबंध प्रेम सऽ बनैत अछि प्रदर्शन सऽ नहि।
    अंततः शगुन के मूल्य वस्तु मे नहि, भावना में निहित अछि। जहाँ भावना पवित्र, ओतहि शगुन व्यवहार।
    जहाँ भावना प्रदर्शनी, ओतहि शगुन बाह्य दिखावा।

🙏🙏
✍️ दिलीप झा “ललित”

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