लेख विचार
प्रेषित: शैफालिका दत्त श्रीजा
लेखनी के धार
#दहेज मुक्त मिथिला
बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
#विषय – “शगुन व्यवहार या बाहरी दिखावा”
अप्पन सबहक मिथिला समाज मे “शगुन” शब्द बहुत पवित्र मानल जाइत अछि। शगुन मतलब शुभकामना, आशीर्वाद, प्रेम आ अपनापन कऽ प्रतीक। विवाह, मुंडन, नामकरण, छठिहार, जन्मदिन जकाँ अवसर पर शगुन देल जाय अछि। मूल रूप सँ शगुन हृदय के भावना अछि—थोड़ा-बहुत देल जाय, मुदा दिल सँ देल जाय।
लेकिन आइ काल्हि ई शगुन व्यवहार धीरे-धीरे “बाहरी दिखावा” मे बदलैत जा रहल अछि। लोक अप्पन सामर्थ्य सँ बेसी खर्च करैत अछि, ताकि समाज मे प्रतिष्ठा बनल रहय।
शादी-बियाह मे लिफाफा मे राशि देखल जाइत अछि, साड़ी-गहना कऽ दाम गिनल जाइत अछि, आ आपस मे तुलना होइत अछि—“ओकरा घर सँ एतबा आयल, हमरो तऽ ओतबा देबय पड़त।”
ई प्रवृत्ति समाज पर बोझ बनल जा रहल अछि। गरीब परिवार अपन मान-सम्मान बचाबै लेल कर्ज कऽ लैत छैथि। आब ई शगुन प्रेमक प्रतीक नहि रहि, बल्कि प्रतिस्पर्धा आ अहंकारक माध्यम बनि गेल अछि। जँ कियो कम देलक, तऽ ओकर चर्चा शुरू भऽ जाइत अछि। एहिना व्यवहार सँ संबंध में मिठास कम आ कटुता बेसी आबि गेल अछि।
अप्पन सबहक मिथिला संस्कृति सादगी आ आत्मीयता लेल प्रसिद्ध अछि। एतय “भाव” कऽ महत्व रहल, “भेंट” कऽ नहि। एकटा पान-सुपारी, एकटा गमछा, अथवा स्नेह भरल शब्द सेहो शगुन मानल जाइत अछि। पुरनका लोग सभ कहैत छलैथि—“भाव प्रधान, वस्तु नहि।”
एखन जरूरत अछि जे हम सभ फेर सँ शगुनक असली अर्थ बुझी। शगुन प्रेम आ शुभकामना कऽ प्रतीक रहय, दिखावा के साधन नहि।
जिनका जतेक सामर्थ्य हो, ओतेक सादगी सँ देल जाय। आ जँ कियो कम देलक, तऽ ओकर भावनाक सम्मान कयल जाय।
समाज तखने स्वस्थ रहत, जखन हम बाहरी चमक-दमक छोड़ि अप्पन संस्कृति के सादगी अपनायब। शगुन मे प्रतिस्पर्धा नहि अपनापन हो। देखावा नहि, दिल मे सच्चाई हो।
अंत मे ई कहि सकैत छी जे शगुन व्यवहारक सुंदर परंपरा कऽ बचाबै लेल अपना सभ के सोच बदलय पड़त। जँ भावना शुद्ध रहत, तऽ छोट से छोट शगुन सेहो अनमोल बनि जायत।
जय मिथिला जय मैथिल
