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दहेज परंपरा नै समाजिक दंश थिक

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लेख विचार
प्रेषित: कीर्ति नारायण झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :-  इंसानियत केँ शर्मसार करैत दहेजक दानव –

हमर भारतीय समाज, जे अपन गौरवशाली परम्परा, संस्कार आ पारिवारिक मूल्यक लेल विश्वमे जानल जाइत अछि, ओही समाजक माथ पर ‘दहेज’ नामक एकटा भयंकर कलंक लागल अछि। ई प्रथा, जे एकटा समयमे बेटीकेँ स्नेहपूर्वक देल जाय वाला उपहारक परम्परा छल, आइ लोभ आ लालचक दानव बनि गेल अछि। ई दानव नवकी दुल्हिनक सुख, शान्ति आ सबसँ बेसी इंसानियत केँ शर्मसार कऽ रहल अछि।

दानवक क्रूर स्वरूप –

दहेजक ई दानव कोनो जंगल मे नहि, बल्कि हमर सभक घर-परिवार मे पलैत अछि। ई तखन अपन क्रूर रूप देखाबैत अछि जखन वर पक्ष विवाहक पावनि केँ एकटा व्यावसायिक सौदा बुझैत अछि, आ बेटीकेँ मात्र एकटा वस्तु मानैत अछि जेकर संग कोनो कीमती समान सेहो भेटय।

जखन मांगक अनुरूप दहेज (गाड़ी, नकद, सोना-चाँदी) नहि भेटैत अछि, तखन शुरू होइत अछि यातनाक सिलसिला। ई यातना खाली शारीरिक नहि होइत अछि; ई मानसिक आ भावनात्मक सेहो होइत अछि, जे बेटीकेँ भीतरे-भीतर तोड़ि दैत छैक। ताना मारब, अपमान करब, नीक सँ खाय-पीबय नहि देब, आ घर सँ निकालि देबाक धमकी देब—ई सभ अत्याचारक नित्य क्रिया बनि जाइत अछि।

आ सबसँ दुखद क्षण ओ होइत अछि जखन ई लोभक आगि एतेक तेज भऽ जाइत अछि जे बेचारी बेटीकेँ मारि कऽ आत्महत्याक रूप दैत अछि, वा सीधा जरा कऽ मारि दैत अछि। एकरा सँ बेसी घिनौना आ शर्मनाक बात इंसानियतक लेल दोसर की भऽ सकैत अछि? नवकी बेटी, जे घर मे लक्ष्मीक रूप मे अबैत छथि, हुनका संग ई बर्ताव ‘मनुष्य’ नहि, बल्कि ‘दानव’ सँ अपेक्षा कयल जाइत छैक।

हमरा सभक जिम्मेदारी –

दहेजक दानव केँ पोसय मे हमर समाजक उदासीनता सेहो बहुत रास ज़िम्मेवार अछि। लोक जुल्म देखियो कऽ चुप रहि जाइत छथि। बेटीक माता-पिता सेहो इज्जतक डर सँ जुल्मीक सामने झुकि जाइत छथि, आ दोसर बेर फेर बेसी दहेज जमा करैत छथि। ई चुप्पी आ लज्जाक डर दहेजक दानवकेँ ताकत प्रदान करैत अछि।

हमरा सभकेँ बुझबाक चाही जे:

१. दहेजक मांग करब आ लेब, ई दुनू कानूनी अपराध अछि। एहन लोककेँ सजा भेटबाक चाही।

२. बेटीकेँ आत्मनिर्भर आ शिक्षित बनाबैकेँ लेल पैसा खर्च करब, ओकरा दहेज दऽ कऽ विदा करबा सँ बहुत बेसी महत्त्वपूर्ण अछि।

३. समाजक लोककेँ चाही जे ओ दहेजक माँग करयबला परिवारक सामाजिक बहिष्कार करैथ।

निष्कर्ष –

दहेजक दानव हमरा सभक संस्कृति आ मानवता केँ बर्बाद कऽ रहल अछि। जखन धरि हम बेटीकेँ ‘पर-धन’ आ ‘वस्तु’ बुझब, तखन धरि ई दानव अपन क्रूरता नहि छोड़त। हमरा अपन मानसिकता मे क्रान्तिकारी बदलाव आनय पड़त। हमरा ई स्वीकार करय पड़त जे बेटी हमर गौरव छथि, ओ कोनो सौदाक सामान नहि।

आइ हम सब ई संकल्प ली जे हम आवाज उठायब, कानूनक सहारा लेब आ समाजकेँ जागृत करब ताकि ई दहेजक दानव सदाक लेल समाप्त भऽ जाय आ हमर समाज फेर सँ इंसानियतक मूल्य पर ठाढ़ भऽ सकय। जय मिथिला, जय मैथिली।

आभा झा
गाजियाबाद

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