लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- मैथिल विवाह मे जयमाल
वर-वधूक प्रथम सार्वजनिक संयोगक पावन क्षण “जयमाला”
फूलक सुवास सेँ जुड़ल संस्कारक मधुर उजास,
जयमालाक क्षण में फूटै छै प्रेमक प्रथम प्रकाश।
मैथिल विवाह मात्र सामाजिक अनुबंध नहि, बल्कि संस्कार, संस्कृति आऽ शुचिता सँ गुंथल एकटा पवित्र अनुष्ठान अछि। विवाहक विभिन्न पर्व-उपपर्व मंगनी, दूरागमन, मड़वा, कहार, कन्यादान, फेरा सभक अपन-अपन उद्देश्य अछि, मुदा जयमाला एक एहन क्षण छैक जे पहिल बेर वर-वधू सार्वजनिक रूपेँ संग-साथक उद्घोष करैत अछि।
“जयमाला” वधू आऽ वरक द्वारा एक-दोसरक गला में फूलक हार पहिराबय के मात्र एकटा रस्म नहि, बल्कि सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक आऽ सौंदर्यपरक अर्थ सँ पूर्ण एक प्रतीकात्मक घटना छैक।
मिथिला में विवाहक प्रारम्भिक रूप ब्राह्म विवाह कहल जाइत छल, जे ज्ञान-परंपरा, विद्या आऽ शीलक आधार पर स्थापित छल। जयमाला के मूल वैदिक शास्त्र में वरमाला वा वर-परिग्रह नाम सँ वर्णन भेटैत अछि।
राम-सीता विवाहक बखान में जनकपुर में जयमालाक दृश्यक अद्भुत वर्णन भेटैत अछि।सीताक हाथ सँ रामक गारा में गूँथल हार पड़िते देव-गंधर्वलोक में हर्ष-ध्वनि गूँजि उठल।
एहि पौराणिक बिम्बक आधार पर मैथिल समाज मे जयमाला केवल फूलक आदान-प्रदान नहि, बल्कि स्वीकृति आऽ सौंदर्यक शाश्वत छाप बनि गेल।
जयमाला मिथिला समाज मे समान भागीदारीक प्रथम सार्वजनिक प्रमाण मानल जाइत अछि।
सदियों तक विवाहक निर्णय परम्परागत रूपेँ कुल-कुटुम्ब लैत छल, परंतु जयमाला ओ क्षण छैक जतऽ स्वयं वर-वधू एक दोसरा के चुनैत अछि। कन्या वरक सम्मान करैत अछि आऽ
वर कन्या केँ स्वीकार करैत अछि। एहि पारस्परिक स्वीकृति सँ दाम्पत्य जीवनक प्रारंभ होइत अछि।
मैथिल समाज में प्रायः कहल जाइत अछि “हार पड़ला सँ पहिने लोकक बात ओझल, हार पड़ला के बाद ‘हमर जोड़ी’ प्रगट।”
मैथिल जयमाला में फूलक महत्व बहुत विशेष अछि। बेला शुचिता आऽ पवित्रता के प्रतीक अछि जे वधू के प्रेमक कोमलता दर्शाबैत अछि।
चंपा (चमर-फूल) मिथिला के प्रिय फूल अछि जे शुभ-लक्षण आऽ धन-समृद्धि के द्योतक अछि।
गेंदाक फूल दीर्घायु, धैर्य आऽ संयमक प्रतीक अछि ओहि फूलक हार मात्र सजावट नहि, बल्कि वधू-वरणक अध्यात्मिक भावक अभिव्यक्ति अछि।
पुरनका मैथिल गीत में कहल जाइत अछि “फूलक माला जे पड़ल गला में, एहि में बसि गेल नेह।”
जयमाला के क्षण में मैथिल विवाहक आनंद अपार होइत अछि। हँसी-ठिठोली, ताना-कसी, गीत-गवई सभ मिलि कय एही अनुष्ठान के लोक-उत्सव बना दैत अछि।
लोकगीतक पांति “हे कन्याजी! हार देलौंक,
वर जी हारि गेलखिन!” एहि तरहक गीत सब प्रेमक प्रारंभ के हास्य-रस में पिरो दैत अछि।संगहि, वधू पक्षक बहिनपुता आऽ वरक सखा मंडलीक बीच हल्का-फुल्का तकरार विवाहक माहौल में जीवंत ऊर्जा भरि दैत अछि।
मानस-परिप्रेक्ष्य सँ जऽ देखी तऽ “हार” दुइ आत्माक मिलनक प्रतीक थिक। हार जे अपन प्रकृति में गोल छैक जकरा अनंतक प्रतीक मानल जाइत अछि। मैथिल दार्शनिक परंपरा में जयमाला के निम्न अर्थ सब में देखल जाइत अछि वर-वधूक संयोग, सामाजिक दायित्वक स्वीकार, प्रेमक संरक्षण आऽ अहंकारक त्याग।
हार गला में पड़िते एक प्रतीकात्मक संदेश निकलैत अछि “हम एहि संबंधक बंधन में अपन हृदय, जीवन आऽ जिम्मेदारी समर्पित करैत छी।”
आजुक समय में सेहो जयमाला मैथिल विवाहक मुख्य आकर्षण अछि, मुदा मंच, सजावट, फोटोग्राफी आऽ संगीतक कारण ओकर प्रस्तुति में काफी बदलाव एलैक अछि। पारंपरिक बेला-हार सँ लय आधुनिक ऑर्किड/रोज़ हार
धीमा, सौम्य गीतक बदला मे डीजे, मखमली कनियाँ-बरक मंच, लाइटिंग आऽ वीडियोग्राफीक संग विशेष क्लिप। तथापि मूल भाव आइओ समान अछि उत्तरदायित्व, संस्कार आऽ प्रेमक सार्वजनिक घोषणा।
मैथिल जयमाला मे किछु विशेष तत्व अछि जे ओकरा अन्य परम्पराक जयमाला सँ अलग बनबैत अछि। दूल्हा-पाहुन के सम्मान, बहिनपुता द्वारा व्यवस्था, जनवास सँ ‘आकासन’ के संग आगमन, घृत-दीपक के साक्षी, कन्याक संकुचित पर मुस्कान भरल मुखाकृति, वरक संयमित, आऽ संस्कारी व्यवहार ई सभ मैथिल संस्कारक गहराई के प्रमाणित करैत अछि।
“मैथिल विवाहक जयमाला” फूलक हार मे बंधल संस्कारक संसार अछि। जयमाला केवल एकटा हार आदान-प्रदान नहि ई दुइ कुल, दुइ परिवार, दुइ संस्कृति, आऽ दुइ जीवनक संगमक घोषणा थिक।
फूलक सुगंध, गीतक राग, वधूक लज्जित दृष्टि, वरक सहज विनय ई चारु मिलि कय जयमालाक क्षण के मिथिला-संस्कारक शिखर बना दैत अछि।
जेठ-भाई, मामा-माउसी, सखी-बहिनपा, सखामंडली सभ एक संग समयक एहि पवित्र क्षण मे बंधू-बांधवक बंधनक नव इतिहास लिखैत अछि।
अंततः हम कहब जे
जयमाला…
प्रेमक प्रथम स्पर्श,
संस्कारक प्रथम स्वीकार,
आऽ दाम्पत्य जीवनक प्रथम उजास अछि।
हार पड़िते बनल बर कनियाँक बंधनक नव दीप उजागर,
दुइ जीवन जुड़ि कहलक अहाँ बनलहुं हमर भाग्य सहचर।”
