विवाह पंचमी, जनकपुर यात्रा, दान पुण्य आ प्रवीण सन्देश
अपन मिथिलाक प्रचलित व्यवहार – पूजा-पाठ, रीति-रिवाज, देवता-पितय-प्रकृति पूजन विधि आदिक शानदार वर्णन ‘वर्षकृत्य’ (प्रथम एवं द्वितीय) सँ प्राप्त होइछ । कोन मास मे कि सब कयल जेबाक चाही, व्रतक उद्यापन कोना कयल जाय, जन्मदिनक कृत्य कि सब हेबाक चाही, दान व पुण्यक तौर-तरीका कि सब अछि – इत्यादि बात पंडित रामचन्द्र झा द्वारा सम्पादित संस्कृत भाषा मे लिखल गेल अछि ‘वर्षकृत्य’ । एहि मे अगहन मासक कृत्य मे शुक्ल पंचमी तिथि ‘जानकी विवाह’ केर दिन रूप मे ‘बृहद्विष्णुपुराण’ सन्दर्भक आधार पर बाकायदा उल्लेखित अछि । लिखल अछि –
अथ श्रीजानकी-विवाहपञ्चमीनिर्णयः
मार्गशुक्लपञ्चमी (२) श्रीजानकीविवाहपञ्चमी । अत्र जनकपुरयात्राप्रसङ्गे आह बृहद्विष्णुपुराणे –
कोशलेन्द्रसरः स्नायान् मार्गमासे विशेषतः ।
मार्गं वै मण्डनं तीर्थं पादप्रक्षालनं सरः ॥
रामलक्ष्मणसीतानां सरांसि फलदानि वै ।
विशेषेण महाभाग नवम्यां रामजन्मनि ॥
जानकीजन्मवारेऽपि विवाहे च तथैव तु ।
सर्वेषां स्नानदानादि महापुण्यफलप्रदम् ॥
एकर अतिरिक्त जानकी पूजाविधि लेल वैशाख मासक कृत्य कार्य मे ‘जानकीजन्माष्टम्यां द्रष्टव्यः’ कहल गेल अछि । एहि मासक एकटा आर कृत्य मे नवान्नभक्षणनिर्णय, रविव्रतारम्भनिर्णय, कालभैरवाष्टमीनिर्णयक सेहो ‘मार्गकृत्यम्’ रूप मे वर्णन कयल गेल अछि ‘वर्षकृत्य’ (प्रथमभागः) मे ।
आब आउ वर्तमान युगक व्यवहार मे
विवाह-पञ्चमीक अवसर पर वर्तमान समय धरि लाखों लोक जनकपुरक यात्रा करैत छथि । विभिन्न सरोवर सब मे स्नान, दान-पुण्य आदि कार्य करैत छथि । जानकी मन्दिर मे जानकी चारू बहिन एवं चारू दूल्हा सहितक अति रमणीय विग्रह (मूर्ति) केर दर्शन-पूजन करैत छथि ।
मन्दिर आ धाम – दुनू ठाम इन्तजाम अत्यन्त खास भेल करैत अछि । बुझाइत रहैत अछि जे सच मे फेर सँ जानकीक विवाह राघव रामचन्द्र संग भ’ रहल छन्हि । अयोध्या सँ वर-बरियाती आ साँठ-भार सहित दशरथरूपी सन्त-महन्थ सब अबैत छथि । जनकपुर मे सेहो जनकरूपी सन्त-महन्थ लोकनि कन्या जानकी, मांडवी, उर्मिला आ श्रुतिकीर्ति स्वरूपा चारू कन्या केँ सम्पूर्ण साजोसज्जा सँ साजिकय श्री राम, श्री भरत, श्री लक्ष्मण एवं श्री शत्रुघ्न स्वरूप वर लोकनिक विधिवत् विवाहक लौकिक विधान अनुसार विवाहोत्सव मनायल जाइछ । जनकपुर मे एहि उत्सव केर दर्शन-लाभ सम्पूर्ण तीर्थयात्री, स्थानीय वासी लोकनि पबैत छथि, आनन्द-आनन्द होइत रहैछ ।
किछु नीक संग किछु बेजा सेहो होयब स्वाभाविक सत्य थिक, लेकिन लोक सजग रहिकय नीके मे बेसी संलिप्त होइछ । जेकर तकदीरे फूटल रहतैक, अभगदशे माथ मे घुड़ियाइत रहतैक – ओ सब अपन चोरी-चबारी, लूटपाट आ गन्दा काज मे लगबे करत । ओकरा अपन कर्मक दण्ड अपनहिं भोगय पड़ैत छैक । तेँ कोनो तीर्थस्थल मे दोष प्रवेश कय गेल से सच नहि अछि । भीड़भाड़ मे जेबकतरा जेबिये कटैछ, चोर-छिनार चोरिये-छिनरपन मे लगैछ, गुन्डा-बदमाश व अराजक सोच-विचार राखयवला अराजकते पसारैछ । मुदा एहि सब हावी रहैछ अपन मिथिलाक उत्तमोत्तम संस्कार आ परम्परा ।
अपन मिथिलाक वैवाहिक परम्परा अदौकाल सँ एहि तरहें डिजाइन कयल गेल अछि जे कोनो विवाह मे जाबत धरि सब जाति-समुदायक श्रम-आधारित चीज-वस्तुक उपयोग नहि होयत, विवाह अपूर्ण रहत । एहि पर आधारित अछि ई सुन्दर सन भजन –
चारू दूल्हा कि जय, चारू दूल्हिन कि जय
बोलू मिथिला नगरिया की जय जय जय
राजा दशरथ कि जय, आ जनक जी कि जय
बोलू मिथिला नगरिया की जय जय जय
याद राखब, हमर मिथिला डोम समुदाय केँ गामक सिमाने पर घरबार बनाकय रहय कहल गेल अछि, ओकर आजीविका मे सुगर पोसनाय सँ लय केँ बाँसक कमाची सँ बुनल छिट्टा-पथिया, सुप-कोनियाँ आदिक निर्माण, देवताक पूजा-पाठ लेल फूल लोढ़बाक लेल फुलडाली, कोनो सगुन (शुभक) सामग्री धरबाक-परसबाक लेल चंगेरा-डाला आदिक निर्माण पर्यन्त यैह सिमाना पर रहनिहार करत आ वैह शुद्ध मानल जाइछ ।
धन्य डोमक पोसल सुगर जे पूर्वकालिक चलन अनुसार मानव-मल व अन्य गन्दगी केँ साफ करैत आबि रहल अछि । स्वयं भगवानो वराहावतार मे एहि रूप मे आबि हिरण्याक्षक पसारल गन्दगी केँ स्वयं साफ कयने रहथि, तदोपरान्त देवता लोकनि लेल मनुष्यक कयल हविष्यदान शुद्ध भेल छल ।
राजा जनकक दरबार मे जानकीक विवाह मे सेहो यैह डोमाक बनायल चँगेरा-कोनियाँक काज भेल छल । मिथिलाक कोनो विवाह मे वगैर डोमक योगदान विवाह अशुद्ध मानल जाइछ । तेँ कवि गबैत छथि –
बोलू डोमा कि जय हो डोमिनियाँ कि जय
बोलू मिथिला नगरिया कि जय जय जय
जहिना चँगेरारूपी ‘आज्ञा-डाला’ मे सगुनक सामग्री वर सँ प्राप्त कय विवाहक अन्य विध आगू बढ़त, तेनाही गौरपूर्वक देखब त वैदिक रीति सँ विवाह मे नौआ, कुम्हार, सोनार, माली, पटवारी, बरइ, हलुवाइ, ग्वाला, कोइरी, धोबी, आदि विभिन्न समुदायक कोनो-न-कोनो योगदानक चीज-वस्तु लगबे टा करैछ । त उपरोक्त जानकी-राघव विवाह गीत मे कवि बेर-बेर सभक नाम लय-लय केँ गबैत छथि, सन्देश दैत छथि, हम सब सदिखन एक छलहुँ, एक छी, एक रहब ।
बोलू कुम्हरा कि जय हो कुम्हनियाँ कि जय
बोलू मिथिला नगरिया कि जय जय जय
बोलू नौआ कि जय हो नौअनियाँ कि जय
बोलू मिथिला नगरिया कि जय जय जय
बोलू सोनरा कि जय हो सोनरनियाँ कि जय
बोलू मिथिला नगरिया कि जय जय जय
आर, क्रम जतेक दूर धरि पसारि सकी, सब केँ मोन पाड़ू – जय जय करियौक आ बेर-बेर ‘मिथिला नगरिया कि जय जय जय’ होइत रहत । आइ भले मधेश नगरिया या बिहार नगरिया राजनीतिक कारण सँ बनि गेल हो ई मिथिला नगरिया, परञ्च शास्त्र-पुराण मे चर्चित मिथिला नगरिया सब दिन एहिना आबाद-जिन्दाबाद रहत । बहुते बात कुव्याख्याक कारण गड़बड़ भ’ गेलैक, कारण लगभग १००० वर्ष ई भारतवर्ष विदेशिया सब द्वारा शासित रहल, ओ सब वेदक बात केँ वितण्डा बनाकय बर्बाद कय देलक ।
आब त कतेको मलेच्छ आ वर्णसंकर मनुष्य घरे-अंगना मे जन्म लियए लागल अछि, युग-युग केर बात होइत छैक, पहिनहुँ रावण जेहेन दुर्दान्त राक्षस भेले छल जे जानकिये केँ अपहरण कय लेने छल । मारल गेल सार अपने । कतबो लोक बुझेलकैक, नहि बुझलक, त मारल गेल । सिम्पल । औझको रावण सब मारले जा रहल अछि । तेँ, सब गोटे अपन मिथिलाक जय-जय करैत रही, यैह सन्देश अछि । लेख लम्बा भेल ताहि लेल क्षमा करब, मुदा फ्लूक मे निकलल बात, किछु छुपल सन्देश सेहो देबाक इच्छा छलैक लेखक प्रवीण केँ … बस से ग्रहण करय जायब । बम बम महादेव !!
हरिः हरः!!
