लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- तुलसी केर महत्व
आस्था, आरोग्य आऽ अध्यात्मक हरित प्रतीक “मिथिलाक तुलसी”
भक्ति, शुद्धि आऽ प्रेमक, संगम थिक ई गाछ।
तुलसी पूजन सँ भेटैछ, प्रभु कृपाक एक आस॥
मिथिलाक संस्कृति अपन प्रतीककें लेल प्रसिद्ध अछि। एतय प्रत्येक वृक्ष, पाषाण, नदी, पहाड़ आऽ वनस्पति केवल भौतिक अस्तित्व नहि, बल्कि एकटा जीवंत देवत्वक प्रतीक मानल जाइत अछि। ओहि देवत्वपूर्ण वनस्पतिक भीड़ मे ‘तुलसी’ एकटा अनुपम, पवित्र आऽ सर्वमान्य गाछ अछि। मिथिलाक लोकजीवन मे तुलसी पूजा मात्र एक परंपरा नहि, बल्कि आस्था, आरोग्य आऽ अध्यात्मक त्रिवेणी अछि।
ई भक्ति आऽ गृहसंस्कारक आधार अछि। मिथिलाक प्रायः सब आँगन मे तुलसीक उपस्थिति मानू लक्ष्मी समान मानल जाइत अछि। तुलसी चौरा ने मात्र तुलसी गाछक आसन अछि, बल्कि ओ गृहक पवित्रता आऽ परिवारक सांस्कृतिक चेतनाक प्रतीक अछि। भोरुका पहर तुलसी पर जल देबाक, दीप जरैबाक, आऽ संध्या पहर में आरती करबाक परंपरा स्त्रीक हृदय मे भक्ति आऽ शुचिता जगबैत अछि।
‘तुलसी विवाह’ हो वा ‘कार्तिक स्नान’, एहि गाछ सँ जुड़ल सभ संस्कार स्त्रीक आत्मविश्वास आऽ श्रद्धा केँ नवीन ऊर्जा दैत अछि।
भक्ति आऽ श्रद्धा सँ हटि, तुलसी प्रकृति प्रदत्त औषधि अछि। आयुर्वेद मे तुलसी केँ “सर्वरोगहरिणी” कहल गेल अछि। सर्दी-खाँसी सँ लऽ कऽ मानसिक तनाव धरि, तुलसीक पात, फूल, आऽ बीआ मे जीवनरक्षक तत्व विद्यमान अछि।
मिथिलाक परंपरा अछि “रोज तुलसीक दू पात खाऽ लेलऊँ, तँ रोग-शोक सँ मुक्त भेलऊँ।” ई कहावत मात्र लोककथन नहि, बल्कि अनुभव सँ जन्मल स्वास्थ्य सूत्र अछि।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण सँ तुलसी पूजाक गूढ़ तत्त्व ई अछि जे तुलसीक गाछ मात्र भक्ति नहि सिखबैत अछि, बल्कि ‘सद्भावना’ आऽ ‘समर्पण’ केर शिक्षा दैत अछि। तुलसी केँ भगवान विष्णुक प्रिया कहल गेल छैन्ह ताहि कारणे ई भक्त आऽ भगवानक बीचक भाव-संवादक सेतु बनि जाइत अछि।
तुलसीक पात बिना पूजन अपूर्ण मानल जाइत अछि ई संकेत अछि जे भक्ति तखने पूर्ण होइछ, जखन शुद्धता आऽ सरलता संग होइछ।
मिथिलाक ग्राम्य जीवन मे तुलसी चौरा एकटा सांस्कृतिक केंद्र अछि। संध्याकालीन आरती, गीत, कथा आऽ लोकसंवाद एतहि सँ आरम्भ होइत अछि। घरक बाल-बृद्ध, स्त्री-पुरुष सभ एकठाम भेला सँ सामाजिक एकता बढ़ैत अछि।
कतेको लोकगीत आऽ कतेको मैथिली कविता मे तुलसीक सौंदर्य आऽ पवित्रता केर गान भेल अछि जेना….
जल दीप आऽ फूल अर्पण, हृदय होइछ पावन।
तुलसी पूजा जे करथि, तिनके भेटैछ भगवान॥
तुलसी पूजा मात्र धार्मिक कर्मकांड नहि, बल्कि जीवनक अनुशासन, प्रकृति सँ प्रेम, आऽ आत्मशुद्धिक प्रतीक अछि। मिथिलाक धरा पर ई परंपरा आइयो अपन गरिमा सँ जीवित अछि।
जतए तुलसीक हरित पात लहराईत अछि, ओतए विश्वास, स्वास्थ्य आऽ संस्कृति सभ संगे मुस्कुराईत अछि।
तैं कहब जे….
तुलसी अहाँक अर्चना मे,
आत्मा पावय शांति गहीर।
धराक जाहि घर मे तुलसी,
ओ घर भेल स्वर्ग अधीर।
