Search

विद्यापति मैथिली साहित्यक आत्मा छथिन

822 भ्यूज

 

लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- महाकवि विद्यापति

मिथिला सँ भारतीय काव्य-परंपराक सेतु “कविकुलगुरु विद्यापति”

भारतीय साहित्य-विश्वक इतिहास मे विद्यापति ठाकुर एहन नाम छथि, जे ने केवल मिथिलाक सांस्कृतिक अस्मिता केँ स्वर प्रदान केलनि, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय काव्य-परंपराक दिशा बदलि देलनि। ओहि समय जखन संस्कृतक शास्त्रीय परंपरा आऽ लोकभाषाक भावधारा बीच संघर्ष चलि रहल छल, विद्यापति लोकभाषा केँ दिव्यता प्रदान करैत सेतु रूपे उभरलाह। ओ मिथिलाक गौरव, भक्तिकालक प्रदीप, आऽ प्रेम-रसक कवि छलथि।
विद्यापतिक जन्म १३५२ ई. के आसपास मिथिलाक मधुबनी जिलाक बिस्फी गाँव मे भेल छलैन्ह। पिता गणपति ठाकुर कर्नाटक ब्राह्मण कुलसँ आबि मिथिला मे बसि गेल छलाह आऽ राजा शिवसिंहक राजदरबार मे मंत्री रूपे प्रतिष्ठित छलाह। विद्यापति अपन पिता समान विद्वान आऽ विदग्ध छलाह संस्कृत, अपभ्रंश, मैथिली, अवहट्ट, उड़िया, बंगला आऽ फारसी सभमें ओ पारंगत छलाह।
ओ राजकवि रूपे दरभंगा नरेश शिवसिंह आऽ तिनकर धर्मपत्नी लक्ष्मणा देवी सँ विशेष स्नेह आऽ आदर पौलनि। विद्यापति के जीवनकाल राजनीतिक अस्थिरता आऽ सामाजिक परिवर्तनक काल रहल, मुदा ओहि उलझन बीचो ओ साहित्य आऽ भक्तिक प्रकाश दीप के प्रज्वलित करैत रहलाह।
विद्यापति बहुभाषी कवि छलाह। हुनकर काव्यक बहुलता आऽ विविधता आश्चर्यजनक अछि। हुनकर लेखन संस्कृत, मैथिली, आऽ अवहट्ट तीनू भाषामें उपलब्ध अछि।

संस्कृत मे विद्यापति द्वारा रचित पुरुष परिक्षा, गंगावाक्यावली, दुर्गाभक्ति-तरङ्गिणी, भूपाराज-पराक्रम आदि ग्रंथ प्रसिद्ध अछि। एहि सभमें ओ शास्त्रीय ज्ञान, धर्म, राजनीति, आऽ दर्शनक अद्भुत समन्वय प्रस्तुत केने छथि।
विद्यापति केँ मैथिलीक जनक कहल जाइत अछि। हुनकर पदावली मे प्रेम आऽ भक्ति दुनू संग-संग प्रवाहित भेल अछि। राधा-कृष्णक प्रेम आऽ भक्ति हुनकर कवितामे जीवंत भऽ उठैत अछि “कहब न गोविन्द, कहब न गोविन्द,
मोर मन भ’ल बिसराय।” विद्यापतिक पद केवल गीत नहि, आत्मिक अनुभवक साक्षात रूप छी। एहि पदसभमे भक्ति, प्रेम, विरह, आऽ संयोगक सहज संगम देखल जाइत अछि।
ओहि समय मैथिली आऽ बंगला सभक बीच जे लोकभाषाक रूप विकसित भेल, ओकर मूल प्रेरणा विद्यापतिक रचनाशक्ति अछि। ओ उच्च कोटिक काव्यक भाषा केँ जनभाषा बनौलनि, जे नारीक हृदय सँ उठल भाव केँ सहज रूपे प्रकट करैत अछि।
विद्यापतिक काव्यक मुख्य भाव प्रेम आऽ भक्ति अछि। ओ अपन कवितामें राधा-कृष्णक प्रेमक माध्यम सँ आत्मा आऽ परमात्माक मिलनक अनुभूति करबैत छथि। हुनकर भक्ति मधुर-भाव पर आधारित अछि “ईश्वर सँ डरू नहि, प्रेम करू ओ प्रेमे भक्ति कहाओत।”
शैली दृष्टिसँ विद्यापति अपन समयक अद्वितीय कवि छलाह। ओ शास्त्रीय संस्कार केँ लोकलयक संग जोड़ि दैत छलाह। हुनकर रचना मे छंद, अलंकार, प्रतीक आऽ उपमानक प्रयोग अत्यंत सुन्दर देखल जाइत अछि।
जोगी बनलौं श्याम सन, भेष धरलौं बिशाल।
मन मे राखलौं राधिका, तें नहि भेलौं निहाल॥
एहि प्रकारक भावाभिव्यक्ति मे विद्यापतिक सूक्ष्म मनोविज्ञान आऽ कलात्मक सघनता द्रष्टव्य अछि।
विद्यापति मात्र कवि नहि, समाज-द्रष्टा सेहो छलाह। ओ एहि बातक प्रचारक छलाह जे भक्ति आऽ प्रेमे मानवक सच्चा धर्म अछि। ओ अपन पदसभ द्वारा मिथिला समाजक नैतिक आऽ आध्यात्मिक चेतना जागृत केलनि।
ओ शैव, शाक्त आऽ वैष्णव तीनू परंपरासँ प्रभावित छलाह, मुदा अंततः हुनकर भाव कृष्णभक्ति पर केन्द्रित भेल। एही कारणें चैतन्य महाप्रभु विद्यापतिक पदसभ सँ अत्यंत प्रभावित भेलाह आऽ ओ पद बंगाल आऽ उड़िशा धरि लोकजीवन के रग रग मे समाहित अछि।
विद्यापतिक प्रभाव सँ मिथिला सीमित नहि रहल। हुनकर रचना-धारा पूर्व भारतक सम्पूर्ण सांस्कृतिक भूगोल मे प्रवाहित भेल। बंगाल मे विद्यापति “विद्यापति ठाकुर” रूपे सम्मानित छथि, संगे उडि़या आऽ असमिया भक्तिकाव्य पर सेहो हुनकर गहिर छाप अछि।
कहि सकैत छी जे हिंदीक भक्तिकालक कवि विशेषतः सूरदास आऽ रसखान विद्यापतिक पदशैली सँ प्रेरित भेल छलाह। मैथिली साहित्य तऽ हुनकर नामे सँ पहिचानल जाइत अछि।
विद्यापति मैथिली सभ्यताक आत्मा छथि। ओ कवि मात्र नहि, बल्कि लोकभावना केँ देवत्व प्रदान करनिहार साधक छथि। हुनकर काव्य आइयो मैथिल जनमानसक श्वास मे बसल अछि, गीत-नृत्य, पर्व-पर्वाण, आऽ भक्ति-संस्कार सभमें ओ जीवंत छथि।
विद्यापति बचन गोविन्दक गीत,
जन-जनक हृदय में फूटै प्रीत।
कहबा मे कोनो अतिशयोक्ति नहि जे विद्यापति कालक सीमा पार कए अनादि नाद बनि गेल छथि लोकभाषा सँ ईश्वर धरि, लोकमन सँ आत्मा धरि।
मिथिलाक इतिहास, संस्कृति आऽ भक्ति तीनू केँ ओ एक सूत्रमे बाँधि देलनि। एहि हेतु ओ अमर छथि “कविकुल-गुरु विद्यापति” ।

Related Articles