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सुंदर सत्कार सँ अतिथि देवो भव: केँ चरितार्थ करैत अछि मिथिलाक लोक

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लेख विचार
प्रेषित: भावेश चौधरी
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- अतिथिक सत्कार

मिथिला — विद्याकि भूमि, परंपराक पालिका आ संस्कृतिक सुवासित उद्यान — अपन आत्मीयता, उदारता आ आतिथ्य भावना लेल सम्पूर्ण विश्व मे आदरणीय मानल जाइत अछि। *”अतिथि देवो भव:”* के वाक्य केवल एक श्लोक नहि, बल्कि मिथिला वासिक जीवनचर्या के आधारस्तम्भ अछि। अतिथि सत्कार मिथिलाक ओ अमिट परंपरा अछि, जे स्निग्ध भावनाक सुरभित पंखुड़ी समान हृदयक उद्यान में विकसित भेल अछि।

मिथिला मे अतिथि आराध्य होइत छथि। कोनो अनायास आयल आगंतुक के स्वागत-समारोह मिथिला घर-घर मे स्वतः आरंभ भऽ जाइत अछि। ओहि क्षण गृहस्वामी शब्दक सागर त्यागि ,सेवाक सिंधु मे प्रवेश करैत छथि। अतिथि लेल दूध-माखन, मखान, पान-सुपारी, मिठाई आ मधुर वचनक समुचित व्यवस्था मात्र प्रथानुसार नहि, अपितु आत्मा सं उपजल कर्तव्य बोध होइत अछि।

मिथिलाक “पातिल” (भोजन परोसय वाला पात्र) सँ लऽ कऽ *”पाग” (सम्मानक प्रतीक) धरि, अतिथि सत्कारक प्रतीक बनल अछि।* जेखन अतिथिक आगमन होइत अछि, तऽ महिला लोकनि मांग में सिंदूरक दीप्ति संग आरती करैत छथि, पुष्पवर्षा होइत अछि, आ संगीतमय स्वागतक संग ओहि घरक आँगन पावन बनि जाइत अछि। ई केवल सत्कार नहि, जीवंत संस्कृति कऽ अभिषेक थीक।
मिथिला मे विवाह, उपनयन, श्राद्ध, यज्ञ जेकाँ पारंपरिक संस्कार मे अतिथिक भूमिका सर्वोपरि मानल जाइत अछि। सुपाच्य, सुमधुर आ रंग-बिरंगक भोजन व्यवस्था मात्र भोजन नहि, संस्कृतिक रसास्वादन होइत अछि।

आजुक यांत्रिक युग मे जतेक परिवार स्वार्थक कुहासा मे अपन अपन ढोढ़ा बंद क’ रहल छथि, मिथिलांचल ओना नहि अछि। एतऽ अतिथि हृदयक हर्ष, गृहक गरिमा आ संस्कृतिक संजीवनी मानल जाइत छथि।

मिथिला मे अतिथि सत्कार खाली सामाजिक कर्तव्य नहि, अपितु एक जीवंत परंपरा, आध्यात्मिक साधना आ सांस्कृतिक यज्ञ भेल। ई परंपरा मिथिलाक अस्मिता अछि। जेना गंगा के निर्मलता, हिमालय के ऊँचाई, तहिना मिथिलाक संस्कृति के अतिथि-सत्कार सँ गरिमा प्राप्त अछि। एहिमे समाहित अछि श्रद्धा, सेवा आ समर्पणक त्रिवेणी, जे मिथिला केँश आन क्षेत्र सँ अलग विशेषता प्रदान करैत अछि।मिथिलाक अतिथि सत्कार एकर सांस्कृतिक उच्‍चता, आध्यात्मिक सुषमा आ सामाजिक समरसता के परिचायक अछि।
ई परंपरा केवल खान-पान या भौतिक सेवा तक सीमित नहि, बल्कि हृदयक शुद्धि, मनक विशालता आ आत्माक उन्नयन के द्योतक अछि।
जते दिन मिथिलाक घर-घर मे अतिथि सत्कारक दीप जरैत रहत, ओते दिन धरि संस्कृति, धर्म आ मानवता के अस्तित्व अक्षुण्ण रहत।

“सेवा अछि संस्कार, अतिथि अछि अवतार — मिथिलाक आत्मा” एहि भावना सँ जुड़ल अछि। तै अतिथि सत्कार मिथिलाक गौरवगाथा मात्र नहि, अपितु आत्मगाथा अछि।
जय मिथिला, जय मैथिली।।

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