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पितृपक्षक सँ यादि अबैत अछि जे पूर्वजक नेहक रेखा सँ, आबद्ध अछि जिनगीक डोर

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लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- पितृपक्ष

पितृपक्ष : दर्शन, अध्यात्म, विज्ञान आऽ संस्कृति सँ जुड़ल जीवंत परंपरा छी।

पूर्वजक नेहक रेखा सँ, आबद्ध अछि जिनगीक डोर।
श्रद्धा-तर्पण सँ जीवित रहै, संस्कारक उज्ज्वल ठौर॥

पितृपक्ष मात्र पूर्वजक स्मरण-पूजा नहि, बल्कि जीवन आऽ मृत्युक शाश्वत सत्यक स्वीकार्यता थिक। दर्शन कहैत अछि मनुष्यक अस्तित्व क्षणभंगुर अछि, मुदा ओकर कर्म आऽ संस्कार पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होइत रहैत अछि। पितृपक्ष में “श्राद्ध” आऽ “तर्पण” करब, एहि सत्यक स्वीकार थिक जे वर्तमान पीढ़ी अपन अस्तित्वक हेतु पूर्वजक योगदानक ऋणी अछि। ई ऋण-मुक्ति करबाक प्रयास जीवनक गहन दार्शनिक चिंतन संग जुड़ल अछि “जीवात्मा अमर, देह नश्वर”।
आध्यात्मिक दृष्टि सँ पितृपक्ष मे श्रद्धा, आस्था आऽ कृतज्ञता केंद्रस्थल पर रहैत अछि। मान्यता अछि जे एहि काल मे पितृलोकक द्वार खुलैत अछि आऽ आत्मा सभ पृथ्वीलोक पर अपन वंशधरिक प्रतीक्षा करैत छथि। श्राद्ध-तर्पण द्वारा जल आऽ अन्न अर्पण कएल जाएत अछि, जेकरा माध्यम सँ “श्रद्धा” आऽ “स्मरण” पूर्वज धरि पहुँचैत अछि। मिथिला मे पितृपक्षक पूजा-प्रथा विशेष रूप सँ गाम-गामक पोखरि, गंगा-कोसीक घाट आऽ स्थानीय सरोवर पर होइत अछि। ई आध्यात्मिक बंधन जीवित आऽ दिवंगत आत्मा बीच अटूट संबंध बनौने रहैत अछि।
वैज्ञानिक दृष्टि सँ पितृपक्षक आचार-व्यवहार केँ समझल जा सकैत अछि। एहि काल मे वर्षा समाप्त होइत अछि आऽ नूतन अन्न-धान्यक आगमन आरम्भ होइत अछि। श्राद्ध मे प्रयुक्त सामग्री तिल, दूब, कुश, जल, दूध, मधु, घृत सभ औषधीय गुण सँ भरल अछि। तर्पणक जल अर्पण करब, पर्यावरण आऽ जल-संरक्षणक प्रतीक सेहो थिक। एहि कालक आहार सात्विक भोजन, व्रत, अनुशासन शरीरक शुद्धिकरण आऽ मानसक स्थिरता लेल वैज्ञानिक दृष्टि सँ सेहो उपयोगी अछि।
सांस्कृतिक दृष्टिकोण मिथिला परंपरा सँ भरल भूमि अछि। एतय पितृपक्ष एकटा सामूहिक-सांस्कृतिक उत्सव जकाँ मानल जाएत अछि। गामक लोक पोखरि, सरोवर आऽ नदीक किनार पर भोरुका पहर मे सभ मिलिके तर्पण करैत अछि। लोकक विश्वास अछि जे “गंगाजल” आऽ “कोसीजल” सँ श्राद्ध विशेष फलदायी होइत अछि। मिथिलाक लोकगीत आऽ आख्यान सभमे पितृपक्षक महिमा गूंजैत अछि। परिवारक ज्येष्ठ सदस्य तर्पण करैत छथि आऽ कनिष्ठ सदस्य ई परंपरा सँ संस्कारित होइत छथि। एहि तरहे पितृपक्ष सांस्कृतिक निरंतरता आऽ सामुदायिक एकता केँ मजबूत करैत अछि।
मूल बात ई जे पितृपक्ष मिथिला लेल केवल धार्मिक अनुष्ठान नहि, बल्कि एकटा जीवंत परंपरा थिक, जे दर्शन सँ आत्मबोध, अध्यात्म सँ श्रद्धा, विज्ञान सँ स्वास्थ्य आऽ संस्कृति सँ सामूहिकता सिखबैत अछि। ई समय वर्तमान पीढ़ी लेल स्मरण कराबैत अछि जे “हमर अस्तित्व पूर्वजक आशीर्वाद आऽ संस्कार सँ बनल अछि। अपन मूल केँ स्मरण आऽ सम्मान करब, भविष्यक स्वस्थ समाज निर्माण लेल आवश्यक अछि।”

पूर्वजक आशिष दीप जकाँ, पथ हमर उजियार करै।
संस्कारक गंगा बहैत रहै, पीढ़ी सँ पीढ़ी जुड़ि चलै॥

 

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