लेख विचार
प्रेषित: नीलम झा निवेधा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- पितृपक्ष
एहि धरती पर मनुक्खक जन्म तीन ऋणक संगे होइत अछि। पितृऋण, ऋषिऋण आ देवऋण। ई तीनु ऋण जे चुका लेलक ओ सभ पाप सँ मुक्त भए परमधामक प्राप्ति करैत अछि। जौं नञि चुकले त’ पुनि-पुनि जन्म लैत ऋण सधबै लऽ अबैत अछि।
पितृपक्ष, भारतीय संस्कृतिके एकटा खास पक्ष होइत अछि। बारहो महीना मे दुटा क’ पक्ष होइत अछि – कृष्ण पक्ष आ शुक्लपक्ष, मुदा मात्र आश्विन एकटा एहन मास अछि जाहिमे एहि कृष्ण पक्ष आ शुक्ल पक्ष के सेहो नाम परल, पितृपक्ष आ देवी पक्ष। एहि दुनूपक्षमे एक महीना धरि दोसर कोनहुँ काज नञि होइत अछि।पितृपक्ष मे सिर्फ आ सिर्फ पितर -पितरैन पिंडदान,तर्पण,पार्वन,आ ब्राह्मण भोजन / पितरैन होइत अछि। बीचमे एकटा जितिया ओहो जियाजिबछ के पावनि अछि।देवी पक्षमे सिर्फ आ सिर्फ भगवतीक आराधना आ शरद पूर्णिमा क’ कोजगरा सँ समापन। भादबक पूर्णिमा सँ लक आश्विनअमावास्या तक रहैत अछि पितृपक्ष । ई पंद्रह दिन तक चलैत अछि। एहि पूर्णिमा के टुगरा पूर्णिमा कहल जाइत अछि। जकरा पिताक साया माथ पर सँ हैट गेल ओ भ’ गेल टुगर। पूर्णिमा दिन खीरा,फुलकी,सुपारी,पैसा लए ऋषि तर्पण कए, लोक चौदह दिन तक अपन पूर्वजकें तील कुश आ जल सँ तर्पण करैत अछि। एहि पंद्रह दिन मे अन्हरिया वा इजोरिया पक्षमे जिनकर माता-पिता आ गुरू जाहि तिथि क’ स्वर्गीय भेल रहैत छथिन ताहि तिथि क’ पुरूषक पार्वन करैत हुनका नाम पर ब्राह्मण भोजन करवैत छथि। आ महिलाक निमित्त तिथी पर/ जितिया व्रत सँ एक दिन पहिने पितरैन या मातृ नवमी क’ ब्राह्मण भोजन। हमरा सभकें पुरुष के एक दिन पार्वन होइत अछि आ महीला के दू दिन – एक दिन तिथि पर आ दोसर दिन मातृ नवमी। पार्वन बहुत विधिविधान सँ होइत अछि।
ई तर्पण पितृऋण सँ उऋण हेबाक लेल कएल जाइत अछि। एहि सँ ककरो यदि पितृदोष लगैत छैक त’ ओहि सँ मुक्ति भेटैत छैक, कारण शास्त्रमे कहल जाइत अछि जे पितृपक्ष मे सभ पितर मृत्यु भुवन मे आइब अप्पन बाल-बच्चाक दिश भूखल प्यासल अतृप्त सन तकैत छथिन। तर्पण आ पार्वन कएला सँ वो तृप्त भए पंद्रह दिनक बाद पुनः ब्राह्मडक उर्जाक संग वापस चैल जाइत छथिन। एहि पितृपक्षमे लोक गया जाए अप्पन पूर्वज सहित मातृक पक्षक पितरकें आ कनिया अपन नैहरक पितर के सेहो पिंडदान दैत छथिन। ओत सगा सबंधित दोस्त गर्भमे गर्भपात भेल के सहित पिंडदान कएल जाइत अछि।
एहि बीचमे अष्टमी तिथि क’ पड़ैत अछि जिमूतवाहनक व्रत। जे स्त्री लोकनि अपन संतति के रक्षा लेल करैत छथिन। ई व्रत निराहार ३०़घंटा सँ ४० घंटा तकके होइत अछि। आ ओहि पूजा मे तेल खैर सँ पितराईन केँ पूजल जाईत छनि।खीरा आऽ औंकरी नैवेद्य दैत कथा सुनैत छथि।तखन पारन कैल जाएत अछि।
