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नेपालमे लिखल गेल पहिल हिन्दू कानून संहिताः विवादरत्नाकर

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लेख – मौलिक इतिहास

श्री गणेशाय नमः

नेपालमे लिखल गेल पहिल हिन्दू कानून संहिताः विवादरत्नाकर

– हिरालाल कर्ण

नेपालमें लिच्छविकाल सौँ परम्परागत रुपमें हिन्दू धर्मशास्त्र, स्मृतिग्रन्थ सभपर आधारित न्यायप्रणाली आ कानुनी व्यवस्था सञ्चालनमें रहल बात इतिहासमें भेटैत अछि । एहि तथ्यके पुष्टि अनन्तलिंगेश्वर महादेव मन्दिरमें रहल मानदेव सम्वत ८० के राजा नरेन्द्रदेवक अभिलेखके अड़तीसम् पंक्तिमें उल्लेखित ‘शास्त्रानुशी’ शब्द आ यागबहालक मानदेव सम्वत १०३ जेष्ठ शुक्ल सप्तमी तिथिक अभिलेखक तीसम् पंक्तिमे रहल ‘धर्मशास्त्र बचनं’ (बज्राचार्य, लिच्छविकालका अभिलेख) शब्द सभसौँ होइत अछि । अर्थात लिच्छवि राजा सभ कोनो आज्ञा, आदेश, परमादेश, सनद जारी करबाकाल वा अन्तरासन, परमासन सौँ न्याय निसाफ करबाकाल हिन्दु धर्मशास्त्र आ स्मृतिग्रन्थ सभक बचनके कानूनी आधारके रुपमें लैत छलाह । पुर्वमध्यकालमें स्मृतिग्रन्थ सभमें उल्लेखित कानूनी व्यवस्थामध्ये निश्चित विषयवस्तुपर आधारित भ’क’ मनु, नारद, बृहस्पति, शुक्र, विष्णु आदिके स्मृति सभक आधारपर कानून संहिता तयार करबाक प्रक्रिया शुरु भेल छल । एहन कानून संहिता सभमें दक्षिण भारतक चालुक्य सम्राट विक्रमादित्य छठमके दरबारमें आश्रित रहल विद्वान विज्ञानेश्वरद्वारा याज्ञवल्क्य स्मृतिक सम्पत्ति उत्तराधिकार सम्बन्धि व्यवस्था सभके समेटिक तयार कयल गेल स्मृति निबन्ध टीका ग्रन्थ ‘मिताक्षरा’ आ बंगालक जिमुतवाहनद्वारा लिखल गेल ‘दायभाग’ उल्लेखनीय अछि । भारतक ब्रिटिश साम्राज्यमें बंगाल लगायत सम्पुर्ण पुर्वोत्तर भारतमें जिमुतवाहनक दायभाग प्रभावकारी छल त बंगाल सौँ पच्छिमक सम्पुर्ण भारतमें विज्ञानेश्वरक मिताक्षराक आधारपर न्याय सम्पादन कयल जाइत छल । विज्ञानेश्वर आ जिमुतवाहनक बाद कन्नौजक लक्ष्मीधर भट्ट सत्रह भागमें कल्पतरु लिखलाह, जे मिथिला आ कन्नौजमें संवैधानिक मान्यता प्राप्त कयने छल ।

मिथिलाक कर्णाट वंशक अन्तिम राजा हरिसिंहदेवक महासन्धिविग्रहिक मन्त्री चण्डेश्वर ठक्कुर (ठाकुर) द्वारा सात भागमें तयार कयल गेल पुस्तक सप्तरत्नाकर मिथिलामें बहुत प्रसिद्धि पउने छल । ओ कर्मादित्यक प्रपौत्र, मन्त्री रत्नाकर देवादित्यक पौत्र आ महासन्धिविग्रहिक वीरेश्वरक पुत्र छलाह । पाछा एहि वंशमें वीरेश्वरक भाइ धीरेश्वरक प्रपौत्र, जयदत्तक पौत्र आ गणपति ठाकुरक पुत्रक रुपमें मैथिली साहित्यक महाकवि विद्यापति जन्म लेने छलाह । चण्डेश्वर ठाकुरक लिखल शुद्धिरत्नाकर, पूजारत्नाकर, दानरत्नाकर, व्यवहाररत्नाकर, गृहस्थरत्नाकर, कृत्यरत्नाकर आ विवादरत्नाकर समेत ई सप्तरत्नाकर संस्कृत साहित्यमें उच्च स्थान रखैत अछि । १३७० ईस्वीमें मिथिलाक ओइनवार वंशक राजा भवेश वा भवसिंहक दरबारमें लगभग ८५ वर्षक आयुमें चण्डेश्वरद्वारा लिखल गेल राजनीति रत्नाकरके हुनकर जीवनक अन्तिम ग्रन्थ मानल जाइत अछि ।

ई आठो रत्नाकर सभमध्ये १३१४ ईस्वीमें भक्तपुर दरबारमें रहिकय लिखल गेल मुद्दामामिला आ न्याय सम्पादन सम्बन्धी पुस्तक विवादरत्नाकर हिन्दू कानून संहिताके रुपमें प्रसिद्ध रहल अछि । एशियाटिक सोसाइटी अफ बंगाल सौँ १९३१ ईस्वीमें प्रकाशित संस्करणक प्रस्तावनामें सम्पादक कमलकृष्ण स्मृतितीर्थ एहि पुस्तकके ‘मिथिला स्कूल अफ लॉ’ कहने छथि ।

चण्डेश्वर ठाकुरक ई हिन्दू कानून संहिताके पुस्तक सर्वप्रथम १८८७ ईस्वीमें दीनानाथशर्मा विद्यालंकारद्वारा एशियाटिक सोसाइटी अफ बंगाल सौँ संस्कृत भाषामें प्रकाशित भेल छल । ‘विवादरत्नाकर अ ट्रीटाइज अन हिन्दु लॉ बाई चण्डेश्वर ठक्कुर’ नाम स’ प्रकाशित कयल गेल उक्त पुस्तकके प्रस्तावनामें संकलक दीनानाथ शर्मा ‘विज्ञापनम्’ शीर्षकमें एहि तरहें लिखै छथि ।

“विवादरत्नाकाराख्यः स्मृतिनिबन्ध एष प्राचीनः प्रामाणिकश्च विशेषेतो मिथिलाप्रदेशेषु । विलुप्तप्रायमेवेमं मन्यमानायां आसियिक–समितेरभ्यनुज्ञया संशोधनेनं मुद्राङ्कनाय अस्य नियुक्तोऽभवम् । स चाहं तदादेशेन तत्समितेः पुस्तकागारापुस्तकमेकं कालिकाता–संस्कृतविद्यालयस्यं स्मृत्याध्यापक श्रीयुक्तमधुसूदनस्मृतिरत्न महाशयसकाशाद्वितीयं पुस्तकं भूतपूर्वपण्डितवर भवशङ्करविद्यारत्नमहाशयस्य दोहित्र–श्रीयुक्ततारापद भट्टाचार्यसकाशातृतीयं पुस्तकं संगृह्य प्रकृष्टप्रयासेन कार्यमेतत्समाहितवान्”

ई प्राचीन स्मृतिनिबन्ध विशेषतः मिथिलाप्रदेशमें प्रमाणिक मानल जाइत अछि । प्रायः विलुप्त मानल गेल एहि पुस्तकक प्रकाशनक वास्ते सम्पादन करबाक लेल एशियाटिक सोसाइटीद्वारा हमरा नियुक्त कयल गेल । समितिक आदेशानुसार ओत्तुक्का पुस्तकालयमें रहल एकटा पुस्तक, दोसर कलकत्ता संस्कृत विद्यालयक स्मृति विषयक अध्यापक श्रीयुक्त मधुसूदन स्मृतिरत्नके सङमें रहल आ तेसर प्रति भूतपूर्व पण्डित भवशङ्कर विद्यारत्नक नाइत श्रीयुक्त तारापद भट्टाचार्य लग स’ बड्ड कष्ट सौँ संकलन क’ क’ एहिमें समायोजन कयने छी ।

१८७७ ईस्वीमें पहिल बेर कलकत्ता स’ प्रकाशित एहि कानुन संहिताके दोसर संस्करण १९३१ ईस्वीमें ओही सोसाइटी स’ महामहोपाध्याय कमलकृष्ण स्मृतितीर्थक सम्पादनमें प्रकाशित कयल गेल छल । संस्कृत भाषामें प्रकाशित एहि संस्करणक प्रस्तावना स्मृतितीर्थ अंग्रेजी आ संस्कृत दुनु भाषामें लिखने छथि । “विवादरत्नाकर अ ट्रीटाइज अन हिन्दु लॉ बाई चण्डेश्वर ठक्कुर (रि–इस्यु)” के नाम स’ प्रकाशित ओही संस्करणक अंग्रेजी प्रस्तावनामें शक सम्वत १२३६ पौष शुक्लपक्ष (१३१४ ईस्वीके दिसम्वर वा १३१५ ईस्वीके जनवरी) में वागमती किनारमें तुलापुरुष दान क’क’ पुस्तक तयार कयल गेल बात लिखने छथि ।

विवादरत्नाकरक प्रारम्भमें एहि तरहें लिखल अछि ।

“नेपालाखिलभूमिपालजयिना धर्म्मेन्दुदुग्धाब्धिना ।
वाग्वत्या सरितस्तटे सुरधुनीसाम्यं दधत्या शुचौ,
मार्गे मासि यथोक्तपुण्यसमये दत्तस्तुलापुरुषः ॥
यो गम्भीरविवादवारिधि जले निर्मज्जतामुद्धृतिं,
कुर्बबन पोत इबोल्लसद्गुणतरुः कीर्ति परामश्रुते ।”

(नेपालक राजा सभके जितक’ वागमती नदीके किनारमें अगहन मासक पुण्य समयमें तुलापुरुष दान कय गम्भीर विवाद सागरके जल सौँ निर्मल भ’ उद्धार (मुक्त) करयबाक लेल ई सद्गुण कीर्ति प्रारम्भ कयलहुँ अछि) । उक्त पुस्तकके अन्तमें अपन सप्तरत्नाकर सभक नाम लिखैत तिथिमिति सहित ग्रन्थ समाप्त कयने छथि ।

“श्रीकृत्यदानव्यवहारादिशुद्धि–
पुुजाविवादेषु गृहस्थकृत्ये ।
रत्नाकरा धर्म्मभुवो निबन्धाः
कृतास्तुलापुरुषदेन सप्त ॥
रसगुणभुजचन्द्रैः सम्मिते शाकवर्षे
सहसि धवलपक्षे वाग्वतीसिन्धुतीरे ।
अदित तुलितमुच्चैरात्मना स्वर्णराशि,
निधिरखिलगुणानामुत्तरः सोमनाथ ॥”

(श्री कृत्य, दान, व्यवहार, शुद्धि, पुजा, विवाद आ गृहस्थ रत्नाकर समेत सातटा तुलापुरुष समान धर्मसम्बन्धि निबन्ध कृति ग्रन्थ सभ तयार कयलहुँ अछि । शक सम्वत १२३६ पौष शुक्लपक्षमें वागमती नदीके तटपर अपन वजन बमोजिम स्वर्णराशि उत्तरके सोमनाथ (पशुपतिनाथ) में चढयलहुँ) । एहि श्लोक सौँ प्रष्ट होइत अछि जे चण्डेश्वर यी सातो रत्नाकर सभ समाप्त कयलाक बाद वागमती तटपर अपन वजन जत्तेक सोना दान कयने छलाह ।

एहि तरहें परम्परागत रुपें हिन्दू धर्मशास्त्र आर स्मृतिग्रन्थ सभपर आधारित भ’क’ चलैत आबिरहल न्यायिक व्यवस्थामें चण्डेश्वर नेपाल उपत्यकामें रहिकय हिन्दु कानुन संहिताके पुस्तक विवादरत्नाकर १३१४ ईस्वीके दिसम्वर वा १३१५ ईस्वीके जनवरीमें लिखक समाप्त कयने छलाह । हुनकर एहि पुस्तकमें मुख्यतः हिन्दु देवानी संहितासम्बन्धि ऋणके लेनदेन, ब्याज, सम्पत्ति उत्तराधिकारसम्बन्धि व्यवस्था, फौजदारी संहितामें चोरी, डकैती, ठगी, हत्या, बलात्कारसम्बन्धि व्यवस्था आ न्यायिक निर्णयसम्बन्धि व्यवस्था सभके एकसय तरङ्ग आ १८७३ टा प्रावधान (१०० परिच्छेद आ १८७३ दफा) सभमें समटल गेल अछि । चण्डेश्वरके विवादरत्नाकर लिखला ४० वर्षक बाद १३५४ ईस्वीमें राजा जयस्थितिमल्ल एहि कानुन संहिताके आधार मानिक मैथिल आ कान्यकुब्ज ब्राम्हण सभक सङहि लामा धर्मगुरु सभके से हो राखिक सामाजिक स्थिति बैसौने छलाह । ओ नेपालमें सामाजिक आर्थिक सुधार कय न्यायिक व्यवस्थाके सुदृढ बनौने छलाह । जयस्थितिमल्ल राजा भेलाक लगभग अढाई सय वर्षक बाद १६०६ ईस्वीमें गोरखाके गद्दीपर आसीन भेल राजा रामशाह सेहो अपना ओहिठाम सामाजिक आर्थिक सुधार कय न्यायिक व्यवस्था सुदृढ कयने इतिहास भेटैत अछि । तैँ हुनका समयमें ‘न्याय नपाउनु गोरखा जानु’ कहबी चलल छल ।

एहि तरहें नेपाल भितरमें लिखल गेल पहिल हिन्दु कानुन संहिता विवादरत्नाकर आदि हिन्दु स्मृतिनिबन्ध ग्रन्थ सभक आधारपर चलैत आबिरहल नेपालक न्यायिक व्यवस्थामें प्रथम राणा प्रधानमन्त्री जङ्गबहादुर राणा वि.स. १९१० में मुलुकी ऐन लागु कय लिखित कानुनके अभ्यास शुरु कयलैन्ह । वि.स. १९१० के एहि मुलुकी ऐन सौँ पहिले नेपालमें लिखल गेल कानुन संहिता विवादरत्नाकर नेपालक पहिल कानुनके पुस्तक रहल बात देखबामें अबैत अछि ।

अतः नेपाल भितरमें लिखल गेल प्रथम कानून संहिता विवादरत्नाकर अछि त नेपालके प्रथम कानुनविदके रुपमें स्मृतिकार चण्डेश्वर ठाकुरक स्थान रहल अछि । नेपालक मधेश प्रदेश अन्तर्गतके बारा जिल्लाके सिमरौनगढमें १०९७ ईस्वी सौँ १३२६ ईस्वीतक अस्तित्वमें रहल कर्णाट राजवंशक राजा शक्तिसिंहदेव (१२८० ई.–१३०३ ई.) के शासनकालमें सम्भवतः १२८०–८५ ई. के मध्यमे स्मृतिकार चण्डेश्वर ठाकुरक जन्म भेल छल । तत्कालिन तिरहुतक कुलिन मैथिल ब्राम्हण परिवारमे अवतरित ठाकुरके नीक लालनपालनक सङ्ग हिन्दु धर्मसंस्कृति आ संस्कृत भाषासाहित्यके नीकस’ अध्ययन करबाक अवसर सेहो भेटल रहैन्ह । नेपालक कानुन साहित्यक क्षेत्रमें पहिल कानुन संहिताक पुस्तक तयार कके ओ हमरा सभपर जे गुण लगाक गेल छथि, ताहि सौँ हमरा सभ सम्पुर्ण नेपाली, भारतीय आ मैथिल जनसमुदायके ऋणी बनौने छथि । हुनका नेपाल आ मिथिलाके प्रथम कानुनविदके रुपमें सम्मान कके विवादरत्नाकरके नेपालक प्रथम कानुन संहिताक पुस्तकके रुपमें राष्ट्रिय स्तरस’ मान्यता प्रदान करबौनाई एखुनका टटका आवश्यकता रहल अछि ।

समाप्त

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