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नैतिक मूल्य आ संस्कार जगा क मानवता सँ जोड़ि कऽ राखब गुरु बिन संभव नै

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लेख विचार
प्रेषित: भावेश चौधरी
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- शिक्षक केर महत्त्व

मानव सभ्यता के उत्थान आ प्रगति मे शिक्षक के भूमिका अद्वितीय, अविस्मरणीय आ अनुपम रहल अछि। शिक्षक केवल ज्ञान-दाता नहि, अपितु समाज के दीपस्तंभ, संस्कृति के संवाहक आ चरित्र-निर्माता छथि।
शिक्षक जीवनक ओ महापुरुष छथि जे अज्ञानक तमसक बीच प्रज्ञानक प्रदीप प्रज्वलित करैत छथि। ओ शिष्य के केवल पठन-पाठन नहि सिखबैत छथि, अपितु जीवनक मूल्य, अनुशासन, धैर्य, सहअस्तित्व आ मानवीय संवेदनशीलता सेहो सिखबैत छथि।

विद्यार्थी के चित्त वृत्ति शिक्षकक संस्कार सँ परिपक्व होइत अछि। एहि कारणेँ प्राचीनकाल सँ गुरु केँ देवता तुल्य मानल गेल अछि। “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः” – एहि श्लोक मे शिक्षकक दिव्यता के अभिव्यक्त कएल गेल अछि।
शिक्षकक कर्तव्य केवल पाठ्यक्रम समाप्त करबाक नहि, बल्कि शिष्यक सुप्त प्रतिभा केँ जागृत करबाक होइत छनि। शिक्षक समाजक ओ मर्मज्ञ व्यक्तित्व छथि जे राष्ट्रक दिशा आ दशा तय करैत छथि। यदि शिक्षक नैतिक मूल्यमान आ अध्यात्मिक चिंतन सँ प्रेरित रहित छथि, त राष्ट्रक भावी पीढ़ी दृढ़, सजग आ समृद्ध बनि सकैत अछि।

भारत भूमि पर गुरु-शिष्यक संबंध अतुलनीय रहल अछि। प्राचीन कालमे विद्यार्थी गुरुकुल जाइत छल, जतए जीवनयापनक आधारभूत मूल्य सँ लऽ विद्या, कला, युद्धकला आ समाजक सेवा करबाक भावना सिखाओल जाइत छल। विद्यार्थी गुरुक आदेश के अपन जीवनक परम कर्तव्य मानि पालन करैत छल। ओहि कालक शिक्षा केवल रोजगारक साधन नहि, बल्कि आत्मज्ञानक यात्रा रहैत छल।
एकटा सही शिक्षकमे अनेको गुण होइत अछि,जेना-
1.धैर्य: विद्यार्थी हजारो बेर गलती करैत अछि, मुदा शिक्षक धैर्यपूर्वक ओहि गलती केँ सुधारैत छथि।
2.सहानुभूति:-ओ छात्रक मनोभाव बुझैत छथि आ तदनुसार मार्गदर्शन दैत छथि।
3.प्रेरणा:शिक्षक अपन व्यवहार आ जीवनशैली सँ विद्यार्थीकेँ प्रेरित करैत छथि।
4.अनुशासन: ओ अपन जीवन आ शिक्षण पद्धति सँ अनुशासनक महत्व सिखबैत छथि।
5.निष्काम भाव: शिक्षक अपन सेवा केँ पेशा नहि, बल्कि तपस्या मानैत छथि।।
आजुक डिजिटल युगमे शिक्षा केवल किताबक पन्ना धरि सीमित नहि अछि। इंटरनेट, मोबाइल आ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) विद्यार्थीकेँ त्वरित ज्ञान तऽ दैत अछि, मुदा नैतिक मूल्य, संस्कार आ सही-गलतक पहचान केवल शिक्षकहि सिखा सकैत छथि।
आजु शिक्षकक जिम्मेदारी दूगुना भऽ गेल अछि –
* एक दिसेँ विद्यार्थीकेँ आधुनिक तकनीक सँ परिचित करब।
* दोसर दिसेँ हुनका भीतर नैतिक मूल्य आ संस्कार जगा क मानवता सँ जोड़ि राखब।
शिक्षकक जीवनमे सबसँ पैघ पुरस्कार छात्रक सफलता होइत अछि। जखन कोनो शिष्य डॉक्टर, वैज्ञानिक, साहित्यकार वा समाजक हितकारी व्यक्ति बनि समाजकेँ सेवा करैत अछि, तखन शिक्षकक आँखि गर्व आ संतोष सँ चमकि उठैत अछि। हुनकर हृदयमे ई अनुभूति होइत अछि जे हुनकर तपस्या सफल भेल।
गुरु-शिष्यक संबंध केवल विद्यालयक चारि दीवारी धरि सीमित नहि रहैत अछि। ई संबंध जीवन भरि जीवित रहैत अछि। विद्यार्थी जहिया धरि जिवैत अछि, ओ अपन शिक्षकक शिक्षा आ प्रेरणा केँ स्मरण करैत रहैत अछि। असलमे, गुरु-शिष्यक संबंध आत्मिक अछि – जेकर तुलना कोनो भौतिक बंधन सँ नहि कएल जा सकैत।
जय मिथिला, जय मैथिली।।

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