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संस्कृति के परिचायक इतिहास के धरोहर मिथिला थिक

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लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :-संस्कृति सँ दर्शन धरि (स्वतंत्र)

मिथिला केर जीवनक रंग आऽ राग
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नै अछि मिथिला मात्र भूगोलक कथा,
जाहि मे बसल अछि आत्मा के व्यथा।
वेद सँ गीत धरि जे बहै मधुर विचार,
ओहि मे नुकायल अछि दर्शन अपार।
कियैक त’
कोना छी? इ कहबो में प्रेम झलकै,
बात-बात मे अपनत्वक दीप दमकै।
मिथिला थिक नेम-धरम के गाम,
जतय लोक रचै अपन गीता-राम।

मैथिली भाषा आऽ संस्कृति केवल लोकाचार, रीति-रिवाज आऽ परंपराक संग्रह नहि अछि। ई एक समग्र जीवन-दृष्टि, एक दर्शन थिक जे जीवनक सब पक्ष के अपने रंग में रंगैत अछि। मिथिला के सभ्यता हजारों वर्ष पुरान अछि, जइमे वैदिक युगक ज्ञान, रामायणक नैतिकता, विद्वान स्त्री-पुरुषक विमर्श आऽ ग्रामीण जनजीवनक सहजता एक संग गूथल अछि। मैथिली एतबा भरि नहि कि किछु लोक गीत, परिधान आऽ तीज-त्योहारक नाम थिक। ई एक गहिर सोच, सजीव दर्शन आऽ अपन अलग “जग-जगत” के बोध कराबय बला जीवनपथ थिक।
मिथिला संस्कृति सँ दर्शन धरि बिराजमान अछि।मिथिला शब्द मात्र एक भूगोल नहि, बल्कि एक भावभूमि थिक जेकर विचार आत्मीयता आऽ अध्यात्मक संगमस्थल थिक। एहि भूमि पर राजनीति “जनक नीति” छल, विद्या “गार्गी-मैत्रेयी” संग नारी चेतना के प्रतीक बनल आऽ विवाह “सीता-राम” सन समर्पण आऽ शील पर आधारित छल। एहिमें हम देखैत छी कि मिथिला के जीवन-चक्र केवल जीविका आऽ जाति-धर्म पर आधारित नहि, बल्कि एक उच्च “दर्शन” सँ प्रेरित छल।

एतवे नहि मिथिला अपन आचार-व्यवहार मे एक दर्शन थिक। मिथिला मे लोक व्यवहार के मूल में विनय, विवेक आऽ स्नेह के दर्शन अछि। “बड़का सन सधेस” कहब हो, वा “कोना छी, नीक-ठीक?” ई सभ आत्मीयताक दर्शन थिक, जतए संबंध कर्तव्यपरक नहि, प्रेमपरक होइत अछि। स्त्री के दृष्टिकोण सँ अपन दर्शन एहि तरहे सुसज्जित अछि। मिथिला के नारी केवल “गृहिणी” नहि रहि गार्गी, मैत्रेयी, सीता सभ अपन-अपन रूप में दार्शनिक चेतना के प्रतिनिधित्व कैलन्ह। सीता के “धरणी पुत्री” होयब, गार्गी के याज्ञवल्क्य सँ शास्त्रार्थ ई मिथिला में स्त्री चेतना के एक ऊँच स्थान दैत अछि, जे आजुक नारीवाद सँ बहुत पहिने एक गूढ़ दर्शन प्रस्तुत करैत रहल अछि।
मिथिला के लोककला आऽ जीवन-दृष्टि एहि तरहक अछि। मिथिला पेंटिंग मे रंगक दर्शन दृष्टिगोचर होइछ। मिथिला चित्रकारी केवल सौंदर्यक कलात्मक अभिव्यक्ति नहि, एक आध्यात्मिक कथा-वाचन थिक। एहि चित्रकला मे लोक जीवन, प्रकृति, देवी-देवताक संग जीवन के चक्र आऽ पंचतत्वक तत्त्वदर्शन प्रकट होइत अछि।
लोकगीत के नजरिया सँ ज’ देखब त’ शब्दक साधना हमर संस्कृति के रग रग मे समाहित अछि। मैथिली लोकगीत विवाह गीत, समदौन, झिझिया, कजरी सभ मे एक गहिर दर्शन बर्खा, प्रेम, विछोह, सामाजिक संबंध आऽ धार्मिक भावनाकेँ जोड़ैत अछि। एतए “गीत” केवल मनोरंजन नहि, बल्कि चेतना जागरणक अदुतिय माध्यम थिक।
मैथिली भाषा सर्वोच्च कोटि के विचार संप्रेषणक जीवन-धारा मे अबैत अछि। कियैक त’ मैथिली भाषा में “संवेदना” आऽ “सौंदर्य” के अद्भुत संतुलन अछि। यैह भाषा एहेन थिक जाहि मे बिनु गाइर देने विरोध कएल जा सकैछ, बिनु तामस भेने प्रेम प्रकट कएल जा सकैछ। अतः हमरा जनैत मैथिली केवल बोलचालक माध्यम नहि अपितु विचार के रूपांतरणक एक दार्शनिक यंत्र थिक। उदाहरण के लेल “हम अहाँ सँ बहुत सनेह करै छी” ई वाक्य मे प्रेमक भावना, शिष्टाचार आऽ आत्मीयता के त्रिवेणी बहैत अछि। “भोर भेने उठू, संध्या सं ध्यान करू” ई एक सामान्य उपदेश नहि अपितु एक यौगिक जीवन-दृष्टि थिक।
आर त’ आर मिथिला दर्शन मे प्रकृति-संवाद संभव अछि। मिथिला दर्शन मे प्रकृति “अवकाश” नहि, “अभिन्न अंग” थिक। तुलसी, पीपर, बांस, आम, पोखरि सभ किछु के प्रतीकात्मक महत्व अछि। विवाह में माटि के गीत, वर्षा मे पतरघट गीत, छइठ मे सूर्य आराधना सभमें प्रकृति के संग जीवंत संवाद होइत अछि।
अंततः निष्कर्ष ई जे मैथिली केवल भाषिक समूह वा सांस्कृतिक पहचान तक सीमित नहि, बल्कि एक संपूर्ण जीवन-दर्शन थिक जइमे वैदिक परंपरा, लौकिक व्यवहार, लोककला, नारी चेतना, पर्यावरणीय संतुलन आऽ अध्यात्मक संगम होइत अछि। ई दर्शन कहैत अछि “सादा जीवन, उच्च विचार”, “शब्द में प्रीति आऽ व्यवहार में नीति”।
मिथिला केँ जँ बुझय चाही, तऽ ओकर लोकगीत सुनू, ओकर स्त्री सँ गप्प करू, ओकर पोखरि तट पर सांझ क बैसु तखन बुझायत जे मैथिली मात्र संस्कृति नहि, जीवन जीबाक एक सुंदर तरीका थिक।

मिथिला जीवनक सत्य मार्ग बताबै,
राग-स्नेह सँ सभक हिय पिघलाबै।
शब्द, रंग, संस्कार सम्हारै,
ओ जीवन-दर्शन रूपें उद्गारै।
कियैक त’
पोखरि-कात बैसि सुनू गीत आऽ गप्प,
मिथिला में रहै जीवनक सच्चा थाप।
भाषा, कला आऽ विचारक गंगा,
मिथिला दर्शन सँ सजल सुगंधा।

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