लेख विचार
प्रेषित: मीना मिश्रा मुक्ता
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :-आकांक्षा और महात्वाकांक्षा ( स्वतंत्र)
आकांक्षा और महात्वाकांक्षा दुनू कतेक मिलैत शब्द अछि। मानव जीवन में एकर अर्थ सेहो यदा-कदा समान होइत अछि। मुदा ,कखनो-कखनो मनुष्य अपन कर्म’क द्वारा एकर परिभाषा बदलि दैत अछि।
यदि मानव मन कोनो चीज प्राप्त करैक तीब्र आकांक्षा करैत अछि त ओकरा प्राप्त करै मे ओ अपन संम्पूर्ण शारीरिक और मानसिक ऊर्जा लगा दैत अछि। उच्च आकांक्षा मनुष्य के अपन लक्ष्य प्राप्ति में अदम्य साहस और शक्ति दैत छै ।और मनुष्य अपन जीवन’क संग-संग अपन परिवार और समाज के सेहो सकारात्मक शक्ति सं सींचिंत करैत अछि।ई आकांक्षा मनुख के एकटा नीक नागरिक, सम्मानित जीवन दैत छक आ जीवन’क उपलब्धि सं आंतरिक प्रसन्नता भेटैछ।
आओर यदि कोनो बस्तु प्राप्त करैक तिब्र महत्त्वाकांक्षा करैत अछि त कखनो-कखनो मनुख के गलत बाट दिस मोड़ि दैत छै। मनुख अपन अत्यधिक महत्वाकांक्षा क वश में भ’ कखनो -कखनो अपन सामर्थ्य बिसरि जाईत अछी ।ओकरा प्राप्त करबा में लक्ष्य भ्रमित भ’ जाईत अछि। अति महत्वाकांक्षा मनुष्य के मानसिक और शारीरिक शक्ति क दिशा और दशा बदलि दैत अछि। ई मानव संग-संग ओकर परिवार और समाजक लेल अभिशाप बनि जाइत अछि।ने ओ स्वयं किछु उपलब्ध क’ पबैत अछि ने समाज में कोनो नीक उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि।
तात्पर्य, आकांक्षा सफलताक सीढ़ी थिक।मुदा महात्वाकांक्षा अगर बलवती भै जाय त कनी बिचारक आवश्यकता अछि।कखनो-कखनो उच्च महात्वाकांक्षाक मानव के पथभ्रमित कै दैत अछि।
घृतराष्ट और दुर्योधन’क उच्च महात्वाकांक्षा’क फल तत्कालीन समाज”महाभारत”क रूपें भोगलक।जे सर्वविदित अछि।
