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पुनर्विवाह संकोच नहि सम्मान केर संग संबंध बनैब थीक

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लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- मिथिला मे साओन मास केर महत्व

विधवा नहि मृत, नव आरंभक हकदार अछि स्त्री (सामाजिक, सांस्कृतिक आऽ वैचारिक विमर्श)

परंपराक बंधन मे बान्हल, नारीक जीवन रूकि गेल,
विधिक संग चेतना जागल, पुनरारंभक बात उठी रहल।

पुनर्विवाह अर्थात पहिल विवाह विफल होयबाक पश्चात अथवा पति या पत्नीक मृत्यु उपरांत दोसर विवाह करब एहेन सामाजिक व्यवस्था पर मैथिल समाजक दृष्टिकोण सदति द्वंद्वपूर्ण रहल अछि। मिथिला एक पारंपरिक, सांस्कृतिक रूप सँ समृद्ध आऽ ब्राह्मणवादी मर्यादाक अनुकरण करनिहार समाज जहिठाम विवाह मात्र व्यक्तिगत नहि, बल्कि पारिवारिक, जातीय आऽ धार्मिक बंधन सेहो मानल जाइत अछि। एहने समाज मे पुनर्विवाह पर विचार करब समयानुकूल, संवेदनशील आऽ यथार्थपरक आवश्यक भ’ गेल अछि।
मैथिल के पारंपरिक दृष्टिकोण के अनुसार मिथिलाक पारंपरिक समाज विशेष रूप सँ स्त्रीक पुनर्विवाह के प्रति उदासीन आऽ नकारात्मक रहल अछि। विशेषतः विधवा स्त्री लेल समाजक नियम कठोर रहल विधवा स्त्री केँ पुनर्विवाह करबाक स्वतंत्रता सामाजिक रूप सँ स्वीकार्य नहिं रहल। कतेको विधवा केँ सामाजिक साज-सज्जा, वस्त्र, रंग आदि पर बंधन छल। सती प्रथा के अवशेष स्वरूप विधवा स्त्रीक जीवन उपेक्षा, संकोच आऽ सामाजिक मृत्युसमान बनि जाइत छल।
हालाँकि, पुरुषक पुनर्विवाह खास क’ जे पत्नीक मृत्यु भ’ गेल हो अपेक्षाकृत सहज रूपे स्वीकार्य रहल अछि। एहेन दोहरापन स्त्री-पुरुष समानता के प्रश्नचिह्न पर राखैत अछि।
मिथिलाक लोकगीत, कथा-गाथा आऽ नारी-उन्मुख लोककथन में पुनर्विवाह सँ जुड़ल पीड़ा, तिरस्कार आऽ सामाजिक विरोध अभिव्यक्त भेल अछि। लोकगीत में “विधवा के पातर पातर अन्न”, “सफेद धोती पहिरैके” आऽ “सिंदूर नञि रहए माथ” आदि भावधारा समाजक मानसिकता केँ उजागर करैत अछि।
भारतीय संविधान स्त्री-पुरुष दुनू केँ समान अधिकार दैत अछि। ‘हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (१८५६)’ सँ ल’ क’ ‘हिन्दू विवाह अधिनियम (१९५५)’ धरि विधिक स्तर पर पुनर्विवाह केँ स्वीकृति देल गेल अछि।

मिथिला मे सेहो नव शिक्षित वर्ग, विशेष रूप सँ शहरी आऽ प्रगतिशील परिवार पुनर्विवाह केँ एक सकारात्मक विकल्प रूपें स्वीकार करए लागल अछि विधवा, तलाकशुदा, वा पति द्वारा त्यागल स्त्री लेल नव जीवन आरंभ करबाक अवसर।
नारीक आत्मनिर्भरता आऽ स्वाभिमान के सुदृढ़ करबाक प्रयास। संतानवती स्त्री लेल बाल-बच्चा संग सुरक्षित, स्नेहपूर्ण जीवन।
यद्यपि शिक्षित समाज मे जागृति आयल अछि, मुदा निम्नलिखित कारणसँ पुनर्विवाह पूर्ण रूपे सामाजिक रूप सँ स्थापित नहिं भ’ सकल अछि।जातिगत परंपरा के अनुसार मैथिल ब्राह्मण वा अन्य उच्च जातिक परिवार मे पुनर्विवाह केँ अस्वीकार्य मानल जाइत अछि। सामाजिक ताना-बाना के अंतर्गत पुनर्विवाह करनिहार स्त्री पर चरित्रक प्रश्न उठेनाइ सामान्य मान्यता अछि।
संपत्ति आऽ उत्तराधिकार के कारण विशेष क’ संतानवती स्त्री के पुनर्विवाह पर संपत्ति विवाद सेहो बाधक बनैत अछि।
मानसिक द्वंद्व के हम एहेन विमर्श करवाक समय अवहेलना सेहो नहि कय सकैत छी। जाहि के कारण स्त्री स्वयं सेहो अपन अधिकार पर स्पष्ट नहि भ’ पबैत छथि की ई निर्णय समाज लेत कि ओ स्वयं?
लेकिन संतोष त’ तखन होइत अछि जखन समाज में भविष्यक दिशा आऽ परिवर्तनक संकेत देखैत छी। वर्तमान समय मे विधवा पुनर्विवाह लेल सामाजिक संगठन आऽ महिला सशक्तिकरण केंद्र प्रयासरत अछि। सोशल मीडिया, टीवी धारावाहिक, फिल्मसभ द्वारा एहि विमर्श के जनमानस तक पहुँचायल जा रहल अछि। नव पीढ़ी (विशेष रूपें महिला) अपन भविष्यक निर्णय ल’ रहल छथि।
निष्कर्ष ई जे मिथिलाक सामाजिक ढाँचा परंपराक नींव पर खसल अछि, मुदा समय अनुसार समाज के बदलनाइ आवश्यक अछि। पुनर्विवाह ने केवल एक मानवाधिकार, बल्कि एक संवेदनशील मानवीय विकल्प सेहो अछि। मिथिला मे एहि पर गम्भीर विमर्श, सामाजिक अभियान आऽ कथा-साहित्य में स्थान देल जाय जाहिसँ एक समावेशी, सहानुभूतिपूर्ण आऽ न्यायपूर्ण समाजक निर्माण होइ।
अंत मे संदेश….”पुनर्विवाह संकोच नहि, नव जीवनक अधिकार छी। मिथिला जँ सीता सँ सीख ल’ सकैए, तऽ नव सीता केँ पुनरारंभ करबाक अधिकार सेहो देबाक समय आबि गेल अछि।”

पुनर्विवाहक अधिकार नारी कऽ, संकोच नहि, सम्मान होइ,
सीता सन स्वाभिमानी मिथिला, नव दिशाक पहिचान होइ।

दिलीप झा “ललित”

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