लेख विचार
प्रेषित: आभा झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- पुनर्विवाह
पुनर्विवाह नहि, ई पुनर्जीवन अछि
विवाह जीवनक एक महत्वपूर्ण पड़ाव मानल जाइत अछि। मुदा जखन ई संग छूटि जाइत अछि — मृत्यु सँ वा तलाकक रूप में — तखन जीवन ठमकि जाइत अछि। एकाएक सब किछु बदलि जाइत अछि। ओ संग जे हमर हर्ष-दुखक सहभागी छल, ओ जखन नहि रहि जाइत अछि, त’ जीवनक खालीपन शब्द सँ परे होइत अछि। एहेन समय में, जँ कोनो व्यक्ति फेर सँ संग पएबाक चाह रखैत अछि, त’ से केवल पुनर्विवाह नहि, बल्कि पुनर्जीवन होइत अछि।
समाज में एखनहुं पुनर्विवाह के ल’ क’ बहुत रास पूर्वाग्रह अछि। खास क’ महिलाक पुनर्विवाह पर लोक आ समाजक दृष्टिकोण संकीर्ण रहैत अछि। विधवा वा तलाकशुदा स्त्री जँ दोसर विवाहक निर्णय लैत अछि, त’ ओकर चरित्र, निर्णय क्षमता आ माँ-पिता बनबाक योग्यता पर सवाल उठाओल जाइत अछि। मुदा एकटा प्रश्न ईहो अछि — कि कोनो स्त्री वा पुरुष अपन जिनगी में फेर सँ खुश रहबाक अधिकार राखैत अछि वा नहि?
पुनर्विवाह के निर्णय केवल सामाजिक या कानूनी प्रक्रिया नहि होइत अछि। ई निर्णय बहुत साहस आ आत्मबल मांगैत अछि। विछिन्न भेल संबंधक पीड़ा, समाजक आलोचना, परिवारक दवाब — एहेन परिस्थितिमे फेर सँ कोनो नव संबंधक स्वीकार्यता, नव विश्वासक निर्माण — ई सब आसान नहि होइत अछि।
एखन समाज बदलि रहल अछि। बहुत रास लोक पुनर्विवाह के सकारात्मक दृष्टिकोण सँ देख’ लागल अछि। विशेषतः जखन ओहि परिवार में बच्चा होइत अछि, त’ पुनर्विवाह सँ ओ बच्चा केँ सेहो दोसर अभिभावकक स्नेह, सुरक्षा आ स्थायित्व भेटैत अछि। पुनर्विवाह ओहि महिला-पुरुष के लेल एक नव आशा अनैत अछि — जे अपन जिनगी में फेर सँ प्रेम, अपनापन आ सम्मान चाहैत अछि।
एकटा विधवा जँ फेर सँ विवाह करय चाहैत अछि, त’ से ओकर अधिकार छी, दया नहि। एकटा पुरुष जँ असफल विवाहक बाद फेर सँ अपन जीवन केँ संगी बनाबै चाहैत अछि, त’ से ओकर कमजोरी नहि, बल्कि पुनः जीबाक इच्छाशक्ति छी।
पुनर्विवाह के संग एकटा नव संबंध बनैत अछि, मुदा ओहि संग-संग ओहि व्यक्ति केँ आत्मसम्मान, सम्मान आ सहारा सेहो भेटैत अछि। जेकरा जिनगीक रस्ता अधूरा रहि गेल रहय, ओ फेर सँ पूर्णता दिस बढ़ैत अछि। ई संबंध कखनो-कखनो पहिने सँ बेसी मजबूत होइत अछि, कारण एत’ अनुभव, समझदारी आ सहानुभूति होइत अछि।
समाज केँ चाही जे ओ पुनर्विवाह के कोनो दोष नहि, बल्कि नव संभावना के रूप में देखय। एहि सोच केँ विद्यालय, मीडिया आ परिवारक स्तर पर बढ़ावा देबाक आवश्यकता अछि। बच्चा सभ केँ एहि तरहक उदाहरण देखेबाक चाही जे जीवनक एकटा अध्याय बंद भेला सँ खत्म नहि होइत अछि — फेर सँ शुरू कएल जा सकैत अछि।
अंततः, पुनर्विवाह एकटा नव जीवन यात्रा छी — नव उमंग, नव विश्वास आ नव संबंधक संग। एत’ केवल दू व्यक्ति नहि, बल्कि दू आत्मा फेर सँ विश्वासक सेतु पर मिलै छथि।
समाज जतेक तरक्की केलक, स्त्रीक जीवन में विधवा भेला पर अन्हार भरि जाइत छलैक। मुदा पुनर्विवाह ओ अन्हार में आशाक दीप बनि क’ अयलाह।
ईश्वरचंद्र विद्यासागर जेहेन समाज सुधारक लोकनिक प्रयास सँ पुनर्विवाह एक सामाजिक क्रांति बनि गेल।
एहिसँ नारी केँ दोसर मौका भेटल, जीबैकेँ, स्नेह पाबैकेँ, सम्मानसँ समाज में ठाढ़ होएबाक।
पुनर्विवाह केवल वैवाहिक संबंध नहि, ई सोचक बदलाव, मानवता आ समानताक प्रतीक अछि।
आइयो ई संदेश दैत अछि—
जीवन खतम नै होइत छै, फेर सँ शुरू करबाक साहस होइत छै।
तें, एकर नाम केवल पुनर्विवाह नहि होयबाक चाही — ई तऽ पुनर्जीवन छी। जय मिथिला, जय मैथिली।
