पुनर्विवाह! समाज’क एक आवश्यक डेग उचित -अनुचित दुनू देखैत
प्रारंभ करै सँ पहिले किछु पाछाँ चलैत छी।आई सँ पैंतीस -चालिस बरख पहिले,नेनपन मे गाम मे टोल परोस मे कतेको दीदी, मैंया सब आस-पास देखाथि। जे सब हमर पिताजी सभ’क पीसी कहाथि। सुंदर, सौम्य,या किछु चंचल सन सेहो , समाज मे बेसी देखाथि। जखन किछु और पैघ भेलौं त हुनकर सभक बिषय किछु रहस्यमय आ हास्यास्पद बात सब सेहो सुनी। मुदा हुनका
सभक स्थिति बड सोचनीय आ दयनीय रहनि। समाज मे ओ सब कोनो तरहे गुज़र करथि। ओ सब सबहक कार्य मे सहयोग करथि मुदा कोना बिशेष इज्जत नै छलनि हुनकर सभ’क समाज मे।
आब जखन पाछू घुमि सोचैत छी त लगैत अछि जे कारण कोनो होऊ , बेमेल विवाह,बाल विवाह अथवा परित्यक्ता,ने हुनका समाज मे खाश इज्जत भेटनि आ हमरा ई कहबा मे कनियो हिचक नै भ’ रहल जे ओ सब समाजिक-सुब्यवस्था लेल सेहो ठीक नै छल। समाज मे झांपल पर्दे पहिलो कम कुकृति नै होई छल।
आब जखन गाम-घर जाईत छी त’ओहन स्त्री-गन के कम देखैत छी त आत्मिक संतोष होईत अछि।
विवाह दू मनुख’क बीच होई’तो एकटा सामाजिक प्रक्रिया थिक। और तें एहि सं सम्बंधित कोनो सकारात्मक आ नकारात्मक परिणाम समाज पर अपन प्रभाव छोड़ैत अछि ।त पुनर्विवाह केर बिषय मे समाज के अवश्य सोचबाक चाही।
आब बेटी’क माय-बाप अगर कम कमाई छनि अथवा खाश शिक्षित नहियो छथि तइयो आब अपन धिया ल’ पहिले सं बेसी अवश्य सोचैत छथि। एहना मे यदि हुनकर बेटी संग कोनो अप्रीय घटना भ’ जानि विवाह’क बाद त ओ अत्यंत दुखी होईत छथि। अपन बेटी क जीवन सुधारक लेल पुनर्विवाह कर चाहैत छथि। एहना मे जाबत हुनकर व्यथा व्यक्तिगत रहैत अछि समाज के किछु खाश फर्क नै पड़ैत छै। मुदा जखन ओ माय-बाप या ओ भुक्ता कोनो डेग उठब’ चाहैत अछि त’ समाज’क किछु ठेकेदार विरोध मे ठार भ’ जाईत छथि। ई कतेक उचित?
अरे अहां अगर सोच’ चाहैत छी त’ ओहि परिवार लेल नीक मार्गदर्शन युक्त बाट ताकू। नहि त ओ जे कर’ चाहै छै कर दियौ। ई देखबा मे व्यक्तिगत लगैत अछि मुदा निश्चित एहि सँ समाज’क स्थिति साफ-सुथरा हैत।
तें जतय आवश्यक हो,जकरा जीवन कऽ बेहतर बनबै लेल आवश्यक हो पुनर्विवाह उचित,और आवश्यक।
आब एतय हमरा सब के दू टा पहलू देखा रहल। आई मिथिला समाज सेहो खाश समृद्धिशाली भ चुकल। नगर-नगर पसरति विदेश तक अपन आधिपत्य जमौलक।
एहना मे कतहु अत्यधिक शिक्षित आत्मनिर्भर बेटी छथि त कतहु एखन धीया अपन बाट बना रहल छथि त ‘ कतहु एखनो अशिक्षित आ पराधीन। एहना मे परिणाम सेहो भिन्न अछि।
जे बेटी -बेटा विशेष शिक्षित और आत्मनिर्भर छथि ओ एक ट्रेंड बना लै छथि जे एकटा सं नै निभल त दोसर ,दोसर सँ नै निभल त’ तेसर। ई सर्वथा अनुचित और एकर दुष्परिणाम समाज और ओहि संतान केर माय-बाप भोगैत छथि। तें नव पीढ़ी के ई बुझब आवश्यक कि विवाह चाहे अपन पसीन सँ होई अथवा माय-बापक पसीन सँ बिना सामंजस्य और सहयोग के नहि चलैत छै। एहि पर ध्यान देथि। विवाह क लेल उचित पात्र चुनैक कोशिश करथि।
जे स्त्री के बिना कोनो कारण के परित्याग क देल जानि अथवा किछु अप्रिय हुए हुनकर विवाह अवश्य हेबाक चाही और समाज के एकरा लेल आगू अबैक चाही।धीया-पूता के सुख-सुविधा दै संग ओकर शिक्षा पर विशेष ध्यान राखैक चाही।
