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दु परिवारक सुरक्षा हेतु उचित डेग अछि पुनर्विवाह

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लेख विचार
प्रेषित: अर्चना मिश्र अर्शी
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :-_पुनर्विवाह
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पुनर्विवाह !
ई शब्द तहिया लोक बजैसँ पहिने सोचैत छल ,,,
बाजू की नहि ,की प्रतिक्रिया हेतै बजला उत्तर आर नहि जायनि कतेक तरहक सवाल जवाब मन मे अबैत छल होइतनि ताहि दिनक लोककें।
लेकिन पुरुष प्रधान समाजमे हुनके बनाओल नियम सब पालन करैत छल ! पुरुष बजैत छलाह “कनिया कोनो फुटहा त नहि जे दांतक जरूरत परत” ,कहवाक तात्पर्य ई जे ओ बुढ़रियो मे बियाह करै ल’ बेचैन रहैत छलाह,,,,
मुदा लड़की के हाथक अगर मेहदी के रंगों नै मलिन भेल आ ओ ई दोड़ सं गुजरै छथि त हुनका लेल बजनाइयो पाप छियनि तहिया लोक अपन मान मर्यादा खातिर ओहन बेटी के नैहरे मे राखि लैत छलाह।सासुर नै जाय दैत छलखिन! घरक कोनो कोनमे अपन जीवन यापन करैत छली। देवता पितरक सेवा मे समय व्यतित होइनि।
—-मुदा!
सबहक बेर बिपतिमे ओ ठाढ़ रहैत छली मजगूत खूट्टा सन! लेकिन वैह समाज अपन मुँहसँ नहि निकालैत छलाह एकर जिनगी अखन पूरा परल छै दोसर विवाह करा देबाक चाही।ई सोच नहि रहनि ताहि दिनक लोककें ,,,,ओ सबहक नजरिक कांट बनल रहैत छली आ चिप्पी लागल नुआ सँ अप्पन लाज छपैत रहथि। मुदा आवाज नहि मुँह सँ निकलनि।
सभ युगमे मर्यादाक हनन करैबला व्यक्ति किछु ने किछु रहैत छथि आ ओहिमे पिसाइत स्त्री।
आब शिक्षित स्त्रीगण सभ अप्पन विचार अप्पन ढ़ंग सँ रखैत छथि आ अमल करैत छथि।
पुनर्विवाह करेबामे आइ के युगमे माय बाप संग दैत छथिन अगर घर सँ सहयोग भेटैत छैक त बाहर बला किछु नहि बाजि सकैत अछि।ओना लड़की अप्पन नीक बेजाय अपने सोचैमे सक्षम छथि।
हमर आत्मामे एकटा सवाल घुड़िया रहल अछि अगर कियो पुरुष पुनर्विवाह करैत छथि त ओहो किनको ने किनको बेटीसं तं भिन्नता कोना ओहो युगमे?
____लेकिन ई कहि सकैत छीए जे जबरदस्ती लोक जाति दुआरें गरीब लड़की सँ विवाह क’ लैत छलाह किछु त टाका द’ जाति किनैत छलाह।
आब स्त्री पुरुष मे सामंजस्य दुआरें छुट्टम छुट्टा भ” जाइत छनि।आ तुरन्त पुनर्विवाह तिस अग्रसर भ’ जाइत छथि ,,,,,चाहे ओ स्त्री रहोथ वा पुरुष।
ओना अखनो बहुत हत तक लड़की उच्य पदपर कार्य करैत अपन निर्णय माय बापपर छोड़ि दैत छथिन।आ हुनकहि विचारक सम्मान करैत छथि।
लड़की के शिक्षित भेनाइ बहुत आवश्यक छैक।
एहिसँ ओ अप्पन जीवन यापन त करबै करती संग संग सोचमे परिवर्तन रहतनि! आ कोनो एहन समर्थन नहि करती जाहिसँ जीवन पर्यन्त कष्ट रहतनि।ओ अप्पन विचार पर अधिकार पूर्वक अमल करती।

 

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