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मिथिला मे ऋतु, राग आऽ श्रद्धाक जीवंत उत्सव थीक साओन

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लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- मिथिला मे साओन मास केर महत्व

मिथिला मे ऋतु, राग आऽ श्रद्धाक जीवंत उत्सव “सावन”

  • बरखा बिनु बैराग न जमे,
    सावन बिन श्रृंगार।
    मिथिला के माटि मे समाहित ई कहावत सावन मास के केवल ऋतु नहि, बल्कि भावना, परंपरा, भक्ति आऽ प्रकृति संग सजीव संबंध के द्योतक बनि गेल अछि। सावन मास मिथिला मे प्रकृति-पूजन, शिवभक्ति, नारी सौंदर्य, प्रेम, विरह आऽ कृषि चेतना के महा उत्सव थिक।
    ऋतु रूप मे सावन हरियाली के संवाहक रूप मे जानल जाइत अछि। सावन मास वर्षा ऋतुक मध्य काल होइत अछि। मिथिला जे मुख्यतः कृषि पर आधारित प्रदेश अछि, ताहि लेल सावन मास जीवन के नवा चक्र के प्रारंभक रूप मे मानल जाइत अछि। खेत मे रोपनी, गाछ मे नवका पात, पोखरि मे पानी भरि गेल, लोकक चेहरा पर हरियाली ई सब सावन मासक संकेत थिक।
    सावन में लोक “हरियाली तीज”, “नाग पंचमी”, “मधुश्रावणी” आदि पर्व मनबैत अछि जे प्रकृति आऽ स्त्री के आत्मीय संबंध पर बल दैत अछि।
    मिथिला मे सावन मास विशेष रूप सँ भगवान शिव के समर्पित मानल जाइत अछि। “बाबा बैद्यनाथ” धाम (देवघर) जेबाक मिथिलावासी लोकनिक एकटा विशेष आस्था होइत अछि। बहुत रास लोक “कांवड़” लऽ कऽ बैद्यनाथ धाम जल चढ़ेबै छैथ।
    महिलासभ सोमवारी व्रत रखैत छथि, शिवजी के ध्यान करैत छथि “ऊँ नमः शिवाय” के जप सँ घर-परिवार मे सुख, शांति आऽ कल्याणक कामना करैत छथि। मिथिला मे व्रत-उपवास के संग कथा-श्रवण आऽ सामूहिक पूजा करबाक परंपरा रहल अछि।
    सावन में विवाहित स्त्रीक जीवन यज्ञ “मधुश्रावणी” के कोना बिसरि सकैत छी। मिथिला मे नवविवाहिता स्त्री द्वारा सावन मास मे पंद्रह दिन तक “मधुश्रावणी व्रत” राखल जाइत अछि। ई पाबैन प्रकृति, सर्प, शिव-पार्वती, गाछ-बिरिछ, कीड़ा-मकोड़ा सभक पूजन के माध्यम सँ स्त्रीक सामाजिक, मानसिक आऽ धार्मिक जीवन के संरचना करैत अछि।
    ई व्रत स्त्री केँ पति-पत्नी सम्बन्ध मे श्रद्धा, समर्पण आऽ स्थायित्व के बोध कराबैत अछि। संगे, ई प्रकृति सँ सामंजस्य स्थापित करबाक सिख दैत अछि।
    सावन मास मिथिलाक लोकजीवन में कजरी, झूला गीत, विरह गीत, सावनी गीत आदि के रूप मे संगीतक रंग भरि दैत अछि। पीपरक गाछ तर झूला पर गीत गबैत स्त्री सभक गीत “पीपर तर झूला पड़ल छै, हरियर चुनरिया उड़ल छै।” जेहन गीत मिथिला के सांस्कृतिक चेतना के प्रतिबिंब दैत अछि। विरह गीत जकरा मे पिया सँ बिछड़ल नायिका अपन भाव प्रकट करैत अछि, ओहो सावन मास के एकटा कोमल अनुभूति दैत अछि।
  •  सावन मास पर्यावरणीय चेतना आऽ जैविक सहजीवन के लेल जानल जाइत अछि। मिथिला के परंपरा मे सावन मास के समय गाछ-वृक्ष लगौनाय, गाछक पूजा करब, साँपक पूजा करब ई सभ पर्यावरणीय दृष्टिकोण सँ बहुत महत्वपूर्ण अछि। मधुश्रावणी में खास कऽ बरगद, पीपर, नीम, दूब, बेल आदि के पूजा करैत छथि। एहि परंपरा में जैविक विविधता सँ जुड़ाव आऽ सहजीवन के आधार पर जीवनशैली के गढ़ल गेल अछि।
    सावन में सौंदर्य आऽ श्रृंगार रस के बहुत महत्त्व देखल जाइत अछि। स्त्री सभ सावन में हरियर साड़ी, काजर, मेंहदी, चूड़ी, झूला सभ तरह के श्रृंगार करैत छथि। श्रृंगार आऽ सौंदर्य के एहि पर्व मे विशेष स्थान रहैत अछि, जे स्त्रीक आत्माभिव्यक्ति के मंच प्रदान करैत अछि।
    “हरियर लुगड़ी पिन्हन बेटी, सावन अएल सखिए।” एहन लोकगीत मिथिला के नारी सौंदर्य आऽ मौसमी उल्लास के बखान करैत अछि।
    सावन के व्याखया विरहक भाव आऽ प्रेमक प्रतीक्षा के बिना न्याय संगत कथमापि नहि होयत। सावन मास के लोकसाहित्य में प्रेमिकाक विरह पीड़ा एक महत्वपूर्ण स्थान रखैत अछि। पिया के नैहर सँ ससुराल लऽ जाय बला समय, ओहि मे बदरी, बरखा आऽ नयन नोर के संग गीत बनैत अछि “बदरिया घेरि अइल गगनमा,
    पिया बिनु मन के नहिं लागे अंगना” एहन अभिव्यक्ति सब मिथिला नारीक कोमल मनोदशा के उद्घाटित करैत अछि।
    सावन मास मिथिला मे केवल ऋतु नहि, अपितु एक जीयल-जागल उत्सव थिक। ई मास जीवन के प्रकृति संग जोड़ैत अछि, धर्म के सहज रूप मे प्रतिष्ठित करैत अछि, स्त्री के आत्म-प्रकाश देैत अछि आऽ लोक-परंपरा के जीवंत रखैत अछि।
    मिथिला मे सावन मास सन धार्मिक, सांस्कृतिक आऽ पर्यावरणीय परिपूर्णता वाला समय विरले भेटैत अछि। एहन मे एहिकेँ सँजोबाक, नव पीढ़ी मे संचार करबाक आऽ सावन के केवल “बरखा” नहि बल्कि “संवेदना” रूप मे अनुभव करबाक आवश्यकता अछि।
    सावन अबीते जन जन के मस्तिष्क मे तरंगित होमय लगैत छैक एक गोट संवेदना…..

बदरिया गाबै शिवगुन गाथा,
मिथिला झूमै प्रेमक छाया।
मेंहदी रचल, चूड़ी खनकै,
सावन में नारी हिय धनकै।
पीपर तर पूजा, बेलक छाया,
सावन देलक धरती नव माया।

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