लेख-विचार
स्वतंत्रता बनाम अनुशासन
– चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती अपन पुस्तक ‘द वेदाज’ अन्तर्गत ‘वेदक उपांगः धर्मशास्त्र’ नामक अध्याय मे लिखने छथि ।
एतय हम किछु सामान्य बात सब कहब । कोनो विषयक विश्लेषण कियो कतबो गहींर करय या कियो कतबो विस्तार सँ करबाक प्रयास करय, मुदा जीवन-काल मे जे असंख्य परिस्थिति सभक सामना करय पड़ैत छैक ताहि सब केँ समेटब आ प्रत्येक समस्याक उत्तर देब असम्भव होयत । पटकथा मे निर्धारित सिद्धांत सभक पालन करब ओहिना परेशान करयवला होइछ जेना कोनो विधान पुस्तक मे कानून केर पालन करब होइछ । सच अछि जे नियम सख्त अनुशासन आ बाध्यकारी हेबाक चाही आ हमरा लोकनिक शास्त्र मे ई सब बेसी संख्या मे जरूर अछि । लेकिन व्यवहार मे देखैत छियैक जे ‘स्वतंत्रता’ आ ‘लोकतंत्र’ जेहेन उच्च-आवाज (उच्च-भावनात्मक) शब्द, वास्तविक व्यवहार मे, लोकक अपन प्रसन्नता (अनुकूलता) वला परिणाम आबय तेहेन कर्म करयवला होइत छैक, या फेर मजगुत लोक (बहुसंख्यक) द्वारा कमजोर लोक (अल्पसंख्यक) केँ कष्ट दयवला भेल करैत छैक । तेँ नियम बनेला लागय वला अपरिहार्य प्रतिबन्ध सब, एहेन प्रतिबन्ध केँ सीमित कय केँ कम कयल जेबाक चाही । दोसर शब्द मे, सीमाओक एकटा सीमा हेबाक चाही, नहि तँ मानव स्वभाव अनुसार, कठोर प्रतिबन्ध विद्रोहक कारण बनत । अत्यधिक अनुशासन केर परिणाम केवल नियम-भंगे टा होयत ।
यैह कारण छैक जे भले हमरा लोकनिक शास्त्र सब मामिला मे दिशा-निर्देश देने अछि, लेकिन ओ सब ‘कानून’ केँ मानयवला बाध्यकारी बल (जबर्दस्ती) जेकाँ मानले टा जाय ताहि मान्यता पर नहि बनल अछि । ई लोकहि पर छोड़ि देल गेल अछि जे ओ अपन स्वेच्छा के प्रयोग करय, अपन बड़-बुजुर्ग केर उदाहरण पर चलय आ स्वेच्छा सँ ओकर अनुसरण करय । बड़-बुजुर्गक व्यक्तिगत उदाहरण, परम्परा, स्थानीय प्रथा, पारिवारिक संस्कार आदिक आधार पर व्यक्तिगत आचरण मे कनि विकल्प या स्वतंत्रता छोड़ल जाय ताकि आनों-आन मामिला मे लोक सँ कठोर लिखित अनुशासन संहिताक पालन करबाक अपेक्षा कयल जा सकय । दोसरो केँ ई सिद्धांत केर पालन करेबाक सब सँ नीक तरीका छैक जे स्वयं (व्यक्तिगत) केँ उदाहरण (नियम पर चलयवला) रूप मे पेश कयल जाय । दोसर सब सँ नीक तरीका अछि जे बिना कोनो बाध्यता केँ मनाबय के प्रकृति मे मौखिक निर्देशन देल जाय । अन्तिम उपाय अछि जे कानून बनाकय ओकर अनुपालन लागू कयल जाय ।
“सहस्रम् वद एकम् मा लिख” – ई एकटा पुरान कहावत अछि । एकर मतलब ई भेल जे अहाँ केकरो बुझाबय (मनाबय) लेल १००० शब्दक प्रयोग कय सकैत छी मुदा एकहु टा शब्द केँ लिखिकय ओकर अनुपालन करबाक लेल केकरो बाध्य नहि करू । वर्तमान समय केर क्रम छैक जे एक-एक विषय पर (लिखित) कानून बनेबाक अछि । आर कोनो तरहक राय (सुझाव, सलाह) केर प्रकाशन तैयार रूप मे भेटैत अछि ।
यद्यपि धर्मशास्त्र केर आलोचना एहि लेल होइत छैक जे हजारों लोक द्वारा निषेधाज्ञा (धार्मिक कारण सँ नहि कयल जायवला नियम) बनायल गेल छैक जाहि मे कोनो तरहक स्वतंत्रता नहि देल गेल छैक, लेकिन वास्तव मे यैह लोकक स्वतंत्रताक खातिर बहुते रास बात सब अकथिते (बिनु कहले) छोड़ि देल गेल छैक । धर्मशास्त्रक लेखक लोकनिक सुविचारित विचार रहलनि अछि जे अगर कोनो व्यक्ति केँ स्वयं तथा समाज केँ बर्बाद करय सँ बचेबाक अछि त ओहि वास्ते विस्तृत दिशा-निर्देश तथा कठोर नियंत्रण जरूरी छैक । मुदा जँ ई सब ‘कानून’ रूप मे लिखल जाय त आम लोक बेड़ी मे बन्हायल (जकड़ल) जेकाँ महसूस करत । तेँ ई निषेधाज्ञाक किछु हिस्सा मात्र अछि जे लेखन लेल प्रतिबद्ध भेल अछि, बाकी सब किछु क्षेत्रीय वा पारिवारिक रीति-रिवाज या परम्पराक आधार पर पालन करबाक लेल छोड़ि देल गेल अछि ।
शास्त्रीय निर्देशन द्वारा उत्पन्न संयमक भाव तखन नहि अनुभव होइत अछि जखन यैह बात कोनो महापुरुष, परम्परा, धारणा आदि द्वारा अनुसरण कयल गेल अभ्यास सब प्रकृति मे स्थापित भ’ गेल अछि । क्षेत्रीय आ पारिवारिक परम्परा सब केँ हर्षपूर्वक स्वीकार कयल जाइत अछि कारण ओ व्यक्तिगत निष्ठा केर एकटा निश्चित भाव उत्पन्न करैत अछि ।
एहन नहि जे धर्म शास्त्र पर अंतिम ग्रन्थ अर्थात् ‘वैद्यनाथ दीक्षितियम्’ असगर एहि पैघ हृदयक मनोवृत्ति (अर्थात् धार्मिक नियम-निषेधाज्ञा मनबाक स्वतंत्रता) केँ स्वीकार कएने हो । पूर्वक सब ग्रंथक विचार सेहो एहने छल । अपस्थम्ब सूत्र मे जे बहुमत द्वारा अधिकार रूप मे स्वीकार कयल गेल अछि, महर्षि अपस्थम्ब अन्त मे कहैत छथि : ‘हम एहि शास्त्र में सब धर्म केँ कवर नहि कएने छी । कतेको आर बचले अछि । बहुत रास एहेन अछि जे महिला आ चारिम जाति सँ सम्बन्धित लोक सब सँ सीखल जा सकैत अछि । अहाँ हुनका सभ सँ ई सब सिखि सकैत छी ।’
एहि सँ पता चलैछ जे स्त्रीगण केँ पुरुष द्वारा नीचाँ राखल गेल छल वा ब्राह्मण लोकनि गैर-ब्राह्मण केँ नीच स्थान देने छलाह से कतेक गलत बात छैक । धर्मशास्त्र केर अधिकार वला महान पुस्तक सब मे महिला तथा गैर-ब्राह्मण केर बुद्धि केँ उचित संज्ञान एतबा देल गेल छैक जे ओकरा धर्म केर अधिकार बनायल जाइछ ।
आश्वलायण सन मूल सूत्रकार कहने छथि, विवाह उत्सव मे स्त्रीगणक निर्णय जे कखन आ कोना आरती लेबाक चाही (दुष्ट प्रभाव केँ दूर करबाक लेल वर-वधूक समक्ष प्रज्वलित कपूर लहराओल जाइत अछि) जेकर बाद अभिषिक्त कनियाँक अनुकरण करय पड़ैत छैक । विवाहक पंडाल केर नींव रखबाक लेल भले एकटा विशेष मंत्र अछि मुदा एहि विषय पर अनुभवी मजदूर (कारीगर) केर की कहब छैक, परम्पराक आधार पर, तेकर संज्ञान जरूर लेबाक चाही ।
एहि तरहें शास्त्र कोनो लोकक अपन स्वतंत्रता केर हनन नहि करैत अछि अपितु उचित मात्रा मे लोकतांत्रिक स्वतंत्रता प्रदान कएने अछि ।
धर्मशास्त्र मे चारिम जातिक लोक सब केँ जे अनुष्ठान आ संस्कार करय पड़ैत छैक सेहो निर्धारित कयल गेल छैक; ओहि जाति केँ एकदम अनदेखी नहि कयल गेल छैक । दीक्षितिया मे ई सब वर्णाश्रम कांड, आहनिक कांड आ श्राद्ध कांड मे विस्तार सँ उल्लेखित भेटत ।
सामान्यतः धर्मशास्त्र दुइ काण्ड मे विभाजित अछि – अर्थात् आचार्य काण्ड एवं व्यवहार । व्यक्तिगत आचरण आचार अछि । व्यवहार कानून सँ सम्बन्धित अछि ।
Liberty Versus Discipline
– Chandrashekharendra Saraswati
Here I must say something in general. However deep one may analyse a subject or however much in detail one may attempt elaboration, it would be impossible to cover the myriad situations which a person would face in his life-time and provide an answer to each problem. Tenets laid down in script would be irksome to follow like laws in a statute book. True that the rules should make for strict discipline and be binding and our Shaastras do contain these in large numbers. But we see in practice that high-sounding words such as ‘liberty’ and ‘democracy’, in actual practice, result in action as one pleases, or the strong (majority) causing hardship to the weak (minority). Therefore the inevitable restrictions imposed by rule making should be tempered by placing a limit on such restrictions. In other words, there must be a limit to the limitations, otherwise true to human nature, severe restrictions would lead to revolt. Too much discipline would only result in rule-breaking.
That is why although our Shaastras have provided guidelines on all matters, they have not assumed the compelling force of ‘law’. It has been left to the individual to exercise his free-will, following the example of elders and voluntarily following suit. A little choice or liberty should be left in personal conduct based on personal example of elders, traditions, local custom, family customs, etc. so that in other matters a person may be expected to follow a strict written code of discipline. The best way to make others follow these tenets is by setting a personal example. The next best way is verbal instruction in the nature of persuasion without any compulsion. The last resort is to make laws and enforce compliance.
“Sahasram Vada Ekam Ma Likha” is an old adage. It means you may use a 1000 words to convince a person but do not commit even one to writing and compel compliance. The order of the present day is to enact (written) laws on each and every subject. And any opinion finds ready publication.
Although Dharma Shaastras are criticized for laying down injunctions by the thousand without allowing any freedom to the individual, in actual fact it has left many things unsaid in the interests of this very freedom or liberty. It has been the considered view of the authors of Dharma Shaastras that, if an individual is not to be allowed to ruin himself and society, there must be elaborate guidelines and rigid control. But if all these are written down in the form of ‘law’ the public would feel highly shackled. Therefore it is only part of the injunctions that has been committed to writing, the rest having been left to be followed on the basis of the regional or family custom and traditions.
The feelings of restraint created by Sastraic injunctions is not felt when the same thing is in the nature of the practice followed by great men, tradition, percept etc. Regional and family traditions are gladly accepted as they evoke a certain sense of personal loyalty.
It is not as though the last of the texts on Dharma Shaastra, viz., ‘Vaidyanatha Dikshitiyam’, alone had accepted this large-hearted attitude. All the earlier texts held similar views. In the Apasthmaba Sutra which is accepted by the majority as authority, Maharishi Apasthamba says at the end : ‘I have not covered all dharmas in this Shaastra. Many more are left. There are many which can be learnt from women and those belonging to the fourth caste. You may learn these from them.’
This will show how wrong is the charge that women were kept down by men or that the Brahmins had assigned an inferior position to non-brahmins. In the great book which is an authority on Dharma Shaastra, due cognisance has been given to the wisdom of women and non-brahmins to the extent of making them authorities on Dharma.
Original Sutrakaras like Aaswalaayana have said that, during marriage celebrations, the decision of the women as to when and how the arati should be taken (lighted camphor is waved before the bride and groom to dispel evil influences) and the bride anointed has to be followed. Although there is a particular mantra for laying the foundation for the marriage pandal, one should take note of what the experienced workmen have to say on the subject, based on tradition.
Thus the Shaastras do not hamstring a person but have given a fair amount of democratic freedom.
The Dharma Shaastra also lays down the ceremonies and rituals which people of the fourth caste are required to do; that caste has not at all been ignored. In the Dikshitiya, these will be found mentioned in detain in the Varnaasrama Kaanda, Aahnika Kaanda and Shraaddha Kaanda.
Generally, Dharma Shaastras are divided into two Kaandas – viz. Aacharya Kaanda, and Vyavahaara. Personal conduct is Aachara. Vyavahaara deals with law.
स्वतंत्रता बनाम अनुशासन
यहाँ मुझे सामान्य तौर पर कुछ कहना होगा । कोई किसी विषय का चाहे कितना भी गहन विश्लेषण करे या चाहे कितने भी विस्तार से व्याख्या करने का प्रयास करे, एक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में जिन असंख्य परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, उन्हें समेटना और प्रत्येक समस्या का उत्तर प्रदान करना असंभव होगा । लिपि में निर्धारित सिद्धांतों का पालन करना क़ानून की किताब में लिखे कानूनों की तरह कष्टदायक होगा । यह सच है कि नियमों में कठोर अनुशासन होना चाहिए और वे बाध्यकारी होने चाहिए और हमारे शास्त्रों में इनका प्रचुर मात्रा में उल्लेख है । लेकिन हम व्यवहार में देखते हैं कि ‘स्वतंत्रता’ और ‘लोकतंत्र’ जैसे उच्च-ध्वनि वाले शब्द, व्यवहार में, मनचाही कार्रवाई का कारण बनते हैं, या बलवान (बहुमत) कमजोर (अल्पसंख्यक) को कष्ट पहुँचाते हैं । इसलिए नियम बनाने से लगने वाले अपरिहार्य प्रतिबंधों को ऐसे प्रतिबंधों पर सीमा लगाकर कम किया जाना चाहिए । दूसरे शब्दों में, सीमाओं की भी एक सीमा होनी चाहिए, अन्यथा मानव स्वभाव के अनुसार, कठोर प्रतिबंध विद्रोह का कारण बनेंगे । अत्यधिक अनुशासन का परिणाम केवल नियम-भंग ही होगा ।
इसीलिए, यद्यपि हमारे शास्त्रों ने सभी विषयों पर दिशानिर्देश प्रदान किए हैं, फिर भी उन्होंने ‘कानून’ जैसी बाध्यकारी शक्ति धारण नहीं की है । व्यक्ति को अपनी स्वतंत्र इच्छा का प्रयोग करने, बड़ों के उदाहरण का अनुसरण करने और स्वेच्छा से उनका अनुसरण करने की अनुमति दी गई है । बड़ों के व्यक्तिगत उदाहरण, परंपराओं, स्थानीय रीति-रिवाजों, पारिवारिक रीति-रिवाजों आदि के आधार पर व्यक्तिगत आचरण में थोड़ी-बहुत स्वतंत्रता या विकल्प अवश्य छोड़ा जाना चाहिए ताकि अन्य मामलों में व्यक्ति से अनुशासन की एक कठोर लिखित संहिता का पालन करने की अपेक्षा की जा सके । दूसरों को इन सिद्धांतों का पालन कराने का सबसे अच्छा तरीका स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करना है । अगला सबसे अच्छा तरीका बिना किसी दबाव के अनुनय-विनय के रूप में मौखिक निर्देश देना है । अंतिम उपाय कानून बनाना और उनका अनुपालन सुनिश्चित करना है ।
“सहस्रं वद एकं मा लिख” यह एक पुरानी कहावत है । इसका अर्थ है कि आप किसी व्यक्ति को समझाने के लिए हज़ार शब्द इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन एक भी शब्द लिखकर उसे मानने के लिए बाध्य न करें । आजकल हर विषय पर कानून बनाना (लिखित) चलन है । और कोई भी राय तुरंत प्रकाशित हो जाती है ।
हालाँकि धर्मशास्त्रों की आलोचना इस बात के लिए की जाती है कि वे व्यक्ति को कोई स्वतंत्रता दिए बिना हज़ारों आदेश देते हैं, लेकिन वास्तव में उन्होंने इसी स्वतंत्रता के हित में बहुत सी बातें अनकही छोड़ दी हैं । धर्मशास्त्रों के लेखकों का यह सुविचारित मत रहा है कि यदि व्यक्ति को स्वयं और समाज को बर्बाद नहीं होने देना है, तो विस्तृत दिशानिर्देश और कठोर नियंत्रण होना चाहिए । लेकिन यदि ये सभी ‘कानून’ के रूप में लिख दिए जाएँ, तो जनता खुद को बहुत बंधनों में जकड़ा हुआ महसूस करेगी । इसलिए आदेशों का केवल एक भाग ही लिखित रूप में दिया गया है, बाकी को क्षेत्रीय या पारिवारिक रीति-रिवाजों और परंपराओं के आधार पर पालन करने के लिए छोड़ दिया गया है ।
शास्त्रों के आदेशों से उत्पन्न संयम की भावना तब महसूस नहीं होती जब वही बात महापुरुषों, परंपराओं, धारणाओं आदि द्वारा अपनाई गई प्रथाओं में निहित हो । क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं को सहर्ष स्वीकार किया जाता है क्योंकि वे एक निश्चित व्यक्तिगत निष्ठा की भावना जगाती हैं ।
ऐसा नहीं है कि धर्मशास्त्र के अंतिम ग्रंथ, अर्थात् ‘वैद्यनाथ दीक्षितम’ ने ही इस उदार दृष्टिकोण को स्वीकार किया हो । इससे पहले के सभी ग्रंथों में भी यही विचार थे । आपस्तम्ब सूत्र, जिसे अधिकांश लोग प्रमाण मानते हैं, के अंत में महर्षि आपस्तम्ब कहते हैं: ‘मैंने इस शास्त्र में सभी धर्मों का वर्णन नहीं किया है । अभी और भी बहुत कुछ बाकी है । ऐसे कई धर्म हैं जो स्त्रियों और चतुर्थ वर्ण के लोगों से सीखे जा सकते हैं । आप उनसे ये सीख सकते हैं ।’
इससे यह स्पष्ट होगा कि यह आरोप कि पुरुषों ने स्त्रियों को नीचे रखा या ब्राह्मणों ने गैर-ब्राह्मणों को निम्न स्थान दिया, कितना गलत है । धर्मशास्त्र के इस महान ग्रंथ में, महिलाओं और गैर-ब्राह्मणों की बुद्धिमत्ता को इस हद तक उचित महत्व दिया गया है कि उन्हें धर्म का विशेषज्ञ माना गया है ।
आश्वलायन जैसे मूल सूत्रकारों ने कहा है कि विवाह समारोहों के दौरान, महिलाओं द्वारा यह निर्णय लिया जाना चाहिए कि आरती कब और कैसे की जाए (दुष्ट प्रभावों को दूर करने के लिए वर-वधू के सामने जलता हुआ कपूर लहराया जाता है) और वधू का अभिषेक कैसे किया जाए । यद्यपि विवाह मंडप की नींव रखने के लिए एक विशेष मंत्र है, फिर भी परंपरा के आधार पर अनुभवी कारीगरों द्वारा इस विषय पर कही गई बातों पर ध्यान देना चाहिए ।
इस प्रकार, शास्त्र किसी व्यक्ति को बाधित नहीं करते बल्कि उसे पर्याप्त मात्रा में लोकतांत्रिक स्वतंत्रता प्रदान करते हैं ।
धर्मशास्त्र उन उपायों और अनुष्ठानों का भी निर्धारण करता है जिन्हें चतुर्थ वर्ण के लोगों को करना आवश्यक है; उस वर्ण की बिल्कुल भी उपेक्षा नहीं की गई है । दीक्षितिया में वर्णाश्रम काण्ड, अह्निका काण्ड और श्राद्ध काण्ड में निरुद्ध रूप से इनका उल्लेख मिलेगा ।
आम तौर पर, धर्म शास्त्रों को दो कांडों में विभाजित किया गया है – अर्थात् आचार्य काण्ड, और व्यवहार । व्यक्तिगत आचरण ही आचार है । व्यवहार कानून से संबंधित है ।
हरिः हरः!!
