उपांग: धर्मशास्त्र
– चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती ‘शंकराचार्य’ – अपन पुस्तक ‘द वेदाज’ मे
पौराणिक लक्ष्य प्राप्तिक मार्ग
ई देखल गेल अछि जे पुराण केर पात्र हमरा सभक आदर्श व मार्गदर्शक होइत छथि । हुनका लोकनिक कथा सब पढ़िकय हमरा लोकनि हुनक सद्गुण सभक अनुकरण करबाक लेल प्रेरित भेल करैत छी । यद्यपि ई इच्छा उत्पन्न होइत अछि, तैयो हरेक परिस्थिति मे ओकरहि पर अडिग रहब अव्यावहारिक लागल करैछ । मनुष्यक ई स्वभाव होइत छैक जे ओ हमेशा किछु न किछु करैत रहैछ । मोन केँ एकहु क्षण लेल स्थिर राखब असम्भव छैक । गीता मे भगवान कहने छथि, “प्रकृति मनुष्य केँ एकहु क्षण लेल स्थिर रहने बिना किछु न किछु करैत रहबाक लेल प्रेरित करैत छैक । ताहि लेल ओकरा कार्य करबाक उचित विधि सिखबाक चाही, आर एना कयकेँ ओकरा अपन मोन केँ पवित्र (शुद्ध) करबाक चाही, नीक चरित्र आ आदत सब केँ अपनेबाक चाही आ फेर आदत (गुण) सब सँ उपर उठिकय ज्ञानी बनिकय ब्रह्म मे लीन होयबाक चाही ।”
यदि हमरा सब केँ अपन धर्म केर सिद्धान्त सब केँ दृढ़ता सँ पालन करबाक हो, पाप सब सँ मुक्ति प्राप्त करबाक हो, आर आत्मा केँ शुद्ध कय केँ मोक्ष – सांसारिक कष्ट सब सँ मुक्तिक सुख प्राप्त करबाक हो, तँ कि करबाक चाही ? हमरा सभक जन्मे पापक कारण भेल अछि । एहि पाप सब केँ धोबाक चाही । हमरा सब केँ दुबारा पाप नहि करबाक चाही । हमरा लोकनि केँ अपन मन आर गुण सब केँ उन्नत करबाक चाही ताकि ओ पाप मे लिप्त नहि होए । यैह धर्मक उद्देश्य अछि । तखन हमरा सब केँ अपन धर्मक अनुसार कि सब करबाक चाही ?
सामान्यतः, वर्तमान अवस्था मे, हमरा सब रामायण, भागवत आर किछु पुराण सब सँ परिचित छी । एहि सँ ई ज्ञात होइछ जे विभिन्न समय आर स्थान सब पर एकर पात्र लोकनि द्वारा कोन तरहक धार्मिक आदेश सभक पालन कयल गेल छल । ई आदेश स्पष्ट रूप सँ या संहिताबद्ध रूप मे नहि भेटैछ, एकर उल्लेख यत्र-तत्र भेटैछ । एहि आदेश सभक पालनक प्रक्रिया सभक उल्लेख पुराण मे या इतिहास मे सेहो नहि छैक । ताहि हेतु मात्र एकरा बारे मे जानकारी भेला सँ हमरा लोकनि लेल एकर पालन करब सम्भव नहि अछि ।
पुराण आ इतिहास केर केन्द्रीय विषय भक्ति थिक । लेकिन कि हम सब पूरा २४ घंटा भक्ति (पूजा) ध्यान आ ईश्वर स्तुति (स्तोत्र) केर जाप करैत बिता सकैत छी ? नहि । हमरा सब केँ परिवारक प्रति अपन कर्तव्य निभेबाक रहैछ । हमरा सब केँ खाना-पीना, नहाना आदि कयनाय रहैत अछि आर अपन व्यक्तिगत तथा शारीरिक ज़रूरत सभक ध्यान राखय पड़ैत अछि । एतेक तक कि बाकी बचल समय सेहो पूजे लेल हो सम्भव नहि भ’ पबैछ । बोरियत होबय लगैछ । ताहि हेतु हमरा सब केँ अपन नीक कर्म करबाक लेल अन्य निर्देश सब केँ तथा मार्गदर्शनक आवश्यकता पड़ैत अछि । ई हम सब कतय सँ सिखैत छी ? केवल धर्मशास्त्र सँ । १४ अनुशासन (विद्या) मे, पुराणक बाद जे अन्तिम अछि, से धर्मशास्त्र थिक ।
पुराणक पात्र सब हमरा लोकनि केँ अपन लक्ष्य बतबैत छथि । ताहिठाम पहुँचबाक मार्ग निर्धारित कर्म (कर्म-अनुष्ठान) केर वास्तविक अभ्यास सँ आरम्भ करय पड़ैत छैक । एहि तरहें धर्मशास्त्र हमरा सब केँ बतबैत अछि जे हमरा सब केँ अपन दैनिक जीवन मे कि सब आ केना-केना करबाक चाही । वेद विभिन्न स्थान पर हमरा लोकनिक कर्तव्यक बारे मे जे कहने अछि, तेकरा उपांग सब द्वारा विधिवत् ढंग सँ आ विस्तृत रूप सँ सुव्यवस्थित कयल गेल अछि ।
गृहस्थी कर्तव्य, व्यक्तिगत कार्य, स्नान, भोजन, ई सबटा शास्त्र सबमे वर्णित क्रमानुसार और यथाविधि कयल जेबाक चाही ।
वैदिक धर्म अपन निर्देश एहि तरहें बनेलक जे मानवीय क्रियाकलापक सब प्रकार आत्म-उन्नति आ आत्म-साक्षात्कार लेल अनुकूल हो । ई अपन जीवनक सब पहलू सब केँ धर्म सँ जोड़ैत अछि – जँ कियो व्यक्ति कोनो विशेष ढंग सँ सुतैत अछि त ई ओकर व्यक्तित्व मे सुधार अनैत छैक; जँ कियो व्यक्ति निर्धारित ढंग सँ कपड़ा पहिरैत अछि त ई नीक जीवन लेल अनुकूल होइत छैक; यदि घर बनेबाक योजना निर्धारित ढंग सँ होइछ, त ई विभिन्न वैदिक अनुष्ठान सभक समुचित पालन मे सहायक हेतैक । धर्मशास्त्र सब मे धर्मनिरपेक्ष जीवन आर धार्मिक जीवन केँ अलग सेहो नहि कयल गेल अछि । वैदिक धर्म अनुसार धर्मनिरपेक्षता सेहो धर्महि दिश लय जेबाक लेल बनायल गेल छैक । जेहो काज कयल जाइछ, से धर्म-उन्मुख होइत अछि आर आत्म-विकासक प्रक्रियाक भाग होइत अछि । जाहि तरहें धर्मनिरपेक्षता आ धर्म केर ओहि कर्तव्य सब केँ एकीकृत कयल गेल अछि, जे लोक केँ अपन मोक्ष लेल करब आवश्यक छैक, तहिना सामाजिक कल्याण तथा विश्व कल्याण केर तत्व सेहो धर्मशास्त्र मे अंतर्निहित छैक ।
भक्ति, जेकरा हमरा सब एखन धरि पुराणहि सब मे निहित देखलहुँ अछि, वेदहु मे विद्यमान अछि । लेकिन एकरा संगहि अनेकों कर्म व कर्तव्य सेहो अछि । भक्ति केँ कर्म मे परिणत करबाक लेल लिए पूजाक विस्तृत निर्देश देल गेल छैक । पूजाक अलावे, यज्ञ (अनुष्ठानात्मक बलिदान), श्राद्ध (मृत्यु दिवस संस्कार), तर्पण (पूर्वज सब केँ श्रद्धांजलि) सबटा वैदिक धर्मक अनिवार्य अंग मानल जाइत अछि ।
वेद मे निस्संदेह ई सब गुण समाहित छैक । मुदा, एहि सब केँ कोनो एकटा स्थान पर संहिताबद्ध ढंग सँ प्रस्तुत नहि कयल गेल छैक । नहिये कर्म करबाक प्रत्येक प्रक्रियाक विस्तार सँ वर्णन कयल गेल छैक ।
मनु कहैत छथि, ‘वेदो अखिल धर्म मूलम्’, केवल वेदे टा धर्म केर आधार या मूल थिक जे कि करब आवश्यक अछि आ केना करबाक अछि से बतबैत अछि ।
यद्यपि वेद एकरा एहि तरहें प्रस्तुत कएने अछि जे व्यक्तिगत मोक्ष लेल कयल जायवला कर्तव्य अप्रत्यक्ष रूप सँ लोकहित सेहो कयल करैत अछि, आर एकर दोब्बर उद्देश्यक पूर्ति धर्म सँ होइत छैक, तैयो हमरा सब केँ कोनो व्यवस्थित या स्पष्ट सूची या कोनो विस्तृत्व प्रक्रियात्मक निर्देश नहि भेटैछ । एकर अलावे, वैदिक भाषा केँ बुझनाय प्रायः कठिन होइत छैक आर ओकर तात्पर्य पूरापूरी स्पष्ट नहि होइत अछि ।
तहिना वेद मे सँ, छठम् वेदांग ‘कल्प’ द्वारा सूत्रक रूप मे कर्तव्य या कर्म केँ एक व्यवस्थित आ समेकित सूची प्रस्तुत कयल गेल अछि । लेकिन ई अपन स्वभावहि सँ संक्षिप्त हेबाक संगहि विस्तृत मार्गदर्शन सेहो नहि प्रदान करैत अछि । केवल धर्मशास्त्रे टा एहि सूत्र सब केँ बुझबाक योग्य बनबैत अछि आर ओहि मे कोनो तरहक सन्देह भेल तँ ओहि सब सँ दूर करैत अछि ।
धर्म सूत्र (अपस्तम्ब, गौतम आदि केर) सूत्र केर नियम अनुसार संक्षिप्त और सारगर्भित अछि । वास्तव मे एकटा सूत्र केँ एहने हेबाको चाही । दोसर दिश, धर्मशास्त्र जे स्मृति थिक (मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर आदि केर) श्लोक केर स्वरूप मे अछि ।
लेकिन एहि सभक सामान्य प्रमाण वेद थिक । हमरा सब केँ कि करबाक चाही आ केना करबाक चाही, ई सब बात वेद सब मे स्पष्ट रूप सँ वर्णित अछि आ हमरा लोकनि केँ एहि सब आदेश केर पूर्णतः पालन करबाक चाही । धर्मशास्त्र सभक कार्य वैदिक आदेश सभक विस्तृत विश्लेषण व व्याख्या करब छैक, जे किछु हद तक कल्प मे संहिताबद्ध छैक । यदि कल्प मुख्यतः यज्ञ स्थल, गृह योजना आदि केर क्षेत्रक बात करैत अछि, त धर्मशास्त्र मनुष्य लेल जीवनक प्रत्येक पहलु केँ समाहित करैत आचार-संहिता निर्धारित करैत अछि ।
“हम ई काज करय चाहैत छी । लेकिन हमरा नहि पता जे वेद मे ई जनबाक लेल कतय खोज करी जे ई काज करब सही अछि कि गलत । वेद वास्तव मे अनन्त प्रतीत होइत अछि । ताहि लेल हमरा नहि पता जे ई काज केना कयल जेबाक चाही, एकरा लेल कतय ताकू-देखू । हमरा कियो एहेन नहि भेटि रहल अछि जे वेद सब मे पारंगत हो, तखन हम कि करू ?” – एहेन किछु प्रश्न सब अछि ।
वेदक विशाल सागर सँ हमरा सब केँ जे चाही से चुननाय वास्तव मे एकटा असम्भव कार्य छैक ।
“अगर हमरा पता रहितय जे वेद मे ई बतायल गेल अछि जे ई काज केना करबाक चाही, त हम ओकर पालन अवश्य करितहुँ । एकर अभाव मे हम कि करू ?”
मनु एहि प्रश्न सभक उत्तर दैत छथि । “ठीक अछि – हम अहाँ केँ बता दैत छी जे वेद मे पारंगत महर्षि लोकनि स्मृति सब मे लिखने छथि । देखू, एहि विषय पर हुनका लोकनिक कि कहब छन्हि । स्मृति धर्मशास्त्र थिक ।”
स्मृतिक अर्थ अछि स्मृति मे सहायक । विस्मृतिक अर्थ अछि स्मृतिक लोप । स्मृति सब वेदक सहायक संस्मरण थिक । वेद सभक पूर्ण ज्ञाता महर्षि लोकनि धर्म आ कर्म (ओकरा केना करबाक अचि, एकर प्रक्रियात्मक जानकारी) केँ अनिवार्य रूप सँ निर्धारित कयलनि अचि आर ओकरा व्यवस्थित रूप सँ प्रस्तुत कयलनि अछि । ई स्मृति सब एहेन भाषा मे लिखल गेल अछि जे आसानी सँ बुझय मे अबैत अछि । ई देखू । अहाँ केँ कि करबाक चाही आ कि नहि करबाक चाही, केना करबाक चाही, ई सब बात स्पष्ट रूप सँ बतायल गेल अछि – एना मनु कहैत छथि ।
कल्प, जे छठम् ‘वेदांग’ थिक, वैदिक आदेश सभक पालन करबाक वर्णन करैत अछि । गृह्य सूत्र घरेलू संस्कार सभक वर्णन करैत अछि । श्रौत सूत्र अश्वमेध जेहेन पैघ यज्ञ सभक वर्णन करैत अछि । धर्म सूत्र व्यक्तिक व्यक्तिगत व सामाजिक कर्तव्य सब सँ सम्बन्धित अछि, जे ओकर जन्म केर वर्ण तथा जीवनक ओहि अवस्थाक अनुसार छैक ।
जीव केर माताक गर्भ मे प्रवेश करय सँ लय कय जन्म, विकास, विवाह, गृहस्थी चलेनाय आर अन्त मे दाह संस्कार धरिक – स्मृति सब सूक्ष्मता सँ सब आवश्यक कार्यक वर्णन करैत अछि । ऐ एकटा तालिका प्रदान करैत अछि जेकर पालन मनुष्य केँ भोरे उठय सँ लय केँ राति सुतय धरि प्रतिदिन करबाक चाही । उपरोक्त पहल सँ सम्बन्धित १६ गोट मुख्य संस्कार अछि ।
The Upaangas: Dharma Shastra
The Road To Realise The Puraanic Goal
It is seen that the characters in the Puraanas are our ideals and pace-setters. On reading their stories, we are impelled to emulate their noble qualities. Although such desire is born, it is found impracticable to stick to them under all circumstances. It is the nature of man to keep doing something or the other at all times. It is impossible to keep the mind still even for a second. In the Gita, the Lord says “Nature impels man to keep doing something without keeping still even for a second. Therefore he should learn the proper method of doing things, and by so doing, cleanse his mind, acquire good character and habits and then transcend the habits (Gunas) and become a Jnaani and merge with the Brahman.”
What should be done, if we are to strictly follow the tenets of our faith, rid ourselves of sins, and having purified the should attain Moksha – the happiness of release from worldly troubles. Our very birth has been due to sin. This should be washed off. We should not sin anew. We should elevate our minds and Gunas so that they do not indulge in sin. This is the purpose of religion. So what are we required to do as per our religion?
Generally speaking, in our present state, we are familiar with Ramayana, Bhagvata and a bit of some of the Puraanas. It is known from these as to what type of religious injunctions were practised by the characters in these at various times and places. These injunctions do not appear cogently or in a codified way, they find mention here and there. The procedure for practising these injunctions are not also mentioned in the Puraanas or Itihaasas. Therefore it is not possible for us to practise these injunctions by merely being made aware of them.
The Puraanas and the Itihaasas have Bhakti as their central theme. But can we spend all the 24 hours doing Bhakti (Puja) meditation and singing God’s praise (stotra)? No. We have to do our duty to the family. We have to eat, bathe etc. and attend to personal and bodily needs. Even to devote the balance of time to Puja is also not possible. Boredom sets in. We require therefore other directions and guidance to perform our good deeds. From where do we learn these? From only the Dharma Shaastras. Of the 14 disciplines (Vidyas), what comes as the last, after Puraanas, is Dharma Shaastra.
The characters from the Puraanas show us the goal. The way to reach it is to begin with the actual practice of prescribed Karmas (Karma-Anushthana). Thus Dharma Shaastra tells us what and how we should do in our every day life. What the Vedas have said at various places as to what our duties are have been arranged systematically and elaborated by the Upaangas.
Household duties, personal work, bathing, eating have all to be done in order and as laid down, in the Shaastras.
The Vedic Dharma has devised its injunctions so that all aspects of human activity are conductive to self-advancement and self-realisation. It involves all aspects of our life with religion – if one sleeps in a particular way it helps the personality; if one dresses in a prescribed way it is conductive to good living; if the plan of the house is as laid down, it would help in the proper performance of various Vedic rites. Secular life and religious life are not separated by the Dharma Shaastras. Secularism is also designed to lead to religion as per the Vedic Dharma. Whatever job is done, it is Dharma-oriented and is part of the exercise for the evolution of the self. Just as secularism and religion have been unified in the duties which the individual is required to do for his own salvation, the ingredients for social welfare as also the well-being of the world, are inbuilt in the Dharma Shaastra.
The Bhakti, which we have so far seen as contained in the Puraanas, is also present in the Vedas. But along with it are so many karmas or duties. Elaborate directions are prescribed for performing Puja (worship), when Bhakti is translated into action. In addition to Puja, Yajnas (ritualistic sacrifices) Shraaddam (death anniversary rites), Tarpanam (homage to ancestors) are all considered indispensable adjuncts to Vedic dharma.
The Vedas no doubt contain all these. But, they have not been codified or presented in any one place. Nor has each procedure, for doing the Karmas, been spelt out in detail.
‘Vedo Akhila Dharma Moolam’ says Manu, the Vedas alone are the basis or the root of Dharma of what are required to be done and how to do it.
Though Vedas have so designed it that the duties which are required to be done for individual salvation also indirectly produce commonweal, and what serves this dual purpose is Dharma, we do not find any orderly or clear-cut list or any detailed procedural instructions. Further the Vedic language is very often difficult to understand and their purport is not wholly clear to us.
From out of such Vedas, ‘Kalpa’, the sixth Vedaanga, has presented an orderly and consolidated list of duties or Karmas in the shape of Sutras. But these are by their very nature brief nor do they offer detailed guidance. Dharma Shaastras alone make these sutras understandable and explain them beyond doubt.
Dharma Sutras (of Apasthamba, Gautama and others) are, as per the rules of Sutra, brief and pithy. In fact a sutra should be so. On the other hand, the Dharma Shaastras which are Smritis (of Manu, Yajnavalkya, Paraasara and others) are in the nature of slokas.
But the common authority for all these is the Vedas. What should we do and how should we do it are all clearly enunciated by the Vedas and we should follow these injunctions implicitly. The role of the Dharma Shaastras is to analyse and explain in great detail the Vedic injunctions which are to some extent codified in the Kalpa. If Kalpa talks mainly of the area of the sacrificial site, house plan, etc., the Dharma Shaastra lays down the code of conduct for man covering all aspects of life.
“I wish to do this job. But I do not know where to look for in the Vedas to know if it is right or wrong to do the job. Vedas indeed appear endless. So I do not know where to look to see how this job should be done. I do not also find anyone who has mastered all the Vedas, what shall I do?” – these are some of the questions.
It is indeed an impossible task to pick out what we need from the vast ocean of the Vedas.
“If I knew that the Vedas had said how this job should be done, I will certainly comply. In its absence what shall I do?”
Manu replies to these questions. “All right – let me tell you Maharishis who have mastered the Vedas have written what are called ‘Smritis’. See what they have to say on the subject. ‘Smriti’ is Dharma Shaastra.”
‘Smriti’ means an aid to memory. ‘Vismriti’ means – loss of memory. Smritis are aide memoirs for the Vedas. The Maharishis who were perfectly informed about the Vedas have compelled the injunctions (Dharma) and Karmas (procedural details as to how to do them) and have presented them in an orderly manner. These Smritis are written in a language which is easily understandable. Look at them. What you should do or should not do, how to do it, are all clearly laid down in detail – so says Manu.
Kalpa, which is the sixth ‘Vedaanga’, describes how to perform the Vedic injunctions. The Grihya Sutras describe domestic rites. The Srauta Sutras discuss the big sacrifices such as Asvamedha. The Dharma sutras are concerned with the personal and social duties of the persons according to the Varnas in which they are born and the stage of life in which they find themselves.
From the time a Jiva enters into the mother’s womb, on to birth, growth, marriage, running the household and at last to cremation – the Smritis lay down all that has to be done in minute detail. It gives a chart which man should follow daily from the time he wakes up in the morning till the time he goes to sleep at night. There are 16 main samskaaras dealing with the above aspects.
Harih Harah!!
उपांग: धर्मशास्त्र
पौराणिक लक्ष्य प्राप्ति का मार्ग
यह देखा गया है कि पुराणों के पात्र हमारे आदर्श और मार्गदर्शक हैं । उनकी कथाएँ पढ़कर हम उनके सद्गुणों का अनुकरण करने के लिए प्रेरित होते हैं । यद्यपि ऐसी इच्छा जन्म लेती है, फिर भी सभी परिस्थितियों में उन पर अडिग रहना अव्यावहारिक प्रतीत होता है । मनुष्य का यह स्वभाव होता है कि वह हर समय कुछ न कुछ करता रहता है । मन को एक क्षण के लिए भी स्थिर रखना असंभव है । गीता में भगवान कहते हैं, “प्रकृति मनुष्य को एक क्षण के लिए भी स्थिर हुए बिना कुछ करते रहने के लिए प्रेरित करती है । इसलिए उसे कार्य करने की उचित विधि सीखनी चाहिए, और ऐसा करके अपने मन को शुद्ध करना चाहिए, अच्छे चरित्र और आदतों को अपनाना चाहिए और फिर आदतों (गुणों) से ऊपर उठकर ज्ञानी बनकर ब्रह्म में लीन होना चाहिए ।”
यदि हमें अपने धर्म के सिद्धांतों का दृढ़ता से पालन करना है, पापों से मुक्ति प्राप्त करनी है, और आत्मा को शुद्ध करके मोक्ष – सांसारिक कष्टों से मुक्ति का सुख प्राप्त करना है, तो क्या करना चाहिए ? हमारा जन्म ही पाप के कारण हुआ है । इसे धो देना चाहिए । हमें दोबारा पाप नहीं करना चाहिए । हमें अपने मन और गुणों को उन्नत करना चाहिए ताकि वे पाप में लिप्त न हों । यही धर्म का उद्देश्य है । तो हमें अपने धर्म के अनुसार क्या करना चाहिए ?
सामान्यतः, वर्तमान अवस्था में, हम रामायण, भागवत और कुछ पुराणों से परिचित हैं । इनसे यह ज्ञात होता है कि विभिन्न समयों और स्थानों पर इनके पात्रों द्वारा किस प्रकार के धार्मिक आदेशों का पालन किया जाता था । ये आदेश स्पष्ट रूप से या संहिताबद्ध रूप में नहीं मिलते, इनका उल्लेख यत्र-तत्र मिलता है । इन आदेशों के पालन की प्रक्रिया का उल्लेख पुराणों या इतिहास में भी नहीं है । इसलिए केवल इनके बारे में जानकारी होने से हमारे लिए इनका पालन करना संभव नहीं है ।
पुराणों और इतिहासों का केंद्रीय विषय भक्ति है । लेकिन क्या हम पूरे २४ घंटे भक्ति (पूजा) ध्यान और ईश्वर स्तुति (स्तोत्र) का जाप करते बिता सकते हैं ? नहीं । हमें परिवार के प्रति अपना कर्तव्य निभाना रहता है । हमें खाना-पीना, नहाना आदि करना होता है और अपनी व्यक्तिगत और शारीरिक ज़रूरतों का ध्यान रखना पड़ता है । यहाँ तक कि बाकी बचे समय भी पूजा के लिए भी संभव नहीं हो पाता है । बोरियत होने लगती है । इसलिए हमें अपने अच्छे कर्म करने के लिए अन्य निर्देशों और मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है । ये हम कहाँ से सीखते हैं ? केवल धर्मशास्त्रों से । १४ अनुशासनों (विद्याओं) में, पुराणों के बाद जो अंतिम है, वह धर्मशास्त्र है ।
पुराणों के पात्र हमें लक्ष्य बताते हैं । उस तक पहुँचने का मार्ग निर्धारित कर्मों (कर्म-अनुष्ठान) के वास्तविक अभ्यास से शुरू करना पड़ता है । इस प्रकार धर्मशास्त्र हमें बताता है कि हमें अपने दैनिक जीवन में क्या और कैसे करना चाहिए । वेदों ने विभिन्न स्थानों पर हमारे कर्तव्यों के बारे में जो कहा है, उसे उपांगों द्वारा तरीका से और विस्तृत रूप से व्यवस्थित किया गया है ।
गृहस्थी कर्तव्य, व्यक्तिगत कार्य, स्नान, भोजन, ये सभी शास्त्रों में वर्णित क्रमानुसार और यथाविधि किए जाने चाहिए ।
वैदिक धर्म ने अपने निर्देश इस प्रकार बनाए हैं कि मानवीय क्रियाकलापों के सभी पहलू आत्म-उन्नति और आत्म-साक्षात्कार के लिए अनुकूल हों । यह हमारे जीवन के सभी पहलुओं को धर्म से जोड़ता है – यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष ढंग से सोता है तो यह उसके व्यक्तित्व में सुधार लाता है; यदि कोई व्यक्ति निर्धारित ढंग से वस्त्र धारण करता है तो यह अच्छे जीवन के लिए अनुकूल होता है; यदि घर की योजना निर्धारित ढंग से हो, तो यह विभिन्न वैदिक अनुष्ठानों के उचित पालन में सहायक होगी । धर्मशास्त्रों में धर्मनिरपेक्ष जीवन और धार्मिक जीवन को अलग नहीं किया गया है । वैदिक धर्म के अनुसार धर्मनिरपेक्षता भी धर्म की ओर ले जाने के लिए बनाई गई है । जो भी कार्य किया जाता है, वह धर्म-उन्मुख होता है और आत्म-विकास की प्रक्रिया का हिस्सा होता है । जिस प्रकार धर्मनिरपेक्षता और धर्म को उन कर्तव्यों में एकीकृत किया गया है जिन्हें व्यक्ति को अपने मोक्ष के लिए करना आवश्यक है, उसी प्रकार सामाजिक कल्याण और विश्व कल्याण के तत्व भी धर्मशास्त्र में अंतर्निहित हैं ।
भक्ति, जिसे हमने अब तक पुराणों में निहित देखा है, वेदों में भी विद्यमान है । लेकिन इसके साथ ही अनेक कर्म या कर्तव्य भी हैं । भक्ति को कर्म में परिणत करने के लिए पूजा के विस्तृत निर्देश दिए गए हैं । पूजा के अलावा, यज्ञ (अनुष्ठानात्मक बलिदान), श्राद्ध (मृत्यु दिवस संस्कार), तर्पण (पूर्वजों को श्रद्धांजलि) सभी वैदिक धर्म के अनिवार्य अंग माने जाते हैं ।
वेदों में निस्संदेह ये सभी गुण समाहित हैं । लेकिन, इन्हें किसी एक स्थान पर संहिताबद्ध या प्रस्तुत नहीं किया गया है । न ही कर्म करने की प्रत्येक प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन किया गया है ।
मनु कहते हैं, ‘वेदो अखिल धर्म मूलम्’, केवल वेद ही धर्म का आधार या मूल हैं कि क्या करना आवश्यक है और कैसे करना है ।
यद्यपि वेदों ने इसे इस प्रकार से डिज़ाइन किया है कि व्यक्तिगत मोक्ष के लिए किए जाने वाले कर्तव्य अप्रत्यक्ष रूप से लोकहित भी उत्पन्न करते हैं, और इस दोहरे उद्देश्य की पूर्ति धर्म से होती है, फिर भी हमें कोई व्यवस्थित या स्पष्ट सूची या कोई विस्तृत प्रक्रियात्मक निर्देश नहीं मिलते । इसके अलावा, वैदिक भाषा को समझना प्रायः कठिन होता है और उनका तात्पर्य हमें पूरी तरह से स्पष्ट नहीं होता ।
ऐसे ही वेदों में से, छठे वेदांग ‘कल्प’ ने सूत्रों के रूप में कर्तव्यों या कर्मों की एक व्यवस्थित और समेकित सूची प्रस्तुत की है । लेकिन ये अपने स्वभाव से संक्षिप्त हैं और न ही विस्तृत मार्गदर्शन प्रदान करते हैं । केवल धर्मशास्त्र ही इन सूत्रों को समझने योग्य बनाते हैं और उन्हें संदेह से परे समझाते हैं ।
धर्म सूत्र (अपस्थम्ब, गौतम आदि के) सूत्र के नियमों के अनुसार संक्षिप्त और सारगर्भित हैं । वास्तव में एक सूत्र को ऐसा ही होना चाहिए । दूसरी ओर, धर्मशास्त्र जो स्मृतियाँ हैं (मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर आदि के) श्लोकों के स्वरूप में हैं ।
लेकिन इन सभी का सामान्य प्रमाण वेद हैं । हमें क्या करना चाहिए और कैसे करना चाहिए, ये सब वेदों में स्पष्ट रूप से वर्णित हैं और हमें इन आदेशों का पूर्णतः पालन करना चाहिए । धर्मशास्त्रों का कार्य वैदिक आदेशों का विस्तृत विश्लेषण और व्याख्या करना है, जो कुछ हद तक कल्प में संहिताबद्ध हैं । यदि कल्प मुख्यतः यज्ञ स्थल, गृह योजना आदि के क्षेत्र की बात करता है, तो धर्मशास्त्र मनुष्य के लिए जीवन के सभी पहलुओं को समाहित करते हुए आचार संहिता निर्धारित करता है ।
“मैं यह कार्य करना चाहता हूँ । लेकिन मुझे नहीं पता कि वेदों में यह जानने के लिए कहाँ खोजूँ कि यह कार्य करना सही है या गलत । वेद वास्तव में अनंत प्रतीत होते हैं । इसलिए मुझे नहीं पता कि यह कार्य कैसे किया जाना चाहिए, इसके लिए कहाँ देखूँ । मुझे कोई ऐसा भी नहीं मिल रहा है जिसने सभी वेदों में पारंगत हो, तो मैं क्या करूँ ?” – ये कुछ प्रश्न हैं ।
वेदों के विशाल सागर से हमें जो चाहिए उसे चुनना वास्तव में एक असंभव कार्य है ।
“अगर मुझे पता होता कि वेदों में यह बताया गया है कि यह कार्य कैसे करना चाहिए, तो मैं उसका पालन ज़रूर करता । इसके अभाव में मैं क्या करूँ ?”
मनु इन प्रश्नों का उत्तर देते हैं । “ठीक है – मैं आपको बता दूँ कि वेदों में पारंगत महर्षियों ने स्मृतियाँ लिखी हैं । देखिए इस विषय पर उनका क्या कहना है । स्मृति धर्मशास्त्र है ।”
स्मृति का अर्थ है स्मृति में सहायक । विस्मृति का अर्थ है स्मृति का लोप । स्मृतियाँ वेदों के सहायक संस्मरण हैं । वेदों के पूर्ण ज्ञाता महर्षियों ने धर्म और कर्म (उन्हें कैसे करना है, इसकी प्रक्रियात्मक जानकारी) को अनिवार्य रूप से निर्धारित किया है और उन्हें व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया है । ये स्मृतियाँ ऐसी भाषा में लिखी गई हैं जो आसानी से समझ में आती है । इन्हें देखिए । आपको क्या करना चाहिए या क्या नहीं करना चाहिए, कैसे करना चाहिए, ये सब स्पष्ट रूप से विस्तार से बताया गया है – ऐसा मनु कहते हैं ।
कल्प, जो छठा ‘वेदांग’ है, वैदिक आदेशों का पालन करने का वर्णन करता है । गृह्य सूत्र घरेलू संस्कारों का वर्णन करते हैं । श्रौत सूत्र अश्वमेध जैसे बड़े यज्ञों का वर्णन करते हैं । धर्म सूत्र व्यक्तियों के व्यक्तिगत और सामाजिक कर्तव्यों से संबंधित हैं, जो उनके जन्म के वर्ण और जीवन की उस अवस्था के अनुसार हैं ।
जीव के माता के गर्भ में प्रवेश करने से लेकर जन्म, विकास, विवाह, गृहस्थी चलाने और अंत में दाह संस्कार तक – स्मृतियाँ सूक्ष्मता से सभी आवश्यक कार्यों का वर्णन करती हैं । यह एक तालिका प्रदान करती है जिसका पालन मनुष्य को सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक प्रतिदिन करना चाहिए । उपरोक्त पहलुओं से संबंधित १६ मुख्य संस्कार हैं ।

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