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असल भक्त लग भगवान केँ स्वयं आबय पड़ैत छनि

954 भ्यूज

लेख विचार
प्रेषित: आभा  झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- भक्ति मे शक्ति केर आस्था

मनुष्य जीवन संघर्ष, मोह-माया आ अनिश्चितता सँ भरल रहैत अछि। एहेन अवस्था में जखन कोनो मार्ग नै सुझाइ छै, तखन मनुष्य अपन अंतरात्मा सँ एक प्रश्न पूछैत अछि – “की कोनो एहेन शक्ति छै जे हमर हाथ पकड़ि सकैछ?” उत्तर होइत अछि – हँ, ओ शक्ति अछि – भक्ति।

भक्ति मतलब केवल मंत्र जाप, पूजा-पाठ आ मंदिर चलब नहि। भक्ति एक विश्वास छी – जेकरा संगे मनुष्य अपन आत्मा केँ जोड़ैत अछि। जँ मन सच्चा अछि, भावना निर्मल अछि, त’ ईश्वर स्वयं अपन भक्त लग पहुँचि जाइत छथि। भक्ति मनुष्य केँ निर्भीक, सहनशील आ आत्मबल सँ भरि दैत अछि।

द्रौपदी के कथा – आह्वान पर अवतरित ईश्वर
महाभारत के एक प्रमुख पात्र द्रौपदी के कथा भक्ति के शक्ति के गूढ़ उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि। जखन कौरव सभ सभाक समक्ष सभा मे द्रौपदी के चीरहरण करबाक प्रयास केलनि, तऽ ओ स्त्री रूप मे अपमानित, असहाय, आ निर्बल भऽ गेलीह।

सभ महापुरुष चुप! भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य – कोनो कियो सामने नै अयलाह। द्रौपदी अपन अपमान सँ थरथरा रहल छलीह, मुदा हुनका मोन मे केवल एके नाम छल – कृष्ण।

ओ हाथ जोड़िके, आँखि मूँनि क’, अन्तरात्मा सँ हुंकार केलनि आऽ भक्ति पूर्वक निवेदन कऽ रहल छलीह
“हे गोविन्द! हे माधव! हे केशव! हमर लाजक रक्षा करू!”

आ हुनका भक्ति पर एतेक विश्वास छलनि जे कृष्ण मथुरा मे रहितो ओ पुकार सुनि लेलनि। ओ तत्काल सभा मे अपन अदृश्य रूप मे उपस्थित भऽ गेलाह । आ द्रौपदी केर साड़ी के अंतहीन बना देलखिन। दुशासन थाकि गेल लेकिन चीर समाप्त नै भेल।

ई कथा सिद्ध करैत अछि – जतऽ सच्चा विश्वास होइत अछि ओतऽ ईश्वर स्वयं अबैत छथि। द्रौपदी के भक्ति हुनक शस्त्र बनि गेलनि। हुनकर हाथ मे कोनो अस्त्र नै छलनि । मुदा कृष्णक नाम रूपी संबल छलनि जे हुनका अपमान सँ बचा लेलकनि।

भक्ति – आजुक युग मे:-
आजुक आधुनिक युग मे जतऽ तनाव अकेलापन आ मोहक संसार व्याप्त अछि ।ओतऽ भक्ति एकटा मजबूत आधार थिक। जखन मनुष्य टूटैत अछि तखन ओकरा भगवानक नाम सँ आत्मिक बल भेटैत अछि।

एक बेर नम आँखि सँ “हे माँ!” कहला पर ई अनुभव होइत अछि जे कोनो अदृश्य शक्ति हमर पाछू ठाढ़ अछि।

भक्ति मे शक्ति केवल ग्रंथक बात नै अछि – ई जीवनक अनुभव थिक। भक्ति केँ जाति, लिंग, आ अवस्था पर कोनो रोक नै। सच्चा प्रेम, विश्वास आ समर्पण होए, तऽ ओ ईश्वर केँ खींचि कऽ लऽ आबै छै।

जतऽ भक्ति, ततऽ शक्ति।
भक्ति छी आत्माक आवाज — जे लोककेँ भगवान लग पहुँचा दैत अछि। जय मिथिला, जय मैथिली।

 

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