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भक्ति केर बल सँ प्रह्लाद प्रख्यात अछि जे भक्ति सर्वविदित अछि

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लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :-गीत, पूजन आऽ आत्मबल “मिथिला में भक्तिक शक्ति रूप”

(संस्कृति-संवेदना)

धर्म, दर्शन, भक्ति-शक्ति सँ, पावन मिथिला थिक अपार।
आस्था मे अचल सेतु अछि, लोकजीवनक मूल आधार।

मिथिलांचल एकटा एहन सांस्कृतिक धरातल, जतय लोकजीवन धर्म, दर्शन आऽ लोकआस्था सँ पूर्ण रूपेण पिरोएल अछि। एतय भक्ति केवल कोनो धार्मिक अनुष्ठान नहि, बल्कि जीबनक एक अनिवार्य अंग अछि। मिथिला मे भक्ति सदिखन शक्ति सँ जुड़ल रहल अछि चाहे ओ दुर्गा रूपी शक्ति होथि, सीता स्वरूपेण सहनशीलता आऽ त्यागक प्रतीक वा ग्रामदेवता के रूप मे प्रतिष्ठित स्त्री-पुरुष देवता होथि।
भक्ति संस्कृत मूल ‘भज’ धातु सँ बनल शब्द अछि। जेकर अर्थ होइत अछि “सेवा, समर्पण, प्रेम आऽ आदर”। मिथिलांचल मे भक्ति के परिभाषा मात्र धार्मिक क्रिया-कलाप धरि सीमित नहि अछि, बल्कि एकटा जीबन शैली, एकटा दृष्टिकोण अछि। लोक अपन-अपन ईष्टदेवता संग आत्मिक संबंध जोड़ैत छथि आऽ एहि संबंध मे शक्ति के महत्ता सर्वोपरि अछि।
मिथिला मे शक्ति उपासना के इतिहास प्राचीन काल सँ अछि। महिषासुरमर्दिनी दुर्गा, काली, छिन्नमस्ता, तारा ई सब सिद्धपीठ स्थान पर स्थापित छथि। पावन विजयादशमी आऽ नवरात्रि मे दुर्गा पूजन, कोसी-भरनी, भगवती जागरण सब मे भक्ति आऽ शक्ति के अद्वितीय संगम देखल जाइत अछि।
सप्तमी सँ नवमी तक भगवती स्थान पर अखंड दीप जरैल जाइत अछि। कात्यायनी ब्रत, वट सावित्री, सोमवारी ई सब स्त्री शक्ति के प्रतीक पूजा-प्रथा अछि।
मिथिलांचल मे भक्ति आऽ शक्ति के साक्षात स्वरूप छथि जानकी जी। सीता केवल पतिव्रता स्त्री नहि, बल्कि समर्पण, सहिष्णुता, त्याग आऽ आत्मबलक प्रतीक छथि। ओ वन गेलिह, अग्निपरीक्षा देलथि, परित्याग सहलथि, मुदा धरती पुत्री के रूप मे अपराजिता बनि उठलीह।
सीता जी के पूजा सौभाग्यवती स्त्रीगण सब अपन शक्ति-संवर्धन लेल करैत छथि। एकरा संग ओ आत्मबल आऽ सामाजिक सशक्तिकरण के भाव सेहो ग्रहण करैत छथि।

भक्ति मे शक्ति केर आस्था

मिथिलांचल मे दर्जनो शक्ति स्थल अछि, जाहिमे प्रमुख उग्रतारा स्थान महिषी (सहरसा), भुंगुराही भगवती (मधुबनी), छिन्नमस्ता स्थान, भैरवस्थान (दरभंगा), सीताचरण मंदिर, पुनौरा धाम (सीतामढ़ी) आऽ जलेश्वर नाथ-भगवती स्थान (जलेश्वर) इत्यादि सभ प्रसिद्ध अछि। ई सब स्थल केवल धार्मिक स्थान नहि, बल्कि नारी शक्ति के आराधनाक केंद्र थिक।
मिथिला के स्त्री प्रायः अपन भक्ति के माध्यम सँ शक्ति के जागृति करैत छथि। ओ पारंपरिक रूप सँ पूजन करैत-करैत अपन भीतरक अंतरात्मा के एक सशक्त रूप सँ जोड़ैत छथि। उदाहरण के लेल कोसी भरनी मे बेटा लेल शक्ति सँ प्रार्थना कैल जाइत अछि। छठि पूजा मे सूर्यक उपासना मातृशक्ति द्वारा कएल जाए वाला सामूहिक तप थिक। सोमवारी ब्रत मे शिव-संकल्पक संग, आत्मिक शक्तिक जागृति कैल जाइत अछि।
मिथिलांचल मे गाओल जाए वाला भक्ति गीत चाहे ओ प्राती होइ, सोहर, विवाह गीत वा देवी जागरण सभ मे एकटा गूढ़ संदेश रहैत अछि। स्त्रीगण सब अपन भावना, संघर्ष आऽ विश्वास के एहि गीत सभ मे व्यक्त करैत छथि।
“नयन नीर भरि, भगवती सुत के जगाबी हे…”
“हे दुर्गे भगवती! हे मइया भैरवी!” ई सब पांइत मात्र गीत नहि, बल्कि अदौकाल सँ नारी चेतना के स्वर रहल अछि।
“भक्ति मे शक्ति” मिथिलाक संस्कृति, लोकमानस आऽ जीवनशैली के मूल तत्व अछि। एहि भक्ति मे कोनो निर्बलता नहि, बल्कि आत्मबल, नारीबल आऽ सामाजिक संतुलन के मूल मंत्र छुपल अछि।
मिथिला मे भक्ति केवल पूजा-स्थान पर नहि, बल्कि आँगन, खेत, चौपाल आऽ गीत मे वास करैत अछि। ओ शक्ति के आराधना मात्र देवी रूप मे नहि, बल्कि अपन भीतर के चेतना मे करैत अछि। एहि भक्ति मे जे शक्ति अछि, सैह त’ मिथिलाक आत्मा अछि।

  1. आँगन सँ अग्नि धरि जागल, नारी चेतनाक स्वर थिक।
    भक्ति मे शक्तिक स्वरूप, मिथिलाक आत्माक निड़ थिक।

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