लेखनीकेँ धार – जीवन में गुरू केर महत्व
मनुष्यकेँ जीवन सतत संघर्ष आ सीखक यात्रा छी। एहेन यात्रा में एकटा मार्गदर्शक—गुरू—के महत्व सर्वोपरि अछि। गुरू ओ पथप्रदर्शक छथि जे अज्ञानताक अन्हार मेटा क’ शिष्यक जीवन में ज्ञानक दीप जरबैत छथि। प्राचीन काल सँ ल’ क’ आधुनिक युग धरि गुरूक स्थान अद्वितीय रहल अछि। ओ केवल शिक्षक नहि, अपितु जीवनक हर मोड़ पर पथ देखेनिहार व्यक्तित्व होइत छथि।
लेख विचार
प्रेषित: आभा झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- जीवन मे गुरुक महत्व
गुरूकेँ परिभाषा –
संस्कृत मे कहल गेल अछि—
“गु” मतलब अंधकार आ “रू” मतलब प्रकाश।
गुरू ओ छथि जे शिष्यक अंतरतम अज्ञानक अन्हार केँ मेटा ज्ञानक उजास भरि दैत छथि। ओ आत्माक शुद्धि करैत छथि, विवेककेँ जाग्रत करैत छथि, आ मनुष्यकेँ स्वयं सँ मिलबैत छथि।
गुरूकेँ ऐतिहासिक महत्ता –
रामायण में देखू— श्रीराम अपन गुरू वशिष्ठ सँ केवल वेद-पुराण नहि, बल्कि जीवनक मूल मूल्य—धैर्य, त्याग, मर्यादा—सिखलनि।
महाभारत मे अर्जुन अपन गुरू द्रोणाचार्य सँ धनुर्विद्या सीखलनि, मुदा सच्चा आत्मज्ञान हुनका श्रीकृष्ण सँ भेटल। भगवान कृष्ण अर्जुन केँ जीवनक यथार्थ बुझेलनि— “कर्म करू, फल पर अधिकार नहि राखू।”
एहि सँ स्पष्ट होइत अछि जे गुरू केवल शास्त्र पढ़ेनिहार नहि, अपितु जीवनक रहस्य खोलनिहार छथि।
आध्यात्मिक आ सामाजिक गुरू –
हमर समाज में विद्यापति, तुलसीदास, कबीर, नानक, स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस जेकाँ गुरू लोकनि हजारों जनक आत्माकेँ जागृत केलनि। ओ मानव मात्र मे सेवा, भक्ति आ विवेक भरलनि। गुरू ने केवल उपदेश दैत छथि, बल्कि अपन जीवन सँ उदाहरण बनैत छथि।
गुरू बनाम शिक्षक –
हर शिक्षक गुरू होइत छथि, मुदा हर गुरू शिक्षक नहि होइत छथि। शिक्षक पाठ पढ़बैत छथि, गुरू जीवन जीबैक कला सिखबैत छथि। शिक्षक परीक्षा लेल तैयार करैत छथि, गुरू जीवन के बुझबैत छथि।
गुरू शिष्यकेँ भीतर छुपल शक्तिके पहचानि ओकरा उन्नति के पथ पर ल’ जाइत छथि। ओ शिष्यक संदेह दूर करैत छथि, ओकरा आत्मविश्वास सँ भरि दैत छथि।
वास्तविक जीवनक उदाहरण
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम अपन जीवन मे अपन शिक्षक सिवासुब्रह्मण्यम अय्यर के सदा स्मरण करैत छलाह। ओ कहैत छलाह— “हमरा मे उड़बाक सोच देनिहार हमर गुरू छलाह।”
स्वामी विवेकानंद सेहो अपन गुरू रामकृष्ण परमहंस सँ प्रेरित भ’ क’ दुनियाभरि में भारतक संस्कृति आ आत्मबल के पहिचान देलनि।
माता-पिता : प्रथम गुरू –
हमर जीवनक पहिल गुरू माता-पिता होइत छथि। ओ हमरा बाजब, चलब, संस्कार आ सहानुभूति सिखबैत छथि। माँ स्नेह केर, त्याग केर पाठ दैत छथि, पिता अनुशासन आ हिम्मत सिखबैत छथि। मिथिलाक लोक कहैत छथि—
“माँ-पिता गुरू समान, जिनकर छाया जीवन धन्य बनबैत।”
स्त्री जीवन मे गुरू केर भूमिका –
नारी जीवन मे गुरूक भूमिका विशेष महत्वपूर्ण होइत अछि। परंपरागत समाज मे स्त्री शिक्षा पर जे प्रश्न उठैत रहल, ओ गुरू लोकनिक प्रयत्न सँ ध्वस्त भेल। आजुक युग मे शिक्षिका लोकनि केवल किताब नहि पढ़बैत छथि, ओ बेटीक मनोबल बढ़बैत छथि, हुनकर सपनाकेँ पाँखि दैत छथि।
आधुनिक समय मे गुरू –
आजुक समय मे गुरूक भूमिका बेसी व्यापक भ’ गेल अछि। तकनीकी ज्ञान भले इंटरनेट सँ भेट जाइत हो, मुदा जीवनक सच्चा मार्गदर्शन गुरू दैत छथि। सोशल मीडिया, भीड़, व्यस्तता आ मानसिक तनाव सँ घेरल जीवन मे गुरू ओ आश्रय थिक, जत’ मन शांति पबैत अछि।
गुरू बिना जीवन अधूरा अछि। गुरू बिना आत्मा अधूरा अछि। गुरूक संग जीवन मे अनुशासन, दिशा, प्रेरणा आ विश्वास अबैत अछि। गुरू अपन अनुभव सँ हमर पथ प्रशस्त करैत छथि। गुरू ओ दीप छथि जे स्वयं जरि क’ शिष्यक जीवन मे उजास भरैत छथि।
गुरू पूर्णिमा पर हमरा सबके चाही जे अपन जीवनक गुरूके प्रति आदर प्रकट करी, हुनकर उपदेश पर चलबाक प्रयत्न करी। गुरू केवल अतीतक चीज नहि, ओ भविष्यक नींव छथि।
“गुरू चरण मे शीश नवाबी,
जीवनक हर राह सुलभ बनाबी।
जतेक भेटै ज्ञानक रश्मि,
गुरूक कृपा सँ बनै जीवन स्वर्णमयी।”
समर्पित समस्त गुरू लोकनिकेँ। जय मिथिला, जय मैथिली।
