लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- जीवन मे गुरु कऽ महत्व
गुरु दीपक सँ आलोकित मिथिला
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मिथिलाक माटि सदैव ज्ञान, तप, साधना आऽ संस्कृति केर पोषक रहल अछि। एहि धरती पर जनक, याज्ञवल्क्य, गार्गी, मैत्रेयी सन विद्वान सभक प्रादुर्भाव भेल। एहिठाम गुरु शिष्य परंपरा मात्र औपचारिक शिक्षा तक सीमित नहि रहल, बल्कि आत्मिक उन्नति आऽ चरित्र निर्माण धरि विस्तृत रहल अछि। मिथिलाक लोक परंपरा, लोकगाथा आऽ लोककर्म मे गुरु केँ स्थान देवता सन मानल गेल अछि। “गुरु बिनु ज्ञान न होई”, “गुरु-गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय” एहि समस्त भावधाराक गूढ़ स्वर मिथिला मे प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होइत अछि।
मिथिलाक इतिहास मे विदेह जनक के रूप मे एक एहन राजा होएत छथि जे स्वयं विदेह अर्थात ‘अहं’ सँ ऊपर उठि चुकल व्यक्ति छलाह। ओ स्वयं एक महान ज्ञानी गुरु छलाह आऽ याज्ञवल्क्य सन ऋषि केँ अपन सभासद बना ज्ञानक विमर्श करैत छलाह। याज्ञवल्क्य स्वयं ब्रह्मविद्या के प्रकांड ज्ञाता छलाह, जिनकर शिष्यत्व मे गार्गी आऽ मैत्रेयी सन विदुषी स्त्री सेहो आत्मज्ञान प्राप्त केलथि।
मिथिला सदैव एहन भूमि रहल जइठाम शिक्षा मात्र पुस्तकीय नहि, बल्कि जीवन दृष्टिकोण बनल। गुरुकुलक परंपरा, आश्रमिक जीवन, ब्रह्मचर्य आश्रम ई सब मिथिलाक शिक्षा प्रणाली केँ मजबूत बनबैत रहल।
गुरु केवल पाठमात्र नहि पढ़बैत छथि। ओ जीवन केँ दिशा देखबैत छथि। मिथिला मे कहल जाइत अछि “जे गुरु लाठी देलनि, से जीवनक बाट देखेलनि।” गुरु शिष्य मे आत्मविश्वास, विवेक, संयम, त्याग आऽ कर्तव्यबोध केँ जागृत करैत छथि। लोकपरंपरा में ‘गुरुचरण’ स्पर्श मात्र सँ जीवन दिशा पबैत अछि। गाम-घर में संस्कारसभ नामकरण, जनेऊ, विवाह आदि मे ‘कुलगुरु’ केर उपस्थिति अनिवार्य बुझल जाइत अछि। एही संस्कार द्वारा मनुष्यक जीवन क्रमशः समृद्ध होइत गेल।
मिथिलाक वैदिक परंपरा मे गुरु आऽ शिष्य केर संवाद केँ विशेष स्थान देल गेल अछि।बृहदारण्यक उपनिषद मे याज्ञवल्क्य आऽ गार्गी संग मैत्रेयी केर संवाद एहि परंपरा केँ दार्शनिक स्तर पर उच्च स्थान पर पहुँचबैत अछि। एहि संवाद मे प्रश्नक अधिकार, विचार विमर्श आऽ सत्यक खोज एहन उदात्त स्तर पर होइत अछि जे विश्वक सभ्यता हेतु एक अमूल्य निधि अछि।
गुरुपूर्णिमा मिथिलाक एक प्रमुख पर्व अछि। एहि दिन ग्रामीण लोक अपन-अपन पुरखा, गुरु, आचार्य आदि के नमन करैत छथि। कतहु मठ-मंदिर में, कतहु पाठशाला में, कतहु गुरुस्थान पर शिष्यगण अपन गुरु केँ पाग-दोपट्टा आऽ फल-फूल भेट कऽ आशीर्वाद लैत छथि।
गाम-घर मे ‘गुरुक पूजा’ करबाक लोकाचार सेहो देखल जाइत अछि। एहि दिन लोक अपन कर्ज, दोष, भूल-चूक आदि सँ मुक्ति हेतु गुरु सँ क्षमा याचना करैत छथि।
आजुक समय में भले ही पाठशाला डिजिटल भऽ गेल, मुदा गुरुक महत्व मे कमी नहि आयल अछि। मिथिला मे आइयो गामक शिक्षक केँ ‘गुरुजी’ कहिकऽ संबोधित कैल जाइत अछि।
आजुक आवश्यकता अछि ओहि गुरु केँ पुनः प्रतिष्ठित करबाक, जे जीवनक मूल्यमापन आऽ चरित्रगठन करैत छथि। समाज मे एहन ‘संवेदनशील गुरु’ बनै, जे शिष्य मे आत्मगौरव आऽ लोकसेवा केर भावना जागृत क’ सकथि।
अंत हम एहेन कह’ चाहब जे गुरु मिथिला लेल केवल शैक्षिक मार्गदर्शक नहि, बल्कि आध्यात्मिक पथप्रदर्शक, संस्कारदाता आऽ समाजगतिक मूर्धन्य नेता छलाह। जतेक रस्ता हेबाक अछि गुरु ओतबे दीपक थिक। मिथिला मे गुरु सँ प्राप्त ज्ञान, नीति आऽ धर्म के संग समाज चलैत रहल अछि। अतः आधुनिक मिथिलावासी लेल आवश्यक अछि जे ओ गुरुत्व केँ नव ढंग सँ जीवन मे स्थान देथि।
गुरु कृपा पसरल अछि मिथिला,
ज्ञान दीप सँ उजासल युग-युग।
पुनः जागरूक बनि शिष्य बनू ,
गुरु चरण धए सभटा सिखू ।
