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चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वतीक अद्भुत व्याख्या – काव्य (कविता) – अत्यन्त पठनीय व मननीय लेख

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काव्य – कविता

– चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती “शंकराचार्य”

जँ कोनो नीक कार्य पूरा करबाक अछि, तँ ओकरा तीन तरीका सँ व्यवस्थित कयल जा सकैछ । पहिल, सरकार द्वारा कानून बनेबाक जेकाँ आदेश पारित करब होइछ । एकरा “प्रभु सम्मिति” कहल जाइत छैक, एहि मे स्वामी सेवक केँ आदेश दैत छथि । एतय, चाहे ओ पसिन करय वा नहि, सेवक केँ आदेशक निष्ठापूर्वक पालन कयनाय रहैत छैक, अन्यथा ओकरा दंड देल जेतैक । दोसर दिश, अधिकार केर स्थिति सँ बजनाय आ आदेश देनाय के अलावा, एकटा मित्र हमरा सब केँ कोनो कार्य करबाक लेल कहि सकैत अछि, जेकरा हम सब तुरन्त कय देल करैत छी । एहि मे (दंड केर) कोनो भय नहि रहैछ । एतय सद्भावना आर स्नेह रहैछ । हम सब एना एहि लेल करैत छी जे हमरा सब केँ विश्वास रहैछ जे एकटा मित्रक रूप मे ओ हमर भलाइये टा करत । एहि प्रकारे एकटा नेकदिल मित्र केँ ‘सु-हृत’ कहल जाइत छैक । तेँ, एकटा संगीक स्थिति सँ हमरा सब के कियो नीक कार्य करबाक लेल कहैछ से “सुहृत सम्मिति” कहाइत अछि । मुदा जाहि सँ परिणाम आर बेसी सहजता (आसानी) सँ भेटत से उपरोक्त दुनू सँ इतर पत्नी समान कोनो स्नेही लोकक अनुरोध होइछ । यदि गुरुक आदेश भारी हो, त मित्र केर मुख सँ वैह बात हल्लुक भ’ जाइत अछि । मुदा प्रियतम केर मुख सँ ओ आर बेसी हल्लुक भ’ जाइत अछि आर एकरा “कान्ता सम्मिति” कहल जाइत अछि – कान्ताक अर्थ भेल पत्नी ।

वेद प्रभु सम्मिति थिक । पुराण सुहृत सम्मिति थिक । काव्य कान्ता सम्मिति थिक – यैह कथा अछि ।

वेद केवल कहैत अछि – “एहि तरहें करू आ ओहि तरहें करू ।” ओ कारण नहि कहैत अछि जे ‘कियैक करू?’ । पुराण कि कहैत अछि, “अच्छा, जँ अहाँ एहि तरहें करब, तँ ई लाभ अछि । जँ अहाँ एकरा दोसर तरहें करब, त ई हानि होयत ।” ई हमरा सब केँ एकटा कथा सुनाकय कारण कहैत अछि जे कोनो काज केँ निर्धारित विधि सँ कियैक करबाक चाही । पुराण सभक विशेषता मात्र कारण कहनाय नहि छैक । एकर उद्देश्य रोचक कथा सभक रूप मे सन्देश प्रस्तुत कय केँ हमरा सभक ध्यान आकर्षित करब छैक ।

काव्य कि करैत अछि ? कवि कि करैत छथि ? ओ अपन रचनात्मक बुद्धि केँ तथ्यात्मक कथा सब संग मिलबैत छथि । ओ अपन कल्पना सँ कथा सब रचैत छथि । किछु बात ओ बेर-बेर दोहरबैत छथि । यैह हुनकर काव्यात्मक उन्मुक्तता थिकन्हि । ओ साधारण तथ्य केँ सेहो कतेको दिखाबा सँ सजाकय एक एहेन चमकदार ताना-बाना मे बुनैत छथि जेकरा सब कियो वाहवाही करबाक संग अपनाबैत अछि । बात केँ सीधा-सादा ढंग सँ मित्र जेकाँ प्रस्तुत करबाक बदला, कवि एक नीक पत्नी जेकाँ व्यवहार करैत छथि । अपन जिद्दी (अड़ियल) पति केँ मनेबाक लेल, ओ चुटकी लैत छथि, मनबैत छथि, हँसबैत छथि, विनती करैत छथि आर अपन बात मनबेबाक लेल हर सम्भव प्रयास करैत छथि । कविता पत्नीक भूमिका निभबैत अछि । वेद गुरुक भूमिका निभबैत अछि आर बीच मे मित्रक भूमिका निभबैत अछि, पुराण, ई सब किछु हमरा लोकनिक मोन मे धर्मक संचार करैत अछि ।

हमर नोट: हमरा ई छोट सन लेख हमरा जेहेन लोकक लेल एतेत ज्ञानवर्धक लागल जे हम एकरा अपने सभक वास्ते पोस्ट कय रहल छी जाहि सँ अपने सब एकरा पढ़ि सकी, विचार कय सकी आ पहिने बेसी प्रसन्नता सँ जीवन जिबि सकी ।

हरिः हरः!!

Kaavya – Poetry

– Chandrashekharendra Saraswati “Shankaraachaarya”

If a good thing has to be accomplished it can be arranged in one of three ways. One is to pass an order like Government making a law. This is called “Prabhu Sammiti”, the master ordering a servant. Here, whether he likes it or not, the servant has to carry out the order faithfully as otherwise he will be punished. On the other hand, instead of speaking from a position of authority and giving an order, a friend may ask us to do a job which we do promptly. Here there is no fear (of punishment). There is goodwill and affection. We do it because of our faith that as a friend he would only do us good. Thus a good-hearted friend is called ‘Su-Hrit’. Therefore, to ask us to do a good thing from the position of a companion is called “Shri Sammiti”. But what will accomplish the result more easily that either of the above is the request of a loving person like the wife. If the master’s order is heavy, the same thing through a friends’ mouth becomes light. But from the beloved it becomes lighter still and is called “Kaanta Sammiti” – Kaanta meaning wife.

Vedas are Prabhu Sammitam. Puraanas are Suhrit Sammitam. Kaavya (Poetry) is Kaanta Sammitam – such is the legend.

Veda merely says – “do this way and that way.” It does not say the reason why? What do the Puraanas say, “Well, if you do this way, this is the benefit. If you do it the other way, this will be the harm.” It gives us the reason why a thing has to be done in the prescribed way, through recounting a story. The characteristic of the Puraanas is not merely to give reasons. Its purpose is to attract our attention by presenting the message in the form of interesting stories.

What does poetry (Kaavya) do? What does the poet do? He mixes his creative intelligence with factual stories. He creates stories out of his imagination. Some matters, he repeats again and again. This is his poetic licence. He decks the simple fact with frippery and weaves a glittering pattern for all to admire and adopt. Instead of presenting the matter in a straightforward way like a friend, the poet behaves like a good wife. In order to bring round a recalcitrant husband, she quips, cajoles, humours, entreats and does everything to gain her point with him. Poetry plays the role of the wife. Vedas the role of the master and, in between, is the role of the friend, Puraanas, all of them inculcating Dharma into our minds.

My Note: I find this small article so enlightening for people like me that I post it for all of you who can read, understand, ponder and further live life more happily than ever.

Harih Harah!!

काव्य – कविता

– चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती “शंकराचार्य”

यदि कोई अच्छा कार्य संपन्न करना है, तो उसे तीन तरीकों से व्यवस्थित किया जा सकता है । पहला, सरकार द्वारा कानून बनाने जैसा आदेश पारित करना । इसे “प्रभु सम्मिति” कहते हैं, जिसमें स्वामी सेवक को आदेश देता है । यहाँ, चाहे पसन्द पड़े या न पड़े, सेवक को आदेश का निष्ठापूर्वक पालन करना होता है, अन्यथा उसे दंड दिया जाएगा । दूसरी ओर, अधिकार की स्थिति से बोलने और आदेश देने के बजाय, एक मित्र हमें कोई कार्य करने के लिए कह सकता है, जिसे हम तुरंत करते हैं । यहाँ (दंड का) कोई भय नहीं है । यहाँ सद्भावना और स्नेह है । हम ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि हमें विश्वास है कि एक मित्र के रूप में वह हमारा भला ही करेगा । इस प्रकार एक नेकदिल मित्र को ‘सु-हृत्’ कहा जाता है । इसलिए, एक साथी की स्थिति से हमें कोई अच्छा कार्य करने के लिए कहना “सुहृत सम्मिति” कहलाता है । लेकिन जिससे परिणाम और आसानी से प्राप्त होता है वह उपरोक्त दोनों से हंटकर पत्नी समान कोई प्रेम करनेवाले व्यक्ति का अनुरोध होता है । यदि गुरु का आदेश भारी हो, तो मित्र के मुख से वही बात हल्का हो जाता है । लेकिन प्रियतम के मुख से वो और अधिक हल्का हो जाता है और इसे “कान्ता सम्मिति” कहा जाता है – कान्ता का अर्थ पत्नी होता है ।

वेद प्रभु सम्मिति है । पुराण सुहृत सम्मिति है । काव्य कान्ता सम्मिति है – ऐसी ही कथा है ।

वेद केवल कहता है – “इस प्रकार करो और उस प्रकार करो ।” वह कारण नहीं बताता कि ‘क्यों?’ । पुराण क्या कहते हैं, “अच्छा, यदि तुम इस प्रकार करोगे, तो यह लाभ है । यदि तुम इसे दूसरे प्रकार से करोगे, तो यह हानि होगी ।” यह हमें एक कथा सुनाकर कारण बताता है कि किसी कार्य को निर्धारित विधि से क्यों करना चाहिए । पुराणों की विशेषता केवल कारण बताना नहीं है । इसका उद्देश्य रोचक कथाओं के रूप में संदेश प्रस्तुत करके हमारा ध्यान आकर्षित करना है ।

काव्य क्या करता है ? कवि क्या करते हैं ? वह अपनी रचनात्मक बुद्धि को तथ्यात्मक कथाओं के साथ मिलाते हैं । वह अपनी कल्पना से कहानियाँ रचते हैं । कुछ बातें वो बार-बार दोहराते हैं । यही उनकी काव्यात्मक उन्मुक्तता है । वे साधारण तथ्य को भी दिखावटीपन से सजाकर एक ऐसा चमकदार ताना-बाना बुनते हैं जिसे हर कोई सराहता और अपनाता है । बात को सीधे-सादे ढंग से मित्र की तरह प्रस्तुत करने के बजाय, कवि एक अच्छी पत्नी की तरह व्यवहार करते हैं । अपने अड़ियल पति को मनाने के लिए, वह चुटकियाँ लेती है, मनाती है, हँसाती है, मिन्नतें करती है और अपनी बात मनवाने के लिए हर संभव प्रयास करती है । कविता पत्नी की भूमिका निभाती है । वेद गुरु की भूमिका निभाते हैं और बीच में मित्र की भूमिका निभाते हैं, पुराण, ये सभी हमारे मन में धर्म का संचार करते हैं ।

मेरा नोट: मुझे यह छोटा सा लेख मेरे जैसे लोगों के लिए इतना ज्ञानवर्धक लगा कि मैं इसे आप सभी के लिए पोस्ट कर रहा हूँ ताकि आप इसे पढ़ सकें, समझ सकें, विचार कर सकें और पहले से कहीं ज़्यादा खुशी से जीवन जी सकें ।

हरिः हरः!!

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